आईए मन की गति से उमड़त-घुमड़ते विचारों के दांव-पेंचों की इस नई दुनिया मे आपका स्वागत है-कृपया टिप्पणी करना ना भुलें-आपकी टिप्पणी से हमारा उत्साह बढता है

सोमवार, 31 मई 2010

क्योंकि यहाँ तो सब अपना हाथ है , जगन्नाथ

पहले हम विचलित हुए, 
निकाले अपने मन के  गुबार, मित्रों ने भी दिया साथ 
पर अब धीरे धीरे समझ रहे हैं, माया नगरी की माया को 
रक्त बीज सब बन रहे यहाँ (बेनामी छ्द्म्नामी ब्लोगरों की उत्पत्ति)
क्योंकि यहाँ तो सब अपना हाथ है , जगन्नाथ 
प्रतीक्षा है, इस सोपान के समापन का
नव सृजन के आगमन का......
जय जोहार............. 

ब्लॉग जगत की लीला है अनुपम अपरम्पार

ब्लॉग जगत की लीला है अनुपम अपरम्पार
क्यों हम दांव पेंच में पड़ रहे,
बस, अब नहीं पड़ेंगे,
लिखते रहेंगे,  उमड़ते घुमड़ते विचार
क्योंकि.......
शब्द सँवारे बोलिए शब्द के हाथ न पाँव
एक शब्द औषधि करे एक शब्द करे घाव
सुप्रभात व जय जोहार.........

रविवार, 30 मई 2010

साप्ताहिक अवकाश रविवार ब्लॉग जगत के पापा जी अवतरित

साप्ताहिक अवकाश रविवार  
ब्लॉग जगत में "  पापा जी " अवतरित हुए हैं  
दो चार ब्लॉग में जा बच्चों को डांट पिलाया है 
वैसे डांट पिलाने के पहले सहलाया है 
अभी तो सहलाया है, बाद में देखेंगे 
कहते हुए देखो कैसे मैंने सबको हिलाया है 
धन्य हैं " पापा जी  "

जिस प्रकार से समाज के लिए, देश के लिए, या कहें विश्व के लिए उत्कृष्ट कार्य के लिए "पद्मश्री" की उपाधि दी जाती है उसी प्रकार ब्लॉगजगत में छद्म नाम से ब्लॉग लेखन में पारंगत लोगों को "छद्म श्री" से भी सम्मानित करने का प्रस्ताव रखा जावे
जय जोहार........  

शनिवार, 29 मई 2010

पूछ रहा है मन अपने आप से कुछ सवाल:

