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रविवार, 31 जनवरी 2010

आये नाग न पूजे, भिम्भोरा पूजे जाय


जम्मो संगवारी मन ल मोर जय जोहार. मैं हा ऊपर मा लिखे मोर राज के मिठ बोली के हाना (कहावत) ल एखर खातिर लिखे हंव के हमन घर मा आये नाग देवता के पूजा करेबर छोड़ के भिम्भोरा ल पूजे बर जाथन .  कुदरत हा अपन खूबसूरती ल कहाँ नई दे हे. जरूरत हे ओला सम्हाल के रखे के. हमर  देश माँ सबले बढ़िया सरग (स्वर्ग) उत्तर भारत माँ  हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, उत्तरांचल,  पूरब  मा दार्जिलिंग, सिक्किम, पश्चिम मा मुंबई अउ  गोवा  के बीच  सतारा उतर  के जाथें  जेला महाबलेश्वर कथें, अउ खंडाला माथेरान घलो, दक्खिन मा ऊटी,  कोडेकनाल  ये सब  बरफ वाले  पहाड़ अउ उहाँ के सुग्घर हरियर हरियर पेड़ पौधा से सजे कुदरत ल मानथन.  बात गलत नई ये. फेर इहाँ जाय बर सबके टेंटुआ मा मनीराम होना चाही. "चाहे वो दार्जिलिंग होवे या सिक्किम, काश्मीर होवे या ऊटी" लगत रथे सबोला जाँव येती ओती.  अउ एक दू जघा अउ  हे जेमा शामिल हे माउंट आबू.  ये सब जघा के बारे माँ सुन के मन ल नई कर सकन काबू.       लेकिन   हमरो छत्तीसगढ़ मा कुदरती सुन्दरता के कमी नई ये.                
हमन अपन समाज के दुरुग भिलाई के समिति "छत्तीसगढ़ी केशरवानी सेवा समिति दुरुग-भिलाई " बनाए हन. अब समिति डहर ले सोचेन के हमन तो येती ओती घूम फिर के अपन मन बहला लेथन. बपरी   घर गोसैनिन मन (अरे आजकल घर देखैया तो हवेच, घर बाहिर दुनो जघा देखैया घलो हे,  याने नौकरी वाले घलो हावे )   काम बूता मा बिपतियाये रथें. ओहू मन ल लागथे  के कभू बाहिर घूमे फिरे बर जाना चाही. अउ इही हा बने समाज के अउ परिवार संग जाए जाय त झन पूछ ओखर मजा ला. बीते साल ले हमन इही सब ला गुन के पिकनिक मनाये बर बाहिर जाए बर धरे हन. पउर साल राजिम चंपारन  गे रेहेन. घटा रानी तभो ले बांच गे रहिसे.  शिवरीनारायण, मैनपाट,  अचानकमार जंगल, बार नवापारा अभ्यारण, अउ सब के मन मोहैया जगदलपुर के चित्रकूट, तीरथगढ  झरना अउ कई स्थान हे जी जिहां प्रकृति हा ये धरती ला कतेक सुग्घर सजाये हे अपन हरियाली से, अउ नाना प्रकार के आकृति वाले झरना, पहाड़ चट्टान, जंगल के जानवर अउ कई जीव जंतु से . अच्छा रद्दा घलो कम घुमावदार नई ये चाहे आप केसकाल घाटी जाव चाहे चिल्फी घाटी जाव. ऐसे लगे  लगथे    जैसे हमन हिमाचल प्रदेश के घाटी माँ आ गे हन. ऐतिहासिक  अउ पौराणिक धार्मिक स्थान माँ शिवरीनारायण, रतनपुर, खैरागढ़, डोंगरगढ़, सकती, रायगढ़ , सारंगढ़, कवर्धा, भोरमदेव राजिम बेलासपुर के ही तालागांव मल्हार अउ कई ठन जघा हवे. एकदम से सुरता नई आवै. तव ए दारी कवर्धा, भोरम देव,  सरोदा दादर के चोटी, सूपखार जाए के पोरोगराम बनिस. वैसे ये सब स्थान के बारे माँ  हमर समाज के भूतपूर्व प्रदेश अध्यक्ष श्री अश्विनी केशरवानी जी हा शायद अपन ब्लॉग माँ जिक्र करे हे. अब पोरोगराम तो बन गे रहिसे. इतवार के दिन तय होय रहिसे. आधा ग्रुप ला हमर  घर  अउ आधा ला हमर एक झन अउ सक्रिय मयारू संगवारी घर  जुरियाना  रहिसे. शनीच्चर रात धुकपुकी लगे रहाय काबर के  सवा सौ - डेढ़ सौ किलोमीटर के यात्रा करना रहै. बिहनिया ले मोटर ला आना रहिसे. कैसनो करके सात बजे रवाना होए के फिक्स होए रहिसे.  ३२ सीटर मोटर के बेवस्था करे रेहेन. भिनसरहा ले उठे बर परिस. हमर तो नींद इसने खुल गे. जेखर नींद नई खुले रहिसे ओमन  ल अलारम हा जगाईस. जल्दी जल्दी नित्य क्रिया से निपट के नहा धो के तैयार होएन.   जाड़ कम नई होए रहिसे. कोहरा छाये रहै. कैसनो करके जुरियायेन. हमर घर ले रवाना होए के बाद दूसर पॉइंट कादंबरी नगर दुरुग  गेन. उहें ले बांचे खोंचे मन सकलाएन.  लम्बा दूरी के जात्रा मा देखे बर जाए वाले जघा मा बनाये खाए के  टाइम नई रहै. तेखरे पाय के घर घर ले कुछु कांही बना बना के धर ले रेहेन.  गाडी रवाना होए के पहिली बने बने रेंगे गाड़ी हा, रद्द मा कांही अड़चन झन आवै कहिके देवी देवता ल संउर के गाड़ी के चक्का तरी नरियर मड़ा के गाड़ी ल रेंगाएन. चरचरा के नरियर फूटिस त खुरहौरी के परसाद बांटेन. हमन लईका पिचका मिला के ३०-३२ झन होगे रेहेन. एमा एक ठन बिसेस बात ये रहिसे के माई लोगन मन एके टाइप के लुगरा पहिर के जाबो कहिके डिसाइड करे रहिन अउ बने लाल लुगरा म ललियावत रहिन. गाड़ी रवाना होगे. इहाँ शुरू होगे माई लोगन के अन्ताक्षरी, गीत भजन, लईका मन घलो शामिल होगे. उही मन ल त एक एक लाइन सुरता रथे गाना के . येती हमन अपन गोठ बात म मगन रेहेन. इहाँ एक बात ख़ास हे के जेन जघा म हमन गेन वो हा कवर्धा (जिला बन गे हे कवर्धा) ले  25-30 किलोमीटर हवे. कवर्धा हा समझ लौ तीन स्थान; रायपुर, राजनंदगांव अउ दुरुग ले करीब करीब समान दूरी म हे,  ओही करीब 116-120 किलोमीटर. हमन दुरुग ले धमधा गंडई रोड होवत गेन. धमधा -गंडई रोड म ५-६ किलोमीटर दूर बिर्झापुर  गाँव हे. ओ हा आज कल हमर छत्तीसगढ़ के शिगनापुर  होगे हे. उहाँ शनि देव ल बईठाए हें. मोटरेच मा बैठे बैठे दुरिहा ले हाथ जोड़ के परनाम करे लेन.  दुरुग ले धमधा 35 किलोमीटर, धमधा ले कवर्धा करीब 80 किलोमीटर होही. पहिली गंडई पहुचथे उहाँ ले राजनंदगांव कवर्धा रोड जुड़ जाथे. गंडई ले करीब 35-40 किलोमीटर होही. अब मोटर मा लाल लुगरा  वाले मन अउ लईका मन के अन्ताक्षरी चलिस. हमर मन के अपन अपने गोठ बात. कतका जुअर गंडई आगेन पता नई चलिस. उहाँ थोरकिन  सुस्ता  के चाय नाश्ता करेन. अउ करीब 10-30 बजे कवर्धा पहुच गेन. कवर्धा मा वापसी के समय के भोजन के बेवस्था एक भोजनालय मा करके आगू  बढेन.  हमन पहिली पहाड़ी एरिया मा सरोदा दादरी पहाड़ मा जाबो कहिके सोचे रेहेन. उहाँ जाए बर चिल्फी घाटी होके जाय बर परथे. अउ चिल्फी या तो बोडला होके जाव या भोरमदेव जउन ल छत्तीसगढ़ के खजुराहो कथें उहाँ ले होके जाय बर परथे. त हमन भोरमदेव वाले रद्दा (रस्ता) ल चुनेन. ओ मेरन ले वोइसे बड़े गाड़ी जाय बर मना हे.  फेर भैया कानून काखर बर आय, जन साधारण बर. वी आई पी बर थोरे आय. त हमू मन अपन  वी आई पी वाले जुगुत भिड़ा के  अपन गाड़ी ल ओही रद्दा ले लेगेन. बहुतेच बढ़िया घुमावदार रस्ता हे जी. ऐसे लगे  
जईसे हमन शिमला डहर घूमत हन. मोला तो जब नैनीताल गे रेहेंव त कैंची टेम्पल गे रेहेंव ओ रद्दा के सुरता देवा दिस. त चिल्फी अउ भोरम देव के ये रद्दा के बीच मा एक ठन टॉवर सरिक मचान बनाये गे हे. उहाँ ले चढ़ के बने पहाड़ी एरिया के दर्शन करौ. ऊपर देखौ त बढ़िया सीन अउ तरी डहर झान्कौ त गिरिच जाबो तैसे लगई. कइसनो  होय मजा आगे. एक ठन
 झलक देखावत हौं: देखौ पहाड़ी के सीन 