१.     क्या मैं (याने जनता) भारत का नागरिक हूँ.
२.     मुझे क्या सचमुच अपने वतन से अपने माँ बाप जितना प्यार है?
३.    क्या मुझे राष्ट्र को समर्पित या गाँव शहर में जनता के पैसे से (कर के माध्यम से वसूले गए) बने चाहे वह  शौचालय  हो, जल संग्रहण के लिए बनी टंकी हो, बस स्थानक में, रेलवे स्टेशन, या कहें सार्वजनिक स्थल में बने तमाम सुविधा की चीजें हों अथवा अच्छे स्मारक हों, अथवा कहें उपयोगी चीजें हों, उसकी हिफाजत भले न कर पाऊं, उन चीजों को बर्बाद करने की तो नहीं सोचता हूँ या कर ही देता हूँ? 
 ४.    मैं जन प्रतिनिधि चुन कर गाँव की पंचायत से लेकर संसद तक भेजता हूँ पर क्या मैं कभी उनके द्वारा कराये  जा रहे कार्यों की समीक्षा कर व्यक्तिगत भले न हों सामूहिक रूप में कमी बेसी के बारे में उन प्रतिनिधियों को  अवगत कराता हूँ?
५.      यदि मुझे किसी कार्यालय में अपना निजी काम करवाना है, और वहां कतार में खड़े होने की जरूरत पड़ती है, तो क्या मुझे यह नहीं लगता कि मेरा काम जल्दी हो चाहे बड़े अफसर कि पहुँच से हो या प्रलोभन देकर? क्या मुझे यह नही लगता कि मैं ऊंचे ओहदे वाला हूँ मेरा काम तो अफसर अपनी कुर्सी पर बिठाकर कैसे  नहीं करेगा? कैसे ठेस पहुँचती है, यदि काउंटर में कोई मना कर दे, मन कहता है दो टके  की तनख्वाह पाने  वाला अदना सा कर्मचारी, मुझे कतार में खड़े होने को कह रहा है. 
६.      मेरे जेहन में कई ऐसे प्रश्न उठ रहे हैं.  संक्षिप्त में राष्ट्र हित में एक आम जनता होने के नाते मैं अपनी जिम्मेदारियां किस कदर निभा रहा हूँ?  हर गली में, घर में भजन करते मिल जाते हैं सरकार भ्रष्ट है, अत्याचार हो रहा है, आदि आदि, पर क्या यह  सोचा गया है कि उस स्थान पर बैठा व्यक्ति कहाँ से गया है. हम और आप से ही ना. फलां मंत्री बन गया, क्या  पूछना है, जश्न और फटाके... क्यों भाई ? हमें अपने अपने ओहदे के अनुसार कुछ शक्तियां मिल जाती हैं जिसे  अधिकार कहते हैं.  और अधिकार मिला नहीं कि कर्त्तव्य गया चूल्हे में. यह कोई व्यक्ति विशेष के लिए नहीं  है, सामान्य सी बात है...... गैर शासकीय संस्था बनाई जा रही है कि वह सरकार के कार्यों की निगरानी  रखे या सार्वजनिक हित के काम कराएं, प्रस्तावना भेजें. शायद इसके लिए भी राशि शासन से  स्वीकृत होती  है. अब गैर शासकीय संस्था इस पर कितनी खरी उतरी  है अलग बात है.  बस मन में ही केवल यह बात उठती है, एक प्रतिशत हम अपनी जिम्मेदारी नहीं समझ रहे हैं. संक्षिप्त में हम स्वतः सोंचें हम क्या कर रहे हैं, हमारा क्या योगदान है,  क्या हो सकता है? फिर न केवल ऊँगली उठायें उतर जायं मैदान में और सुधारात्मक कदम उठायें.  अकेले चना भांड नहीं फोड़ सकता. अतः संगठित होकर,  निःस्वार्थ, अवगुणों को दूर भगाने में जुट जायं. नहीं तो फिर "कोऊ नृप होय हमै का हानी" का सिद्धांत तो चल ही रहा है.  
जय जोहार...........

का साग खाए ले शुरू, मात जाथे बाद मा रमझाझर

जाड़ के दिन माँ येती बिहनिया के काम बूता करे के बाद घर गोसईनीन मन काय करै. एक दू घंटा सुतिन फेर चार साढ़े चार बजे संझा जुवार एक जघा जुरियाये लगिन. तहां ले शुरू गोठियाना. वइसे ये जुरियाना हा गाँव माँ का का होवत हे एखर खबर मिले के अस्थान घलो आय. भले ये खबर हा कतका सही हे कतका बनावटी ये बात अलग आय. 
हाँ एक बात जरूर हे बहुत कम अइसे  देखे जाय के एक दूसर के नाव (नाम) ले के कोनो ल  संबोधित करै. अब देखौ एक दृश्य; शुरू होवत हे गोठियाना (नाव मन मनगढ़ंत आय पढ़ैया मन अपन ऊपर झन ले लेहू) 
मंगलू के दाई: "का साग खाए" ओ सुकारो के भौजी? 
सुकारो के भौजी:  ये दे गर्मी के दिन माँ काहीं बने असन सागो नई आवै, भइगे कोंहड़ा  अमटहा (मही याने छांछ वाला) रांधे रेहेंव. 
मंगलू के दाई: वाह एला भइगे कथस, अम्टाहा साग हा तो अब्बड़ मिठाथे वो. मोर लार गिरे लागिस.
अउ दू तीन झन बइठे रहै ओहू मन मंगलू के दाई के बात माँ हामी भरे लगिन. 
सुकारो के भौजी(मंगलू के दाई ला):  ले का होगे बांचे हवे. ले जाबे . 
अब अतका तक तो ठीक हे. फेर होगे चालू ; 
मंगलू के दाई हा धीमे अवाज मा तिसरैया बइठे रहै तौन डहर इसारा करके केहे लागिस: 
"भइगे ओ हमर गाँव के इज्ज़त दांव मा लग गे हे टुरी टूरा मन के बढती उम्मर का का नई होवत हे 
अब देख न लछमिन के दाई ददा ला फिकर नई ये लछमिन के गोड़ हा फिसलत हे कोन जनि जब देखबे तब कोन टूरा आथे बने शहरिया कस फूल पेंट पहिने फटफटी मा अउ टुरी टूरा दूनो चलिन. दाई ददा तो निकले रथें काम बूता माँ." बस ये बात निकलना रहिसे के लछमिन के दाई के होगे शुरू : मोर टुरी के चरित्तर माँ तय लांछन लगाथस जबरदस्ती. पहिली अपन घर ला देख. अब टूरी टूरा के बात ले हट के बिहाता मन ऊपर आगे. अपन शादी शुदा ननद ला देख. अपन मइके माँ बइठे हे.  कोन जनि खाखर संग फंसे हे के ओखर घरवाला हा ओला छोड़ दिस. अब हो गे इनखर मन माँ शुरू एक झन कहत हे तय ऐसे हस दूसर कहत हे तय ऐसे हस दूनो डहर ले मर्यादा ले बाहिर के  भाखा के बान चलाई शुरू राणी दुखहाई,  अउ भइगे इहाँ लिखे के लाइक नो है, तइसन तइसन गारी .... इहाँ तक नौबत आगे के मार पीट माँ उतर आईन.  मात गे रमझाझर.......... ( यहाँ सारांश यह है कि गाँव में प्रायः महिलायें एक स्थान पर इकट्ठे हो जाया करती थीं सब्जी भाजी से शुरू कर घर घर के किस्से शुरू कर देती थीं कभी कभी वहीँ बैठी महिलायें एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप शुरू कर देती थीं और रमझाझर याने महाभारत शुरू हो जाता था.) ........जय जोहार.   

शुक्रवार, 28 मई 2010

आतंकवाद, नक्सलवाद ..... खून खराबा

लाहौर में आतंकियों द्वारा लगभग 2000 लोगों को मस्जिद में बंधक बनाकर रखा जाना, इधर अपने देश में नक्सलियों द्वारा रेल की बोगियां उड़ा देना..... रोज रोज इस तरह की घटनाएं आम बात हो गयी हैं. क्या है इसका समाधान ? सब मिलकर सोंचें और रखें अपने अपने विचार. जय जोहार.....
  आतंकवाद नक्सलवाद....खूनखराबा                                                                                                 ये सब क्या हो रहा है.                           

छत्तीसगढ़ी के गुरतुर गोठ, (छत्तीसगढ़ की मीठी बोली)

छत्तीसगढ़ी बोली को आप अंग्रेजी की तरह बोली जाने वाली कह सकते हैं. मिसाल के तौर पर एक वाक्य लेते हैं "पिताजी भोजन कर रहे हैं"  कर रहे हैं शब्द का प्रयोग  अंग्रेजी में बहु वचन के लिए होगा (means plural number) नहीं तो साधारण तौर पर लिखेंगे Father is eating. हम हिंदी में बड़ों के प्रति आदर भाव प्रकट  करने के लिए  "कर रहे हैं"  प्रयोग करते हैं.  पर छत्तीसगढ़ी में अंग्रेजी के माफिक कहेंगे ददा खाथे. ददा याने पिताजी. खाथे याने खा रहे हैं.  ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं. मेरा बचपन गाँव में बीता है. पहले गाँव में मनोरंजन के कोई साधन नहीं हुआ करते थे. ज्यादा हुआ किसी चौपाल में छोटा मोटा गीत संगीत का (फ्री स्टाइल में गाने बजाने वालों का) कार्यक्रम होते रहता था. वह भी किसी त्यौहार विशेष के अवसर पर. अन्यथा महिलायें कहीं पर एक साथ बैठ कर बतियाते रहती थीं. अन्य व्यक्ति के बारे में चर्चा कर, निंदा कर, उन्हें मजा आता था. बतौर प्रहसन इसे लिखा जावेगा. कृपया प्रतीक्षा करें.  मुझे याद आ रहा है उच्चतर माध्यमिक शिक्षा ग्रहण करने के दौरान हिंदी के पीरिएड में व्याख्याता महोदय द्वारा किसी विषय पर निबंध लिखने का तरीका क्या क्या होता है यह उदाहरण छत्तीसगढ़ी बोली के माध्यम से बताया गया. उन्होंने शुरू किया "भूमिका" से. अब भूमिका क्या होती है इसे समझाने के लिए जो मजेदार बात उन्होंने बताई वह थी गाँव  में यदि किसी के घर भोजन बन रहा हो और भोजन बनाने वाली को पता चलता है कि सब्जी में डालने के लिए नमक नहीं है तब वह पड़ोस से नमक मांगने जाती है और बतौर भूमिका के पड़ोसन को आवाज देते हुए कहती है; "हवस का ओ मंगलू के दाई ? का साग रांधत हस ओ? तात्पर्य मंगलू की माँ क्या सब्जी बना रही हो? लेना उसे वहां से नमक है पर बतौर भूमिका वह पहले यह प्रश्न कर रही है. यह अलग बात है कि कभी कभी संवाद यहाँ से शुरू होकर महाभारत में भी तब्दील हो जाता था. प्रहसन के रूप में एक छोटा उदाहरण दिया जावेगा ..... अगले  पोस्ट में.
जय जोहार......... 