  उहाँ चढ़ के देखौ चारों मुड़ा ल. निहारते च रहौ लगइया नयनाभिराम दृश्य हवै. त उहाँ चढ़ के फोटू खीचेन. उहाँ ले थोरकिन देरी मा चिल्फी बर चलेन. चिल्फी पहुचे के बाद सरोदा दादरी बर बड़ अन्दर मा गाड़ी ल घुसेरे के कोशिश करेन एक जघा मोटर सटक गे रहिसे त जम्मो जात्री मन उतर के फेर ओला ओ पॉइंट मेरन लेगेन. उहाँ के एक बिसेसता बताइन के हमर देस के बीचो बीच ले गे कर्क रेखा ए जघा ले गुजरे हे. एक ठन टीला असन ओला पॉइंट बना के संकेत करे गे हे. ए जघा ल पर्यटन स्थल बनाये के सरकार के योजना ल रोके बर परत हे काबर के इहाँ साइंटिस्ट मन कुछ परयोग करेके सोचत हें. अइसे चर्चा चलत रहिसे. अब इहाँ घलो काये भियु (दृश्य) देखे बर गोल छापरी बरोबर ऊंचा बनाये हे उहाँ ले देखथें ओखरो फोटू हवै येदे  देखौ;
  अरे इहाँ तो पर्यटक मन के रुके के घलो बेवस्था करे बर रेस्ट हाउस जैसे बनाये के  प्लानिंग रहिस  हे जी. ओहू ल देख लौ 
 
अब इहाँ चारो मुड़ा घुम फिर लेन. कुदरती सुन्दरता के आनंद लेन. फेर ये पापी पेट, अउ बिचारी जीभ जउन ल नाक हा आनी बानी के खाए के आइटम के सुगंध लेके  उकसावत रहिसे के अब झन रुक मांग खाए बर, के मांग पूरा करे बर दरी बिछाएन. माई लोगन मन अपन अपन घर ले लाये माल पानी ल मढ़ावत गइन. पेपर प्लेट ले गे रेहेन. अउ पिऔ पानी अउ फेंकौ गिलास वाले गिलास. परसत गिन ललवाइन मन अउ जम्मो झन चटकार चटकार के ख़त गेन.  हाँ एक बात के हमन कसम खा के आये रेहेन के पर्यटन स्थल मा गंदगी नई फैलाना हे. तेखर पाय के जम्मो पेपर प्लेट, गिलास अउ कांही वेस्टेज निकलिस ओला एक ठन बोरा मा भर के कचरा फेंके के जघा मा  ही फेंकेन.  लव खवई के घलो दृश्य देख लौ; अरे ये खवई के नोहे ओखर तैयारी करे के आय.
                                                                                                         
 

 इहाँ सुरता बर जम्मो झन जुरिया के अलग फोटो खिचवाइन 

  अब इहाँ ले जी भर गे त सूपखार बर निकलेन उहाँ जादा घूम त नई पायेन काबर के जल्दी वो भोरमदेव चिल्फी वाले रद्दा हा बंद हो जाथे कहिके. अच्छा सूप खार मा जादा घूमन नई दे उहाँ के रेंजर मन. जंगली जानवर के खतरा हे कहिके. उहाँ के गेस्ट हाउस ल देखेके लाइक हे कहिके उहें थोरकिन देर बइठेन पानी पी के आजू बाजू के  सीन देख के भोरमदेव बर रवाना होगेन. सूपखार के गेस्ट हाउस देखौ: एखर बारे मा कहे जाथे के ये अंग्रेज जमाना के आय बिजली नई रहिस त झुलावन पंखा लगे रहिसे शायद अभी भी लगे हे. अउ ओखर घास फूस के छपरा दिखते हे. ओइसे अन्दर बहुत सुन्दर हे भरपूर सुविधा जनक अउ काहे जाय लक्जरियस हे. 


 
 
भोरम देव के दरसन बर अब रवानगी करेन. बेरा बूडत रहिसे. मडवा  महल देखेच नई पायेन. हाँ त भोरम देव पहुचे के बाद 
मंदिर मा दरसन करेन अउ तारीफ के बात ये हे के सरकार हा इहाँ बने बगीचा बनवा दे हे. भोरम देव हा बहुत प्राचीन ऐताहिसक जघा आय. एखर इतिहास बर मैं अत्केच लिख सकथौं के ये हा नौवी सदी से लेके चौदहवी सदी तक शासन करे नागवंशी राजा मन के बनवाये मंदिर आय. राजा गोपाल देव के शासन काल मा राजा लक्ष्मण देव हा बनवाए रहिसे. ये मंदिर हा खजुराहो अउ कोणार्क मंदिर के समान हे. एखर पूरा जानकारी ल हिंदी मा चस्पा कर दे हंव. इहाँ के मंदिर के अउ सरकार द्वारा ए जघा ल बढ़ावा दे बर बनवाये गे बगीचा के सुन्दरता के घलो हमन फोटो ले हन ओहू ल देखौ; वैसे   संझा पांच साढ़े पांच बजे पहुंचे के बाद सीधा भोरमदेव मंदिर मेरन लगे  बजार ले ताजा ताजा सब्जी ल देख के अउ सस्ता मिलत  रहै ते पाय के पहिली दू किलो पताल  (टमाटर) लेंव मैं हा. फेर मंदिर मा जाके भगवान् शंकर के पूजा अर्चना करेन. नवा बने बगीचा के भी घूम घूम के आनंद लेन. का होथे लउटत खानी के जर्नी मा लरघियाये (अलसाए) बरोबर लगे लागथे तभो ले हमन कस के मजा लेन पिकनिक के. पूरा कार्यक्रम जोरदार रहिस. देखते देखत कइसे बेरा बूड़ गे पता नई चलिस. रात हो गे रहिसे करीब सात बज गे रहिसे. अब दुरुग पहुचे बर कम से कम तीन घंटा लगतिस. कहूं भोजन बेवस्था नई होय रहितिस त सबके घर गोसैनिन मन का सोचतिस. अतेक दुरिहा ले घूम के आव अउ फेर रान्धौ. भोनालय मा खाएन मोटर स्टैंड मा मारवाड़ी भोजनालय हे उंहचे.  सब झन बैठ गेन मोटर मा अउ करीब ८   बजे रवाना होयेन. दुरुग पहुचत ले ग्यारा बज गे रात के. सबो झन अपन अपन घर पहुचेन. हम तो नींद के देवी के शरण मा जल्दी  चल देन. 
                                 ये पिकनिक खातिर हमर कहना हे के हमर राज मा घलो देखे के लाइक अब्बड़ अकन जघा हे. प्रचार प्रसार के आभाव मा ये मन ल बढ़ावा नई मिलत हे. भले बर्फीला जघा के मजा अलग होथे पर ओतेक दुरिहा जाए बर एक सामान्य आदमी के खीसा (जेब) ल घलो देखे बर परथे. सुरता कर कर के जतका खियाल आइस ओतका लिहे हंव जी. 
जय जोहार!