विश्व में हिंदी भाषा का स्थान क्या है

हमारे देश की विशेषता क्या है यह प्रायः सभी जानते हैं.  अनेकता में एकता इसी राष्ट्र में देखने को मिलती है. अलग अलग भाषा, अलग बोली, रहन सहन में भी भिन्नता पर बस एक अवधारणा "हम सब एक हैं" यही मुख्य विशेषता है. प्रत्येक राष्ट्र के लिए वहां बोली जाने वाली भाषा का स्थान महत्वपूर्ण है. भाषा सामाजिक संपत्ति है. यह केवल विचार अभिव्यक्ति का साधन नहीं है, अपितु राष्ट्र विकास तथा आर्थिक विकास का उपकरण भी है.  पर यहाँ  हमारी राष्ट्र भाषा, राजभाषा हिंदी का अपने ही राष्ट्र में दर्जा क्या है? आज प्रत्येक व्यक्ति अपनी राष्ट्र भाषा में बात करने के बजाय, भले आती हो या न आती हो, अंग्रेजी में बात चीत करने में गर्व महसूस करता है.  आज मेरे हाथ एक किताब लगी "विश्व भाषा हिंदी"  वैसे तो इस पुस्तक में बड़े बड़े विद्वानों के विचार समाचार संकलित हैं पर हिंदी का स्थान विश्व में कौन सा है यह ज्ञात होने पर यहाँ लिख देने का मन हुआ सो डॉक्टर जयंती प्रसाद जी नौटियाल, डी. लिट. जी द्वारा शोध के दौरान एकत्रित किये गए आंकड़ों के अनुसार विश्व में बोली जाने वाली भाषाओँ में हिंदी का स्थान पहला पाया गया और दूसरे स्थान पर रही चीनी. वर्ष दो हजार पांच के शोध पर आधारित आंकड़ा यह है कि विश्व में हिंदी जानने वाले तकरीबन एक हजार बाइस (1022) मिलियन लोग हैं जबकि चीनी (मंदारिन ) जानने वाले नौ सौ (900)  मिलियन लोग. मुझे आश्चर्य होता है कि इसके बावजूद हम अंग्रेजी के गुलाम अभी भी बने हुए हैं!  जय जोहार.......

गुरुवार, 27 मई 2010

देश के रक्षक या हैं ये नाग "तक्षक"

कारगिल की लड़ाई
बीत गए ग्यारह साल 
गीदड़ ले गया तमगा 
ओढ़ के शेर की खाल 
सच कभी मर सकता नहीं
धर धीरज कर इन्तेजार
सब्र का फल होए मीठा 
क्या पता नहीं है यार 
ये पंक्तियाँ अभी अभी फौज में हुए खुलासे के लिए है. बस,  सब जगह अपनी प्रतिष्ठा, और स्वार्थ पूर्ति के लिए लोग क्या क्या नहीं कर बैठते. फ़ौज में हुई इस तरह की हरकत उन अफसरों की ही इज्ज़त नही डुबाता बल्कि देश की इज्ज़त पर भी प्रश्न चिन्ह लग जाता है कि कैसी सैन्य व्यवस्था है इस देश की. बची खुची कसर मिडिया दो-तीन दिनों तक इस खबर को सुर्ख़ियों में बनाए रख कर पूरी कर देता है. सबसे बड़ी बात ग्यारह साल लग गए इसके लिए. होना यह चाहिए था कि जिस अफसर के साथ ज्यादती हुई थी तत्काल सक्षम अधिकारी के समक्ष साक्ष्य सहित अपनी बात रखते उनसे बात यदि बनती नहीं तब आगे बढ़ते जाते. कुसूरवार पर कार्रवाई होती. बात देश के बाहर नहीं जाती. कुसूरवार को सबक भी मिल जाता. अब आज ढिंढोरा पिटा जा रहा है. .............
जय जोहार............