 
      

    

छत्तीसगढ स्थापत्य कला के अनेक उदाहरण अपने आंचल में समेटे हुए हैं। यहां के प्राचीन मंदिरों का सौंदर्य किसी भी दृष्टि से खजुराहो और कोणार्क से कम नहीं है। यहां के मंदिरों का शिल्प जीवंत है। छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर से लगभग 116 किलोमीटर उत्तर दिशा की ओर सकरी नामक नदी के सुरम्य तट पर बसा कवर्धा नामक स्थल नैसर्गिक सुंदरता और प्राचीन सभ्यता को अपने भीतर समेटे हुए है। इस स्थान को कबीरधाम जिले का मुख्यालय होने का गौरव प्राप्त है। प्राचीन इतिहास की गौरवशाली परंपरा को प्रदर्शित करता हुआ कवर्धा रियासत का राजमहल आज भी अपनी भव्यता को संजोये हुए खडा है।
   कवर्धा से 18 किलोमीटर की दूरी पर सतपुडा पर्वत श्रेणियों के पूर्व की ओर स्थित मैकल पर्वत श्रृंखलाओं से घिरे सुरम्य वनों के मध्य स्थित भोरमदेव मंदिर समूह धार्मिक और पुरातत्वीय महत्व के पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाता है। भोरमदेव का यह क्षेत्र फणी नागवंशी शासकों की राजधानी रही जिन्होंने यहां 9वीं शताब्दी ईस्वी से 14वीं सदी तक शासन किया। भोरमदेव मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में फणी नागवंशियों के छठे शासक गोपाल देव के शासन काल में लक्ष्मण देव नामक राजा ने करवाया था।
   भोरमदेव मंदिर का निर्माण एक सुंदर और विशाल सरोवर के किनारे किया गया है, जिसके चारों ओर फैली पर्वत श्रृंखलाएं और हरी-भरी घाटियां पर्यटकों का मन मोह लेती हैं। भोरमदेव मंदिर मूलत: एक शिव मंदिर है। ऐसा कहा जाता है कि शिव के ही एक अन्य रूप भोरमदेव गोंड समुदाय के उपास्य देव थे जिसके नाम से यह स्थल प्रसिद्ध हुआ। नागवंशी शासकों के समय यहां सभी धर्मो को समान महत्व प्राप्त था जिसका जीता जागता उदाहरण इस स्थल के समीप से प्राप्त शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन प्रतिमाएं हैं।
   भोरमदेव मंदिर की स्थापत्य शैली चंदेल शैली की है और निर्माण योजना की विषय वस्तु खजुराहो और सूर्य मंदिर के समान है जिसके कारण इसे छत्तीसगढ का खजुराहो के नाम से भी जानते हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों पर तीन समानांतर क्रम में विभिन्न प्रतिमाओं को उकेरा गया है जिनमें से प्रमुख रूप से शिव की विविध लीलाओं का प्रदर्शन है। विष्णु के अवतारों व देवी देवताओं की विभिन्न प्रतिमाओं के साथ गोवर्धन पर्वत उठाए श्रीकृष्ण का अंकन है। जैन तीर्थकरों की भी अंकन है। तृतीय स्तर पर नायिकाओं, नर्तकों, वादकों, योद्धाओं, मिथुनरत युगलों और काम कलाओं को प्रदर्शित करते नायक-नायिकाओं का भी अंकन बडे कलात्मक ढंग से किया गया है, जिनके माध्यम से समाज में स्थापित गृहस्थ जीवन को अभिव्यक्त किया गया है। नृत्य करते हुए स्त्री पुरुषों को देखकर यह आभास होता है कि 11वीं-12वीं शताब्दी में भी इस क्षेत्र में नृत्यकला में लोग रुचि रखते थे। इनके अतिरिक्त पशुओं के भी कुछ अंकन देखने को मिलते हैं जिनमें प्रमुख रूप से गज और शार्दुल (सिंह) की प्रतिमाएं हैं। मंदिर के परिसर में विभिन्न देवी देवताओं की प्रतिमाएं, सती स्तंभ और शिलालेख संग्रहित किए गए हैं जो इस क्षेत्र की खुदाई से प्राप्त हुए थे। इसी के साथ मंदिरों के बाई ओर एक ईटों से निर्मित प्राचीन शिव मंदिर भी स्थित है जो कि भग्नावस्था में हैं। उक्त मंदिर को देखकर यह कहा जा सकता है कि उस काल में भी ईटों से निर्मित मंदिरों की परंपरा थी।
   भोरमदेव मंदिर से एक किलोमीटर की दूरी पर चौरा ग्राम के निकट एक अन्य शिव मंदिर स्थित है जिसे मडवा महल या दूल्हादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है। उक्त मंदिर का निर्माण 1349 ईसवी में फणीनागवंशी शासक रामचंद्र देव ने करवाया था। उक्त मंदिर का निर्माण उन्होंने अपने विवाह के उपलक्ष्य में करवाया था। हैहयवंशी राजकुमारी अंबिका देवी उनका विवाह संपन्न हुआ था। मडवा का अर्थ मंडप से होता है जो कि विवाह के उपलक्ष्य में बनाया जाता है। उस मंदिर को मडवा या दुल्हादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर 54 मिथुन मूर्तियों का अंकन अत्यंत कलात्मकता से किया गया है जो कि आंतरिक प्रेम और सुंदरता को प्रदर्शित करती हैं। इसके माध्यम से समाज में स्थापित गृहस्थ जीवन की अंतरंगता को प्रदर्शित करने का प्रयत्न किया गया है।
   भोरमदेव मंदिर के दक्षिण पश्चिम दिशा में एक किलोमीटर की दूरी पर एक अन्य शिव मंदिर स्थित है जिसे छेरकी महल के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का निर्माण भी फणीनागवंशी शासनकाल में 14वीं शताब्दी में हुआ। ऐसा कहा जाता है कि उक्त मंदिर बकरी चराने वाले चरवाहों को समर्पित कर बनवाया गया था। स्थानीय बोली में बकरी को छेरी कहा जाता है। मंदिर का निर्माण ईटों के द्वारा हुआ है। मंदिर के द्वार को छोडकर अन्य सभी दीवारें अलंकरण विहीन हैं। इस मंदिर के समीप बकरियों के शरीर से आने वाली गंध निरंतर आती रहती है। पुरातत्व विभाग द्वारा इस मंदिर को भी संरक्षित स्मारकों के रूप में घोषित किया गया है।
   भोरमदेव छत्तीसगढ का महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है। जनजातीय संस्कृति, स्थापत्य कला और प्राकृतिक सुंदरता से युक्त भोरमदेव देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण केंद्र है। प्रत्येक वर्ष यहां मार्च के महीने में राज्य सरकार द्वारा भोरमदेव उत्सव का आयोजन अत्यन्त भव्य रूप से किया जाता है जिसमें कला व संस्कृति के अद्भुत दर्शन होते हैं।
   कैसे पहुंचे
   सडक मार्ग से भोरमदेव रायपुर से 134 किमी. और बिलासपुर से 150 किमी, भिलाई से 150 किमी और जबलपुर से 150 किमी दूर है। यहां निजी वाहन, बस या टैक्सी द्वारा जाया जा सकता है।
   निकटतम रेलवे स्टेशन:रायपुर 134 किमी, बिलासपुर 150 किमी और जबलपुर 150 किमी दूर।
   निकटतम हवाईअड्डा:रायपुर 134 किमी जो दिल्ली, मुंबई, नागपुर, भुवनेश्वर, कोलकाता, रांची, विशाखापट्नम व चेन्नई से सीधी रेलसेवाओं से जुडा है।
   कहां ठहरें
   कवर्धा में विश्रामगृह और निजी होटल हैं। भोरमदेव में भी पर्यटन मंडल का विश्रामगृह और निजी रिसॉर्ट हैं।




   

   






बुधवार, 27 जनवरी 2010

जित देखूं तित खींचा तानी ब्लॉग लेखन केवल हम जानी

कभी कभार मुझे लिखने के लिए कुछ सूझता नहीं. फिर मन में विचार आता है आज पढ़ा जाय सबका ब्लॉग. बहुत अच्छे अच्छे लेख, समाचार पढने को मिलते हैं. पर बीच बीच में कुछ ऐसी बातें पढने को मिल जाती हैं जिसे पढने से ऐसा लगता है कि लोग कभी कभी "एको अहम् द्वितियो नास्ति" की धारणा के साथ चलने लगते हैं.  भाई आप इस ब्लॉग लेखन की दुनिया में काफी सीनिअर  हैं,  ज्ञान के मामले में भी एक तरह से काफी आगे हैं , अच्छी बात है. किन्तु ये  टिपण्णी के पिपासु ऐसे कौन ज्यादा नज़र आ गये. किसने आपको कह दिया कि आप टिपण्णी नहीं करते. कौन प्रेस्राइज़ कर रहा है टिपण्णी करने को?  और क्या बुराई है अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने में, प्रत्येक लेख सर्वथा अच्छी टिपण्णी के लायक हो भी नहीं सकता किन्तु यदि किसी में कुछ कर गुजरने की काबिलियत की झलक दिखाई पड़ती है तो उसके लेख में मार्गदर्शक टिपण्णी क्यों नहीं की जा सकती ? दर असल मैं  इस बाबत पहली बार किसी के विचार नहीं पढ़ रहा हूँ. एक दो बार और पढ़ चुका हूँ. ऐसा लगने लगा कि सभी यही सोचने लगे हैं   "ब्लॉग लेखन केवल हम जानी"  क्योंकि आज " जित देखूं तित खींचा तानी " का माहौल नजर आता है. कभी कोई कहता है अब ब्लॉग से विदा ले रहा हूँ.  मुझसे रहा नहीं गया तुरंत विचार घुमड़ने लगा.  लगने लगा यह ब्लॉग की दुनिया भी छद्म प्रशंसा भले हो प्रशंसा बटोरने में ही अपनी उपलब्धि मानने लगी है. चलिए ठीक है भाई सभी स्वतंत्र हैं आपने विचार प्रकट करने को. देखिये न मुझसे ही रहा न गया. माफ़ करिएगा यदि कहीं ..........ज्यादा बोल गया हूँ तो ......
जय जोहार, शुभ रात्रि

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

"तुलसी संत सुअम्ब तरु फूलि फरहि पर हेत जितते ये पाहन हने उतते वे फल देत"

"तुलसी संत सुअम्ब तरु फूलि  फरहि पर हेत 
जितते ये पाहन हने उतते वे फल देत"
यह है संत की परिभाषा गोस्वामी तुलसीदास जी की इन पंक्तियों के अनुसार.  यदि हम आत्मावलोकन करें तो क्या हम इसका अनुसरण कर रहे हैं?  अच्छा चलिए इस सम्बन्ध में यह कहा जावेगा की हम संत नहीं हैं. ठीक है. पर यदि आज के कथाकारों (प्रवचनकर्ताओं, जिन्हें हम ही संत कहने लगे हैं) को एशो आराम वाले कहा जावे तो सबसे पहले उन्हें  एशो आराम की सुविधा उपलब्ध करवाने वाले कौन हैं?? हम लोगों में से ही कोई न कोई हैं, हैं कि नहीं.   फिर आलोचना समालोचना  विवेचना क्यों ?  कहीं प्रवचन चल रहा हो, कहीं भजन संकीर्तन का आयोजन हो रहा हो, जनता उमड़ पड़ती है, खासी भीड़ जमा हो जाती  है.  भीड़ क्यों उमड़ पड़ती है? क्यों खीचे चले जाते हैं लोग उनकी ओर. दूसरी बात क्या उनकी सभी बातें जरा भी अनुकरणीय नहीं होतीं ?  यह सोचने की बात है.  एक ओर प्रवचन चल रहा है, पांडाल श्रोताओं से भरा है. दूसरी ओर  पांडाल से बाहर तात्कालिक आवश्यकताओं की चीजें बेचने वालों की कतारें  जैसे ठेले में खाने की वस्तुएं बेचने वाले, बच्चों को आकर्षित करने वाले खिलौने बेचने वाले, आदि आदि दिखाई पड़ती हैं. मेला का दृश्य लगता है. ये  ऐसे  विक्रेता हैं जिनकी रोजी रोटी इसी से चलती हैं. कहने का तात्पर्य इन्हें भी फायदा हो जाता है. इतना ही नहीं बाहर भिखारी भी इससे कुछ न कुछ लाभान्वित होते हैं. यद्यपि भिक्षावृत्ति को बढ़ावा देने के पक्ष में नहीं हूँ मैं. मैंने अभी अभी दैनिक अखबार "दैनिक भास्कर"  में प्रकाशित तरुण सागर जी के प्रवचनों के कुछ अंश  जो मुझे अनुकरणीय प्रतीत हुआ, खासकर पारिवारिक जीवन को सहज व सरल ढंग से व्यतीत करने के लिए  आपने ब्लॉग में  लिखा है  . .  इन बातों की अच्छाई तो एक तरफ. प्रवचनकर्ता  की खिचाई टिपण्णी के माध्यम से शुरू. किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं आज जो संतों (फिर मैं संत लिख बैठा प्रवचनकर्ताओं) की बाढ़ आयी है उनके लिए टिप्पणीकर्ता के विचार कुछ हद तक लागू हो सकते हैं. कलियुग में इस तरह की परिस्थिति निर्मित होने के अंदेशे के बारे में रामचरित मानस में पहले से ही उल्लेख है;
"बहु दाम संवारहिं धाम जती. बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती.
तपसी धनवंत दरिद्र गृही. कलि कौतुक तात न जात कही."
सन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं. उनमे वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयों ने हर लिया. तपस्वी धनवान हो गए और गृहस्थ दरिद्र.  हे तात कलियुग की लीला कुछ कही  नहीं जाती.  (काक भुसुंडि गरुड़ संवाद उत्तर काण्ड) 
अतएव अच्छा हो यदि अनुकरणीय बातें ग्रहण करें केवल समाज ही नहीं एक अच्छा राष्ट्र साबित हो अपना इसमें सहायक हों. 
..........जय जोहार

 





गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

संविधान बने इकसठ साल हो रहे हैं; देश के प्रथम नागरिक द्वारा विदेश से पधारे राष्ट्राध्यक्ष अथवा ऊंचे ओहदे वाले, के मुख्य आतिथ्य में  लाल किले में  ध्वजारोहण, तिरंगे को सलामी,चाहे देश के प्रहरी जाबांजो के हैरत अंगेज प्रदर्शन हों या  छात्र  छात्राओं द्वारा पेश किये जा रहे रंगारंग कार्यक्रम और देश के विभिन्न क्षेत्रों से आये कलाकारों द्वारा निकाली जा रही मनमोहक झांकियां , इन सबका आनंद लेना और इस प्रकार गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम संपन्न. कुछ इसी तरह के कार्यक्रम प्रान्तों के मुखियाओं  द्वारा, गाँव कसबे में वहाँ के मुखिया द्वारा,  अपने अपने प्रान्तों में सम्पन्न कराना . स्कूलों विभिन्न संस्थाओं में  वहां के मुखिया के द्वारा, इसी प्रकार अन्य छोटी  छोटी संस्थाओं  द्वारा भी गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम संस्था प्रमुख द्वारा सम्पन्न किया जाना. किन्तु क्या हमने कभी ध्यान दिया है????........

संविधान की रचना रचे, हो रहे  इकसठ साल 
गर करें कानून की कद्र सभी, क्यों मचे यहाँ बवाल 
पर क्या करें 
इस पुनीत अवसर पर, मात्र औपचारिकता पूरी कर जाते हैं 
संबिधान का विधान हम कितना निभा पाते हैं 
यह सोचना केवल नेताओं का ही नहीं, हम सबका काम है 
यदि हो गए हम जागरूक, देखें होता कहाँ कत्ले आम है.
पुनः गणतंत्र दिवस  की सभी मित्रों को, बहुत बहुत शुभकामनाएं 
शुभ रात्रि, नमस्कार जय जोहार.

 

सोमवार, 25 जनवरी 2010

ब्लॉगर मीटिंग संपन्न



हम बुलाये गए थे रायपुर                                                    
दोपहर दो बजे  थी  ब्लॉगर मीटिंग  आज
क्या करें सरकारी महकमा है
आ गया था ऐसा विशेष काज
हम दो बजे नहीं, शाम पांच बजे  आ पाए, 
सब ब्लागरों से भले न हो, कुछ से तो भेंट कर पाए.
खैर, इस बात का हमें खेद है
सॉरी न कहेंगे मांग लेते हैं क्षमा
आस है, अगली मीटिंग में हमारी
नगरी दुर्ग में होंगे सब जमा.
सभी मित्रों को मेरा नमस्कार
शुभ रात्रि, जय जोहार

बुधवार, 20 जनवरी 2010

मित्रों ब्लागर बैठकी भिलाई की कुछ यादों को तुकबंदी के माध्यम से आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ.

संजीवन  ललित तव प्रेरणा लिखे पोस्ट उनचास
उर्जा बिच बिच भरत रह्यो भाई ललित शरद कोकास

ब्लॉगर बैठकी बुलाई  के जगा गयो मन में आस
चलती रहेगी लिखनी भले कर न पाए कुछ ख़ास

हुई बैठकी एक दिन, थी तारीख छः दिसम्बर
जगह थी भाई शरद यहाँ ड्राइंग  रूम के अंदर

दोपहर बारह बजे का समय था,हुआ चाय नाश्ता पानी
मिले बबला पाबला ललित संजीव शरद अउ ग्वालानी

फिर हुआ फोटो सेसन और घुसे कंप्यूटर कक्ष
कंप्यूटर प्रचालन में भिड गए कंप्यूटर दक्ष

ललित भाई का पेन ड्राइव कंप्यूटर में थे डाल रहे
खुल न पाया यह पूंगा यह सोच के सब बेहाल रहे

इतना ही नहीं कंप्यूटर को ले डूबा  ललित भाई का पूंगा
ठान लिया शरद भाई ने किसी को कंप्यूटर छूने न दूंगा

किसी का तकनीकी परामर्श भी इसके काम न आया
भूख लगी कहने लगे ब्लॉगर,अब  वक्त करें न जाया

सब पहुच गए हम होटल नाम है जिसका फोर सीजंस
 वहां आ जा रहे थे सभी,लगातार देखे मेंस एंड वीमन्स

रेस्तरां में ही भेंट हुई जिनसे वे थे अइयर साहब
भोजन भी था चल रहा बातें हो रही थीं नायाब 