छत्तीसगढ़ी पुडिया

जैसा कि कल हमने ललित भाई के आने के समाचार का पोस्ट लगाया, उसमे क्षेत्रीय बोली का प्रयोग भी किया। टिप्पणी भी आई है जैसे को तैसा का विचार के साथ याने छत्तीसगढी मे। आज सोचा क्यों न अपनी बोली मे एक छोटी सी पुडिया यहां छोड़ दी जाय।  लीजिये मै ब्लोग लिखने की लत क्यों पाला ? इसका उत्तर छत्तीसगढ़ी में  "मोला ललित भाई लुति लगाइस तेखरे पाय के इंहां बैठे बिना चैन नइ परै। अर्थात ललित भाई ने उकसाया ब्लोग मे आने के लिये इसीलिये रोज यहां बैठे बिना चैन नही पड़ता। लुति लगाना = उकसाना। तेखरे पाय के = इसी वजह से या इसी कारण से।(१)  धूप बडी तेज है।(२)  धरती तप रही है।(३)  बिना जूते चप्पल के आप पैर नही रख सकते। अपनी बोली मे " (१) कतेक तीपत हे ये घाम हा। (२) भोंभरा जरत हे। (३) बिन पनही के तैं रेन्गे नई सकस।" धूप बडी ………पैर नही रख सकते" वाक्यांश के अर्थ  के लिये सन्केत है हिन्दी शब्दों का रन्ग(१)  नीला और छत्तीसगढी के लिये लाल। (२) हिन्दी के लिये  बैगनी छत्तीसगढी के लिये गुलाबी। (३) हिन्दी के लिये सन्तरा और छत्तीस्गढी के लिये भूरा। अभी इतना ही। …  हाँ ललित भाई लगता है थकान की वजह से अभी दिखाई नही पड़ रहे हैं। वैसे कल बोले थे कि अभी पठन पाठन मे लगेंगे फिर अपनी गाड़ी शुरु करेन्गे। ……जय जोहार्…

बुधवार, 26 मई 2010

"मैं गोंडवाना मा हंव गा"

तारीख २६ दिन बुधवार.  जिन्दगी के रोज के ढर्रे के मुताबिक भिलाई से कर्तव्यस्थली राजनांदगांव आगमन. दोपहर के डेढ़  बज रहे थे, बड़ी बड़ी मूंछों वाले जनाब, "शेर सिंह" के नाम से संबोधित किये  जाने वाले, दुलारू ललित भाई का फ़ोन आया. "मैं गोंडवाना मा हंव गा" (याने मैं गोंडवाना ट्रेन में हूँ) मैं  समझ गया साहब दिल्ली से लौट रहे हैं. आइसक्रीम का क्रीम (दिल्लीवाली aaiskreem) अब बचा नहीं है.    मैं बोला "गोंडवाना अभी?  बोले: "हाँ रे भाई लेट चलत हे" (ट्रेन लेट है). तोर ड्यूटी ख़तम होए के बेरा मा पहुँचही, तहूँ आजा ट्रेन मा संघर जाबो. (हाँ ट्रेन लेट चल रही है, तुम्हारी ड्यूटी ख़तम होने के समय पर पहुंचेगी राजनांदगांव, आ जाओ स्टेशन,  साथ चलेंगे). हमारे साथ एक समस्या है हम अपनी ओर से कुशल क्षेम पूछने के आलावा और कुछ नहीं कर पाते.    किसी की क्या समस्या है, चलो हल कर दें, तत्काल नहीं सूझता.  यदि किसी से परिचय हुआ हो और वह रिश्ते में बदल गया हो तो अपनत्व के नाते उससे अपनी  बात कह देना  सहज नहीं है. लेकिन इस बात को मानना पड़ेगा कि ललित भाई साहब ने हमें अपना समझ एक अवसर प्रदान किया हमसे सेवा लेने का. अच्छा लगा. सो चले आये हम भी ट्रेन में. मिले. बहुत मजा आ गया. और तो और दुर्ग पहुँचने पर मूंछों वाले हमारे ललित भाई के अनुज श्री जी. एल. शरमा जी, कृषि विश्वविद्यालय  रायपुर  में पदस्थ,    जिनकी जन्म तारीख भी वही है जो हमारी जन्म तारीख है, से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ. दर असल वे  कुछ अपने काम से दुर्ग आये थे  कार से. ललित भाई द्वारा उनसे चलित दूरभाष से संपर्क करने पर ज्ञात हुआ. भाई जी के कहने पर निर्णय लिया गया  कार से ही अपने गंतव्य स्थान के लिए रवाना हुआ जाय. मेल मिलाप हुआ. जलपान इत्यादि हुआ. फिर ललित भाई एंड कंपनी अपने ठिकाने की ओर रवाना हुए और हम भी हमेशा कि तरह अपनी डुगडुगी (मोपेड) स्टेशन के स्टैंड से उठा अपने घर की ओर...........जय जोहार........! 