भोजन सम्पन्न हो गया, हुआ  वक्त समापन का
इन्तेजार था अनिल पुसदकर जी के आगमन का

प्रतीक्षा की घड़ियाँ   ख़तम हुई अनिल भाई जी आये
मालवीय नगर चौराहे पे मिल हम सब फोटो खिचवाये

आप सभी के संग जुड़ गया, सूर्यकांत एक नाम
ऐसा अनुभव हुआ इसे जैसे हो लिए चारों धाम

यह दिल से निकली हुई बात है

रविवार, 17 जनवरी 2010

ब्लॉग के उन्चासवां पोस्ट ब्लॉगर मित्र के नाम

अब एक बात मन मा बहुत बुद बुदावत हे. अचानक रामायण के सुन्दरकाण्ड के  ये दोहा याद आवत हे.  प्रसंग आय सीता मई ल खोजे बर लंका आये अउ रावन के दरबार म खड़े हनुमान जी के पूछी मा आगी लगा दे जाथे अउ ओही समय भगवान के प्रेरणा से उन्चासों पवन  जम के चले लागथे जउन  ल दोहा के रूप म लिखे गे हे ...  "हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास. अट्टहास करि गरजा कपि बढ़ी लागि अकास". ओइसने  मोला ब्लॉग म घुसरे के प्रेरणा जम्मो ब्लॉगर मित्र, जेमा जोजियावत रहे वाले संजीव ललित अउ शरद भाई आय, से मिलिस अउ एही कारन हे के उनचासवां  पोस्ट लिखत हंव. ये हा इन्खरे  बर आय;
१.  संजीव  ललित  तव प्रेरणा लिखा पोस्ट उनचास
    ऊर्जा बीच में भरत रह्यो भाई ललित, शरद कोकास
२. ब्लॉगर बैठकी बुलाई के जगा गयो मन में आस 
    चल पाएगी लेखनी, भले कर पाऊं न कुछ ख़ास 
तो भैया इसी आशा के साथ तनि लिखने की सनक चढ़ी हुई  है. बस आप लोगों का आशीर्वाद और प्रोत्साहन की जरूरत है.
सभी  टिपण्णी(प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष) के माध्यम से हौसला आफजाई करने वाले समस्त ब्लॉगर मित्रों  का भी शुक्रिया अदा करना चाहूँगा.

शुभ रात्रि ..........
जय जोहार

अखबारी खबर अगेन

अखबार पढने के बाद आज  मैं सोच रखा था  कि ख़बरें तो पढ़ते रहते हैं.  पर कुछ सीखने लायक चीजें जो नित्य विनिर्दिष्ट कॉलम में दी जाती हैं उनमे से   कुल जमा ४ पोस्ट लिखने लायक है. अभी तक तीन तो लिखा गया अब एक और बाकी रही गया था वह क्यों बचा रहे.  आज तरुण सागर जी द्वारा  सास बहू रिश्तों की मिठास के लिए सुझाए गए कुछ टीप पेपर में छपा है जिसे मैंने शीर्षक "अखबार पढने का सुर" में पोस्ट किया है.  यह पोस्ट अखबार में नित्य प्रकाशित होने वाले  कॉलम "जीवन दर्शन " और "जीने की राह"  में प्रकाशित  पंडित विजय शंकर मेहताजी  के विचारों में से है ........ "गृहस्थी व नारी अध्यात्म साधना में बाधा नहीं"  अभी भी कई लोग मानते हैं कि अध्यात्म साधना में दांपत्य संकट बाधक है, गृहस्थी रुकावट है, परिवार बाधा है और नारी तो नर्क का द्वार है. जो लोग भगवान् तक पहुचना चाहें या भगवान् को अपने तक लाना चाहें, वे यह समझ लें कि एकाकी जीवन से तो भगवान् ने स्वयं को मुक्त रखा है.  ईश्वर के सभी रूप लगभग सपत्नीक हैं. फिर परिवार तथा पत्नी बढा और व्यवधान कैसे हो सकते हैं.  अध्यात्म ने काम का विरोध किया है स्त्री का नहीं. अनियमित काम भावना स्त्री की पुरुष के प्रति और पुरुष का स्त्री के प्रति घातक हैं. भारतीय संस्कृति में ऋषि मुनियों के ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी धर्मपत्नी के साथ ही तपस्या की थी. बाधा तो दूर वे तो सहायक बन गयी थीं.  बीते दौर में अध्यात्म साधकों ने विवेकशील चिंतन को बहुत महत्व दिया था. विवेक के कारण स्त्री-पुरुष का भेद अध्यात्म में मान्य नहीं किया है. जब भेद ही नहीं है तो स्त्री बाधा कैसे होगी? नारी संग और काम भावना बिलकुल अलग-अलग हैं. ब्रह्मचर्य को साधने के लिए नारी को नर्क की खान बताना ब्रह्मचर्य का अपमान है.  वासना का जन्म संग से नहीं, कुविचार और दुर्बुद्धि से होता है.  स्त्री पुरुष के साहचर्य को अध्यात्म में पवित्रता से देध गया है. इसीलिए विवाह के पूर्व स्त्री पुरुष को अध्यात्मिक अनुभूतियों से जरूर गुजरना चाहिए. पति-पत्नी के संबंधों में पवित्रता व परिपक्वता कें लिए अध्यात्मिक अनुभव आवश्यक हैं.  इस रिश्ते में आज जैसी अशांति देखी जा रही है, इसका निदान भौतिक संसाधनों और तरीकों से ही नहीं होगा.  इसमें अध्यात्मिक मार्गदर्शन उपयोगी रहेगा. ........
आज की तारीख में इसे सभी को पढकर अमल में लाना चाहिए.  ये सब बातें अमल में कहाँ लाई जावेगी. अभी तो बातें अमल में लाने वाली नहीं अम्ल बनाने वाली हो रही हैं जिसमे रिश्ते जल्दी गल जाते हैं. कायम नहीं रह पाते, रहते भी हैं तो घिसट घिसट कर चलते रहते हैं. वैचारिक अपंगता आ जाती है.

शनिवार, 16 जनवरी 2010

आज अखबारी खबर जारी.......

पता नहीं कल मेरे मष्तिष्क में साइकिल के बारे में विचार  घुमड़ रहा था. क्यों हम आज कल इतने आलसी होते जा रहे हैं. यह बात मेरे दिमाग में उठ रहे दर्द के कारण और रह रह के उठ रही है. सुबह अखबार पढ़ा छोटी सी बात शीर्षक के अंतर्गत इसके बारे में लिखा पाया. सोचा वाह संपादक जी टेलीपेथी का कमाल आपने हमारी बात जान ली और छाप दिया
"भारत में साइकिल" .......लीजिये हम भी अपने ब्लोग्वा में उतार दिए देते हैं:
"बढ़ते वैश्विक तापमान और इंधन के घटते भंडारों की वजह से दुनिया में भले ही साइकिल को लेकर जागरूकता बढ़ रही, लेकिन हम इससे पीछा छुडाते जा रहे हैं. वेबसाइट आस्कमैन डोट कॉम ने हाल ही में साइकिल पसंद करने वाले दुनिया के जिन दस शहरों की सूची जारी की है, उनमे भारत का एक भी शहर शामिल नहीं है. दिक्कत यह है कि हमारे  यहाँ साइकिल को स्टेटस से जोड़ा जाता है और इसीलिए न तो साइकिल को सम्मान मिल पाता है और न साइकिल चालकों को. यही वजह है कि साइकिल चालकों के लिए सड़कों पर अलग ट्रेक शायद ही किसी भारतीय शहर में नजर आयेंगे." ........ है न पते कि बात.  
भैया कक्षा आठवी तक तो खूब चलाये. यहाँ तक  कि नौकरी में भी पहले चलाते रहे.  अब हांफ जात हैं. जे बात हौ अभी. ... अब तो चोर उचक्के (चार चके )  में ही आवे जावे को मन होवत रहो. औ जेइ आदत बदले के खातिर दिमाग (घुटना) में दर्द उठ जात हौ.    
चोर उचक्के लिखने का एक कारण है. हमारे यहाँ एक  सहकर्मी के परिवार सहित आगमन हुआ. वे थे तो बंगाली 
बातों बातों में ही उन्होंने पूछा "अरे साहेब चोर चाका कोब आयगा आपके घोर" मेरे सहपाठी भी उस समय बैठे हुए थे उनसे रहा नहीं गया मजाक में बोल बैठे "दादा क्या बोले आप? ....."चोर उचक्का" हम लोग खूब हँसे......



अखबार पढने का सुर

आज सबेरे से  अखबार का सुर चढ़ा हुआ है. आज कल तरुण सागर म.सा. के कडवे प्रवचन भिलाई के सेक्टर सिक्स पुलिस ग्राउंड में चल रहे हैं. लेकिन कल जो प्रवचन हुआ है, जिसका जिक्र आज के समाचार पत्र (दैनिक भास्कर) में मैं जो पढ़ा, उसे यहाँ उद्धृत करने से नहीं रोक पा रहा हूँ.
"........थक कर मत बैठिये, अंग में यदि जंग लग जाय तो जिन्दगी की जंग जीतना मुश्किल हो जाता है. ..... आकांक्षा और आवश्यकता में फर्क: आवश्यकता पूरी हो सकती है लेकिन आकांक्षा की पूर्ती नहीं की जा सकती.  आवश्यकता घड़े की भांति है और आकांक्षा बिना तले की बाल्टी के समान है. घड़ा तो भर जाता है लेकिन बिना तले की बाल्टी को कभी भी भरा नहीं जा सकता
आदमी जिन्दगी भर बाल्टी को भरने के लिए कुँए कुँए भटकता है. बाल्टी को कुँए में डालने पर वह भरी हुई दिखती है और बाहर निकलने पर खाली मिलती है.  यदि बाल्टी को बदल दो या फिर उसमे  संतोष रुपी पेंदा लगा दो तो बाल्टी भर जायेगी......"    याने "जब आवै संतोष धन सब धन धूरि समान"
सबसे बड़ी बात आज के परिवार में सामंजस्य बिठाने के लिए सास बहू के रिश्तों में खटास नहीं आनी चाहिए. इसके लिए भी संत जी ने अपने विचार कुछ इस तरह प्रकट  किये:
(१) बहू लायें बहू रानी न लायें
जो अपने बेटे की शादी करने वाले हैं वे अपने घर में बहू लायें बहू रानी न लायें. बहू संस्कार लेकर आएगी. बहुरानी कर लेकर आयेगी और जो कर लेकर आएगी वो घर में अपनी सरकार चलाएगी जबकि जो संस्कार लेकर आएगी वो आपके बुलाने पर सर के बल चलकर आएगी. यही नहीं मुनिश्री ने आजकल चरणस्पर्श करने के तरीके पर भी कटाक्ष किया . ....आजकल चरण का नहीं बल्कि घुटने का स्पर्श किया जाता है. चरण स्पर्श का मतलब है कि आपके चरणों में जो आचरण है वो हमें दो. घुटने में सिवाय दर्द के कुछ नहीं होता.  घुटना छूने का मतलब है आपके घुटने में जो दर्द है वह हमें मिल जाय.
ये तो हुई बहू और बहू रानी. 
(२) सास के लिए चार नसीहतें
पहली नसीहत बहू को अपनी बेटी मन्ना (२) बहू कि भूल और  गलती पर बहू को जितना चाहे भला बुरा कह लेना लेकिन उसके मायके वालों को भला बुरा कतई नहीं कहना क्योंकि कोई  बहू उसे बर्दाश्त नहीं कर सकेगी. (३) बहू की बुराई मंदिर या घर के बाहर कभी न करना और (४) सास होने के नाते बहू की चाहत का हमेशा ख्याल  रखना क्योंकि "सास भी कभी बहू थी.
ऐसी  बातों के श्रवण से अखबार के वाचन से कुछ तो असर होता होगा.......................


बहुत बढ़िया बात, छहिंगलिश के शब्द कोष तैयार

कभू कभू बिहनिया ले फुरसतिया ले  अखबार पढ़बे के टाइम मिलथे. जहाँ फुर्सत उहाँ मन भर के पढ़ ले जी. तौ सबले पहिली हमर परदेस के भाखा के शब्द कोष तैयार होए के बारे म  पता चलिस बड़ सुग्घर लागिस. दैनिक भास्कर के येदे खबर आय:
दुर्ग. एससीईआरटी ने छत्तीसगढ़ी भाषा  को लिखित रूप से प्रचलित करने के लिए एक अनूठी पहल की है। छत्तीसगढ़ी को राज्य के लोगों तक आम करने के लिए हर विशेष छत्तीसगढ़ी शब्द को संजोकर उसके अर्थ को अंग्रेजी व हिन्दी में बताने के लिए इस शब्दकोष को तैयार किया है।

एससीईआरटी रायपुर के संचालक नंदकुमार का कहना है कि छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल राज्य है। यहां की आधी से ज्यादा आबादी गांव में रहती है। ऐसे में अंग्रेजी को सभी तक पहुंचाना कठिन कार्य है। यह काम और कठिन तब हो जाता है जब ग्रामीण इलाकों में पढ़ने वाले बच्चों की मातृभाष हिन्दी ना हो। ग्रामीण इलाकों के लोग ज्यादातर स्थानीय बोलियों का प्रयोग करते हैं। ऐसे में बच्चों को अंग्रेजी सिखाने के लिए पहले हिन्दी का प्रयोग करना पड़ता था उसके बाद अंग्रेजी में आते थे। बहुभाष शब्दकोष (छत्तीसगढ़ी-अंग्रेजी-हिंदी) इस दिशा में एक अहम कदम है।
इस बारे में राजीव गांधी शिक्षा मिशन दुर्ग के खंड श्रोत कें द्र समन्वयअधिकारी मिथलेश सिंह ने बताया कि यह एससीईआरटी का पहला ऐसा प्रयास है। इस गाइड को भिलाई दुर्ग के 678 मिडिल स्कूलों को तीन-तीन शब्दकोष दिए गए हैं।
इसे पढ़कर सबसे पहले टीचर इसका लाभ लेंगे व उसके बाद इसके अध्ययन से बच्चों को सीधे छत्तीसगढ़ी से अंग्रेजी में अनुवाद करा सकेंगे। खंड अकादमिक समन्वयक अधिकारी शरद शर्मा का कहना है कि इस शब्दकोष केद्वारा बच्चे छत्तीसगढ़ी शब्द के अर्थ को सीधे अंग्रेजी में जान सकेंगे और उसका प्रयोग कर सकेंगे। इस शब्दकोष में तीसरी भाष के रूप में हिंदी को भी रखा गया है जो शब्दों को समझने में आने वाली दुविधाओं से बचाएगा। साथ ही वाक्यों केप्रयोग से बच्चे अंग्रेजी शब्दों के सार्थक प्रयोग को समझ सकेंगे।

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

गरहन के प्रभाव का परही ???


आज बहुत अद्भुत सूर्य ग्रहण रहिसे. अब शायद कई बखर  बाद ये  अवसर आवै . 
तौ एखर का परभाव रइही एला थोकिन समझातेव
का कहत हे  "गरहन" 
होइया त नई ये  देश मा कोनो  
बड़े भारी अलहन
झन आवै बिपदा कोनो ऊपर 
कैसे ओ हा टल जही
निकाले बर परही आप सबो ल 
एखर बर हल सही सही 
बड़े बड़े ग्यानी हे, बिग्यानी हे घलो इहाँ 
आना नई चाही बिपदा ल, 
बने रहन दे ओला  जहाँ के तहाँ 
जय जोहार .........










"जात पात पूछे नहीं कोई. हरि का भजे सो हरि का होई."


सृष्टि की रचना कैसे हुई? मनु सतरूपा की उत्पत्ति. धीरे धीरे मानवीय सभ्यता का विकास.. वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था... कर्म के आधार पर. परिवार की रचना, परिवार से घर, घर से समाज, समाज से गाँव, शहर, बाकी छोटे छोटे तबके तहसील जिला प्रदेश फिर देश और सब देश मिलकर एक विश्व. चार वर्णों में बंटा यह समाज. विभिन्न जातियों उपजातियों  में बंटा यह समाज. आज का परिदृश्य  कुछ मामलों  में मेरी क्षेत्रीय बोली में लिखी कविता की कुछ पंक्तियों को सही साबित  करता हुआ. पंक्तियाँ पुनः दर्शाई जाती  हैं:
कतेक सुग्घर मिल जुल के रहन दिल माँ रहै सबके प्यार
बड़े मन के लिहाज करै सब पावै छोटे मन दुलार

भुलाके सब रिश्ता नाता ला होगेन कतेक दुरिहा
एही फरक हे काल अउ आज माँ एला तुमन सुरिहा 


पढाई कर लिए जॉब लग गया. वैसे तो पढाई के समय से ही इश्क विश्क का चक्कर चलने लगता है और यदि जॉब में रहते हुए यह चक्कर चला तो बात ही क्या है. हो गयी रजा मंदी. पर इस बाबत पहले से माता पिता / अभिभावकों को जानकारी नहीं रहती. पानी सर से ऊपर हो गया रहता है तो स्व-निर्णय पर इनसे मुहर लगवाने आ गए घर.  इसमें कोई हर्ज नहीं है पर क्या इनका फ़र्ज़ यह नहीं बनता कि जो माँ बाप अपनी संतान की उच्च शिक्षा, उसकी बेहतरी  के लिए हर संभव प्रयास कर उसे उस ऊंचाई तक पहुंचाने  में अपना जी जान लगा देते हैं , उनसे मर्यादा पूर्वक चर्चा कर सहमति ले यह कार्य संपन्न करे.  अरे कोई अपने जिगर के टुकड़े के लिए एकदम निष्ठुर कैसे हो जाएगा. सहमति प्रदान करेगा ही. यह  मानकर चलना  चाहिए कि संतान व माता पिता हंसी ख़ुशी राजी होंगे तो कभी भी मन में किसी भी प्रकार का मलाल नहीं रहेगा अन्यथा मन के किसी कोने में संतान का स्व-निर्णय कचोटता रहेगा. 
अब इस बारे में थोडा जिक्र इस बात का करना अनुचित नहीं होगा कि पहले शादी ब्याह अपने वर्ग के ही लोगों में करने को क्यों कहा जाता था कुछ तो कारण होगा. लड़का हो या लड़की उसके परिवार कि पृष्ठ भूमि, उनके घर का संस्कार यह सब देखा जाता था ताकि आने वाले जनरेशन में भी वही संस्कार बना रहे.  और सबसे बड़ी बात दोनों परिवार में सामंजस्य बना रहे. रहन सहन खान पान में समानता हो. 
चलिए मन शांत रखने के लिए इन पंक्तियों को ही याद रखें   "जात पात पूछे नहीं कोई. हरि का भजे सो हरि का होई."........