शेर सिंह की दिल्ली यात्रा सम्पन्न

                                                            शेर सिंह की दिल्ली यात्रा सम्पन्न 
चले आये मूछों वाले जनाब,  कर दिल्ली की सैर 
हमने पढ़ा था  ब्लोगर्स मीटिंग का समाचार 
भले ही शेर सिंह कुछ न बताएं अभी 
हम इस निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं 
यहाँ दिखने  वाले सभी अपने हैं, 
हो न किसी का किसी से बैर 
प्रतीक्षा कीजिए ............ 
यात्रा विवरण थोड़ी ही देर में 
जय जोहार................

मंगलवार, 25 मई 2010

गिरना

गिरना 
गिर कर सम्हलना, सम्हल के उठना 
नामुमकिन नहीं है 
मगर गिर गए कहीं दुनिया की नजरों से 
ऐसे गिरे हुए को उठाना मुमकिन नहीं है 
यदि सोचते हैं, दुनिया से उठ जाना बेहतर होगा 
तो उठ तो जाओगे, मिलेगी जन्नत या फिर दोज़ख 
ठिकाना बताना मुमकिन नहीं है.
                              
                              वास्तव में जन्नत भी यहीं है और दोज़ख भी. यदि आपका कृत्य अच्छा है,  स्वाभाविक है यश मिलेगा. दूसरों के काम आकर आप अपने आपको भाग्यशाली समझेंगे. आपके लिए भी तैयार रहेंगे लोग मर मिटने को. इस सुखानुभूति को ही जन्नत (स्वर्ग) समझें. इससे बड़ा दोज़ख और क्या हो सकता है जब हमारी इज्ज़त पे आंच आये. लोग थूंके हम पर. मेरे सहकर्मी श्री अरुण गजबे वे भी निरीक्षक हैं और कुछ लिखने पढने की तमन्ना उनमे भी है, बोले इस "गिरना" पर कुछ लिखिए. सो किया थोड़ा  सा प्रयास..........
जय जोहार...........   

इहाँ तो पंद्रही होथे सियान

भाई ललित न फ़ोन है न कोई  ब्लॉग में प्रविष्टी 
कहाँ हो गए हैं अंतरध्यान
बोले थे अठ्वाही के बाद मिलेंगे
इहाँ तो पंद्रही होथे सियान 
(पंद्रह दिन हो रहे हैं)
आईसक्रीम ख़तम नई होवत हे का जी? 
जय जोहार........