आजादी के मायने क्या???

आज हम जिस तरह से अपने देश में अरे देश की बात तो दूर, घर में ही जिस प्रकार की जिन्दगी बिता रहे हैं लगता है वाकई हमें काफी आजादी मिली हुई है. नो नियम, नो कानून  कायदा. लगता है स्वतंत्रता का मतलब  स्वच्छंदता मानकर चलते हैं.यह विचार रोज मेरे मन में यात्रा के दौरान रेल में, रेल से उतरते ही सड़क में, जादा ही उमड़ घुमड़ के आता है.  रेल का डिब्बा खासकर लोकल गाड़ी में यात्री मनमानी करते हुए डिब्बे में कचरा फैलाये रहते हैं वहीँ खा रहे हैं छिलके डब्बे के अंदर ही फेंके जा रहे हैं. समूचा डिब्बा दुर्गन्धमय ,  कारण हमसे  यह नहीं होता कि यदि आप नेचरल कॉल अटेंड करके आये हैं तो कम से कम टॉयलेट का दरवाजा तो बंद कर दें. बंद भी कहाँ से हो. शासकीय संपत्ति आपकी अपनी है की धारणा के साथ उसे पूरा पूरा अपना बना दिया गया होता है मसलन उस पर असंसदीय भाषा लेखन खिड़की दरवाजे से कांच निकाल कर सिटकिनी टूटी हुई आदि आदि .. रेल विभाग भी रोजमर्रे की लोकल गाड़ी में क्या क्या करे . भले ही किताब में सब करने का जिक्र हो.   यह तो हुई रेल के डिब्बे की बात.  बाकी घर के बाहर निकलने पर मैदान सड़क आदि में तो कोई रोक टोक ही नहीं है जी. मैं कोई नई बात नहीं लिख रहा हूँ. .......... बस मन यह मानकर चुप हो जाता है कि "जाही विधि राखे राम तही विधि रहिये". स्वच्छंदता की बात यहीं तक नहीं है ..... हम खुद अपने में झांकें  तो पता चल जाएगा कि कितने अनुशासित हैं हम स्वतः?  अनुशासन शब्द का बोध होते ही "दंड" समझ बैठते हैं. 
ठीक है भाई ............
शुभ रात्रि जय जोहार....


बुधवार, 13 जनवरी 2010

"मन का क्या है इसमें कुसूर"

साहित्य हो पुराण हो                                     
बाइबल हो कुरान हो
संतों का व्याख्यान हो
वाचन श्रवण में ध्यान हो
कुछ बातें इनकी कर जाती हैं असर जरूर
लेकिन क्या करें, चहुँ ओर जगत का हाल देख
फैला घर गृहस्थी का जंजाल देख
हो नहीं पाता अमल, मन का  क्या  है इसमें  कुसूर
अभी हाल ही में अहमदाबाद कोटा की यात्रा संपन्न करके लौटे.  पूरी यात्रा के दौरान अहमदाबाद वाले मित्र द्वारा भेंट की गयी किताब "ओशो कृष्ण स्मृति" पढ़ते रहे.  जो बातें हमें अच्छी लगी नोट करने लग गए. आज मन हुआ इन्हें यहाँ भी चिपका दिया जाय:-
 (१)

  "अर्जुन" भला आदमी है. अर्जुन शब्द का मतलब होता है, सीधा सादा. तिरछा-इर्छा जरा भी नहीं. अ-रिजु. बहुत सीधा सादा आदमी है. सरल चित्त है. देखता है की फिजूल की झंझट कौन करे, हट जाओ. अर्जुन सदा ही हटता ही रहा है. वह जो अ-रिजु आदमी है, जो सीधा सादा आदमी है, वह हट जाता है. वह कहता है झगडा मत करो, जगह छोड़ दो".
(२)
समस्त त्यागवादी सिर्फ दुःख पर जोर देते हैं इसलिए वह असत्य हो जाता है. समस्त भोगवादी सुख पर जोर देते हैं इसलिए वह असत्य हो जाता है. सार यह है की केवल एक पहलू को जीवन का सार नहीं मानना चाहिए. सुख है तो दुःख है, भोग है तो वैराग्य है, जन्म है तो मृत्यु है. केवल सुख की कल्पना अथवा केवल संसार में केवल दुःख ही दुःख है यह मानना बेमानी है.
(३) द्रौपदी
यह बहुत ही अद्भुत स्त्री होनी चाहिए. अन्यथा साधारण स्त्री इर्ष्या में जीती है. अगर हम पुरुष और स्त्रियों का एक खास चिन्ह खोजना चाहें तो पुरुष अहंकार में जीते हैं, स्त्रियाँ इर्ष्या में जीती हैं. इर्ष्या अहंकार का पेसिव रूप है और अहंकार इर्ष्या का एक्टिव रूप. अहंकार सक्रिय इर्ष्या और इर्ष्या निष्क्रिय अहंकार..........
हमारे समस्त ब्लॉगर मित्रों को संक्रांति पर्व की बहुत बहुत बधाई

ब्लॉग लेखन ला चालीसा लग गे

ये गाड़ी हा धीमी गति के लोकल आय
 रेंग डरे हे बड़े ब्लोगरीयन के गाड़ी बड़ दुरिहा  
नई  सकस  तैं  एखर  दूरी  नपाय 
तोर  गाड़ी  त  ट्रायल  मा  हे  अभी
अढाई  कोस तक  हे पहुंचे  पाय (चालीस पोस्ट होए हे )
मन हा कहत हे चलै  भले   धीरे   
कछुआ सही  आगू  बढ़ते  जाय
स्पीड  ब्रेकर  अब्बड  अकन  परही
तोर  जी  ओकर  ले  झन  घबराय
टिपियावन पाए के लालसा  मत राखबे
सुग्घर  मेटर  लिखावत  जाय; अउ
घर ऑफिस के बूता निप्टाबे
इही मा झन रहिबे बिप्तियाय
(ये सब अपन मन ल कहत हौं)
जय जोहार...........

सोमवार, 11 जनवरी 2010

मकर संक्रांति (सूर्य का उत्तरायण होना )

हिन्दुओं का अंग्रेजी त्योहारों की भांति                                               
फिक्स डेट १४ जनवरी को मनाया जाने वाला इकलौता  पर्व
मकर संक्रांति
पालें न मन में अपने किसी प्रकार की भ्रान्ति
बस करें प्रार्थना यही प्रभु से
सारे जगत में हो अमन चैन व सुख शांति
            (२)  
पंडित जी समझाते हैं संक्रांति का डिटेल
अमुक योनि है अमुक अवस्था है, अमुक वस्त्र धारण किये हुए हैं, अमुक प्राणी है , अमुक समय
अमुक पात्र में अमुक पदार्थ का सेवन करते हुए आदि आदि .... "संक्रांति" गयी है 
साथ हि रिजल्ट भी बताते हैं; प्रभावित चीजों की तो "गयी" है
याने उस उम्र के प्राणियों  की खाट लग जावेगी 
प्रभावित द्रव्यों के बढती कीमतों की वजह से जनता  की वाट लग जावेगी
और कहते हैं;
ऋतु परिवर्तन का समय है यह , सूर्य उत्तरायण होता है
पाप पुण्य में उलझा मानव,
स्नान दान कर तिल गुड पान कर
चल पड़ उस जगह जहाँ ग्रन्थ परायण होता है.
(३)

मैंने उक्त बातें अपने बचपन की याद के आधार पर लिखी हैं. वैसे इन चीजों को क्षेत्रीय बोली में लिखना चाहता था. खैर अब लिख देता हूँ ;
कतको दान पुन करा ले महराज
इहाँ तो रोज संकरायेत जाथे
आतंकी नक्सली डाकू संग मनखे रोज अपन गला कटाथे
कोनो सड़क मा बेतरतीब चलैया के मोटर गाड़ी में आये दिन रेताथे
मंहगाई  रात दिन बाढ़त जाथे दान पुन कर सकन नहीं
ये हालत मा संकरायेत महराज करबे हमर जतन तहीं 

जम्मो झन ल आने वाला  ये संकरायेत तिहार के एडवांस मा  बहुत बहुत बधाई
जय जोहार






 

रविवार, 10 जनवरी 2010

ब्लॉग की महत्ता

ब्लॉग
भीतर छिपी हुई प्रतिभाओं को
निखारने का, उभारने का  उत्तम माध्यम
पर इस बारे में कुछ ब्लोगरों का अभिमत
खींच रहा है ध्यान
डाक्टर हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के
लेख  "साहित्य की महत्ता " में लिखी
इन  पंक्तियों की ओर .....
"आज मनुष्य अपनी रेखा बड़ी करने
के बजाय दूसरों की रेखा छोटी करने में लगे हैं"
पूरा संदर्भ याद नहीं आ रहा है क्योंकि आज से ३० वर्ष पहले  स्कूल के दिनों में पढ़ा था.
ठीक है भाई अपनी अपनी सोच
अपने अपने विचार
टेंशन लेने का नई
डालना न कभी हथियार

शनिवार, 9 जनवरी 2010

तकनालोजी का असर "दिल्ली क्या अब लगता नहीं सात समंदर पार भी दूर"

प्रौद्योगिकी  या  कहें टेक्नोलोजी 

मानव मस्तिष्क का ही कमाल
जीवन के हर क्षेत्र की समस्यायों को सुलझाने में
मार रहा है बाजी
बशर्ते बुराइयों को न करें ग्रहण
देर नही लगती, परिवार की खुशियों को
लग जाता है "ग्रहण"
कंप्यूटर, सेटेलाईट, इन्टरनेट की
माया से वाकिफ हैं सभी
कैसे करूं बयां, उन यादगार लम्हों को
गुजारा है  हमने नेट फ्रेंड के घर अभी अभी
दिसम्बर का महीना, नौकरीपेशा लोगों के लिए उनके खजाने में यदि छुट्टियाँ बची हों तो उन छुट्टियों को खरचने में गुजरता है. खासकर महीने का आखिरी हफ्ता. हम भी परिवार के तीन सदस्य (हम दो हमारे दो में से बिटिया भर) प्रोग्राम बयाये कि अहमदाबाद के  हमारी घराड़ी के अंतरजाल मित्र,  जिनसे जीजा साले का रिश्ता कायम हुआ है (हम जीजा वो साले), के बुलावे पर अहमदाबाद जाना है और राजस्थान कोटा के बंसल क्लासेस  में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में प्रवेश हेतु प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हमारे छोटे जनाब (बेटा) से मुलाकात कर वापस भिलाई अपने घर ठीक साल के अंत में लौट आना है. छब्बीस को रवाना हो गए अहमदाबाद एक्सप्रेस से. रिजर्वेशन था अहमदाबाद एक्सप्रेस में. स्लीपर क्लास में.  यात्रा के दौरान केवल अपने तक सीमित रहें ऐसा प्रायः नहीं होता है.  अतएव हम तीनो का एक ही कम्पार्टमेंट में (ऊपर नीचे व बीच) मिला था रिजर्वेशन. हमारे सामने भी एक ही परिवार के तीन सदस्यों का बर्थ था.  धीरे से परिचय का सिलसिला शुरू हुआ. परिचय के दौरान पता चला  हम दोनों एक ही उपनाम वाले हैं और वे भी केंद्र शासन के ही कर्मचारी हैं(रेल विभाग में कार्यरत). धीरे धीरे एक दूसरे की रूचि का पता चला.  अध्यात्म व पूजा पाठ की बातें चलती रहीं.  अपने अपने अनुभवों का बखान होता रहा. यात्रा बोझिल नहीं  नहीं लगी.  २७ को तकरीबन आधे घंटे की देरी से हमारी लौह पथगामिनी अपने अड्डे (लौहपथगामिनी गमनागमन विश्रामस्थल) पहुची.  वहां साले साहब पहुच चुके थे अपनी बिटिया के साथ.  मिलते ही संस्कार व शिष्टाचार को जिन्दा रखते हुए अभिवादन का दौर चला.  बकायदा उन्होंने हमारे पैर छुए. साथ में यात्रा कर रहे भाई साहब  से भी गले मिल एक दूसरे को अपने अपने घर आने का निमंत्रण देते हुए विदा लिए.  हम अपने इस साले साहब के बारे में संक्षिप्त में यहाँ बताना चाहेंगे की वे
फलों के अढ़तिया हैं. स्पष्टवादी.  हमने उन्हें मित्र बनते ही कहा था, कुछ ही दिनों की मुलाकात के बाद ; "आम" और अंगूर के बीच अर्जुन भाई ख़ास हैं.  दूर रहकर भी लगते कितने हमारे पास हैं.  घर पहुचने पर परिवार के सभी सदस्यों (सरहज व  भतीजा) द्वारा पहली मुलाकात में ही, बड़ी आत्मीयता के साथ  स्वागत किया जाना अविस्मर्णीय बन गया.  बच्चे थोड़ी देर में ही एक दूसरे से हिल मिल गए.  परंपरा रही है, कोई भी व्यक्ति कहीं भी जाता है भेंट स्वरुप कुछ न कुछ मेजबान के घर ले जाता है. यह संबंधों को अक्षुण बनाये रखने के लिए (स्मृति स्वरुप) किया जाता है, प्रतिष्ठा के लिए नहीं. अतएव हमारी श्रीमती जी ने इसकी औपचारिकता पूरी की. भोजन व   तनिक  विश्राम के पश्चात् उस दिन, दिन क्या शाम हो चुकी थी, केवल साबरमती आश्रम का भ्रमण कर आये. दूसरे दिन 28 तारीख  को  मुख्य स्थानों में से कुछ ही स्थान देख पाए क्योंकि २8 को ही रात की ट्रेन से अपने बेटे से मिलने "कोटा" जाना था.  देखे हुए स्थानों में  इस्कान मंदिर, वैष्णव देवी मंदिर. त्रिदर्शन मंदिर व प्राचीन धरोधर

 

                                                                  " अडालज की वाव"         
मुख्य रहे.
अहमदाबाद से  19 किलोमीटर उत्तर में यह स्टेप वेल रानी रुदाबाई  द्वारा निर्मित  वास्तुकला का एक  अद्भुत नमूना  है और निश्चित रूप से गुजरात के बेहतरीन स्मारकों में से एक है. 
                         हमारी श्रीमती की एक और अंतर-जाल  दोस्तानी से भी मुलाकात का अवसर बना.  उन्हें चलित दूरभाष द्वारा सूचित किया गया कि हम परिवार सहित अहमदाबद आये हुए हैं.  सूचना मिलते ही पति पत्नी जहाँ हम रुके थे वहीँ 28   को शाम  तीन बजे  पहुंचे. २-३ घंटे का समय बड़े खुशनुमा माहौल में कैसे बीता पता नहीं चला.  भाई अर्जुन की गहरी  आत्मीयता कभी भुलाई नहीं जा सकती. रात साढ़े नौ बजे की ट्रेन थी. एक घंटे पहले उनके घर से विदा लिए जैसा कि   उस दिन शहर का पूरा रास्ता मुहर्रम  की वजह से ताजियों के जुलुस से जाम था.  समय  पर स्टेशन पहुँच गए . विदा लेते समय माहौल थोडा ग़मगीन हो गया था क्योंकि दोनों परिवारों  में अनूठा अपनत्व हो गया था. आँखे भर आयीं जब  ट्रेन छूटने  लगी.  
                            २९ की सुबह कोटा पहुच गए. स्टेशन से करीब १२-१४ किलोमीटर दूर स्तिथ हॉस्टल गए बेटे के पास. हॉस्टल में ही अभिभावकों को २-३ दिन  रुकने की व्यवस्था कर दी जाती है. बेटे की पढाई लिखाई व उसकी सेहत की जानकारी लिए.  बच्चों को दूर दराज भेजने के बाद अभिभावकों की जादा दयनीय स्थिति हो जाती है. बच्चे को भी इसका आभास होता है किन्तु फिर भी वह शायद घर से (खाने पीने के मामलों को छोड़) थोडा ठीक अनुभव करने लगता है (स्वतंत्रता जो मिली होती है टोका टाकी सुनने से बचने की  ) २९ -३०  दो दिन उसके साथ बिताये.  अच्छा लगा.  30 की रात ११.०५ बजे की ट्रेन से ३१ की रात १०.३० बजे अपने घर वापस. 
आये के बाद तुरते लिखे रेहेंव "ल उ टे हौं अभीच्चे"
द इ स ने ताय भैया जात्रा करें गा 
जय जोहार  जी