वाह रे छः घन्टे की नीन्द

"ॐ हं हनुमते नमः" 
सुप्रभात व आज का दिन आप सभी का खुशमय हो.  
हम कल कुछ ज्यादा ही काम के बोझ के मारे थे. आजकल हमारे विभाग में कुछ ज्यादा ही सांखिकीय विश्लेषण का दौर चल पड़ा है.  गत तीन वर्षों के आंकड़े एकत्र कर तुलनात्मक अध्ययन करने के आदेश प्राप्त हुए हैं. सो इस संगणक  की सहायता से काम चल रहा है.  हम संगणक प्रचालन में उतने दक्ष नहीं हैं इसलिए विभाग के ही आंकड़ा प्रविष्ट प्रचालक की मदद ले लेते हैं. विभाग प्रमुख आदेश के अनुपालन के लिए पर्याप्त समय नहीं देते. अब इसे क्या कहें इम्मिडियेट या इडियट, खैर जो भी हो इन्हें  तो तत्काल कैसे भी  हो कार्य निष्पादन करके देना है. कोई चारा नहीं है भाई. बॉस इस आलवेज राईट. सो गत तीन दिनों से रात दिन काम चल रहा था. कल फुर्सत पाए. निद्रा देवी ने कहा ज्यादा वक्त जाया न करो आ जाओ हमारी शरण में. सो रात दस बजे ही चले गए इनकी शरण में. पर एक बात है हमारे लिए छः घंटे का समय पर्याप्त है नींद पूरी होने के लिए. सो उठ गए हैं आज चार बजे से ही अब उठने के बाद यहीं बैठने की आदत हो गयी है. बैठ गए, झांके कुछ कुछ मित्रों के ब्लॉग. टिपियाये. एक के अनुसरणकर्ता बने. 
                           हम यहाँ भी देखने लग गए आंकड़े. पर किस चीज के? अरे भाई टिप्पणियों के. हम जिनके अनुसरण कर्ता बने हैं आज उनकी अधिकाँश पोस्ट के लिए तेरह-तेरह  टिप्पणियाँ देखने को मिली. हमने सोचा अभी अभी हम इस बात  पर अपनी पोस्ट के लिए प्राप्त टिपण्णी पर एक पोस्ट डाले थे "पांच का पहाडा चल रहा" अब यहाँ के लिए क्या कहें "तीन तेरा नौ अठारा" क्या ? हम भी कहाँ कहाँ तीन पांच,  तीन तेरा के चक्कर में पड़ रहे हैं. पर कुछ ऐसा देखने को मिला हमसे रहा नहीं गया लिख बैठे. हम जिनके अनुसरणकर्ता   बने हैं उनके लिए ये पंक्तियाँ:
"इनकी भी  लेखनी में गजब की धार है
 "क्रांति दूत" चल पड़ा है 
कविता के नौ रसों के संग 
विषय प्रमुख इनका 
रसराज "श्रृंगार" है."
 जय जोहार..........

सोमवार, 24 मई 2010

गरमी का मौसम, तप रही है धरती

(१) 
बुझाने अपने पेट की आग 
कमाने के चक्कर में 
करती जनता भागम भाग 
       (२)
गरमी का मौसम, तप रही है धरती 
दिमाग ठिकाने रहता नहीं, 
क्या अच्छा है क्या बुरा है
जनता जरा भी परवाह नहीं करती 
(३)
आदत नहीं सुधरती अपनी, बह रहा है नल से  पानी बहने दें
क्यों करे स्विच ऑफ, कमरे की लाईट बुझी हो या जली
पानी की किल्लत  होती है, गुल रहती है बिजली, 
रात में नींद हराम, दिन में होवे नहीं काम, 
कैसी  मच जाती है खलबली.
(४)
सुबह सुबह कालोनी के एक घर  में सुलग रही थी आग 
कागज़ जलने की महक ने हमारी नींद को कहा तू भाग 
उठ गए,  देखे बाहर,  आखिर क्या हो रहा है 
पता चला घर के  सामने वाले ब्लाक के ऊपर के  क्वाटर में 
उड़ रहा है धुआं, अन्दर रखे कागजातों का अंतिम संस्कार हो रहा है.
(जैसा कि पता चला उस क्वाटर में कोई रहते नहीं थे) 
फैले न यह  आग और कहीं, सोच दमकल तुरत बुलाये 
घंटे भर की एक्सरसाइज से आखिर आग पे काबू पाए.
(आग लगने का सही सही कारण हमें ज्ञात नहीं हो पाया है.)
 (५)
क्या करें इस भीषण गर्मी में सब का चढ़ा रहता है पारा 
धीरज धर, जरा  सोच समझ कर, करें काम  का निपटारा 
जय जोहार ................

"प्रलय" / "महा प्रलय" - भविष्य वाणियाँ

                   आज का प्रचार प्रसार माध्यम जिसे हम प्रचलित भाषा में "मीडिया" कहते हैं,  अपनी गुणवत्ता बढ़ाने में जुटा रहता है.  कोई बुरी बात नहीं है.  मगर इस चक्कर में जिस प्रकार अंधाधुंध किसी  धारावाहिक की तरह किसी घटना दुर्घटना पर टूट पड़ती है मीडिया और तकरीबन चलता है सप्ताह भर, यह समझ से परे है.  किसी किताब में किसी की लिखी  भविष्य वाणी किसी के द्वारा पढ़ी गयी  है कि सन दो हजार बारह में पृथ्वी नष्ट हो जाएगी. बात मीडिया तक पहुची और एक नयूज चेनल द्वारा इस प्रलय के बारे में प्रस्तुतीकरण ऐसा रहा कि बस अब सभी कुछ ही दिनों के मेहमान हैं.  आजकल दिनों दिन घटनाओं दुर्घटनाओं में जिस कदर बढ़ोतरी दिखाई दे रही है, प्राकृतिक आपदाएं भी आते जाती हैं, लगता है इसी को प्रलय कहा जाता है.  प्रलय तो रोज आता है. वह व्यक्ति जो किसी दुर्घटनावश हो अथवा स्वाभाविक मौत मरा हो उसके लिए तो पृथ्वी वैसे ही नष्ट हो गयी. कौन आता है देखने? वैसे ज्योतिष मनीषी कह रहे हैं सन दो हजार बारह मे कुछ नही होने वाला है। कलयुग की आयु ही तकरीबन चार लाख से ऊपर है जबकि  कलयुग  की आयु सबसे कम है।  हमने विचार किया  क्या ऐसी घट्ना दुर्घटना ही प्रलय तो नही । इस प्रकार की घटनाओ छुट्कारा कैसे पाया जा सकता है? आज की विमान दुर्घटना ही ले लीजिये। इससे  पहले  कल -परसो  तूफान "लैला," और इसके साथ साथ बन्डू"  के बारे मे अखबार  मे पढ़  रहा था। अब दोनो तूफ़ान कभी न कभी भारी पड़  सकते है।  कहने का तात्पर्य लोगों के लिये एक प्रकार से  ये तूफ़ान ही  प्रलय है। अच्छा यह रहेगा कि हम सब मिलकर इस बारे  मे सोचे और ठानलें कि प्रक्रिति से खिलवाड न करें।  फिर देखें इस तरह की समस्यायें कम कैसे होती  है।                           जय जोहार्………

शुक्रवार, 21 मई 2010

"जय राम जी की बोलना पड़ेगा"

चल रहा प्रवचन वहां
दिख रहा एक पंडाल 
घर सूना सूना पाके,
खुश होवे चोर चंडाल
                       देखता हूँ बहुत बड़ा पांडाल लगा हुआ है.  प्रख्यात प्रवक्ता, संत शिरोमणि, धारा प्रवाह प्रवचन कर रहे हैं. हजारों, हजारों क्या लाखों  की तादाद में भीड़ इक्कट्ठी हुई है प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से (टी वी के माध्यम से). कभी ज्ञान की बातें कभी वैराग्य की. बीच बीच में कुछ ऐसे उद्धरण भी दिए जा रहे हैं जिससे पंडाल में ठहाके भी सुनाई पड़ते हैं. बीच बीच में कीर्तन भी चलता है. माहौल संगीतमय बन पड़ा है. झूम रहे हैं. वाद्य यंत्रों से निकली सुमधुर ध्वनियाँ झूमने को मजबूर कर रही हैं.  इन सब बातों की कल्पना कर मन में उमड़ रहा है विचार. संतों के मुख से कुछ प्रसंग का जिक्र करने के बाद जनता से बुलवाए जाने वाले कुछ शब्द;
कोई कहे हरि बोल, कोई कहे  राधे राधे.... 
कोई कहलवाए हरिओम तत्सत 
कोई कहे जयराम जी की बोलना पड़ेगा 
होवे मन्त्र मुग्ध श्रोता, रखे इन्हें ये बांधे बांधे
                            सिद्ध संत महात्माओं में कहा जाता है दिव्य चक्षु होता है. उर्जावान होते हैं. जितने लोग पंडाल में बैठकर प्रवचन सुनते हैं वे लोग ऐसे होते हैं जो चाहे भय वश हो या श्रद्धा के कारण,  कह सकते हैं की इनमे थोड़ी समझ है. किन्तु क्या ये अपने प्रभाव से उन हत्यारों का ह्रदय परिवर्तन नहीं कर सकते जो छिपकर अकारण रोज बड़ी संख्या में निहत्थे लोगों की जान ले रहे हैं. केवल यह हिन्दुओं के लिए नहीं है.  कोई भी कार्यक्रम होता है, चाहे वह मंदिर में हो, मस्जिद में हो, गिरजाघर में हो या गुरुद्वारे में. सुनाई पड़ता है बाहर एक जबरदस्त विस्फोट हो गया और बड़ी संख्या में लोग मर गए या घायल हो गए. कहीं ऐसा तो नहीं कि भक्त भजन कीर्तन में तल्लीन होकर यह अनुभव करने लगते हैं की उस परम पिता परमेश्वर से उनका  सीधा कनेक्शन जुड़ गया है. लगता है इसीलिए  ईश्वर भक्तों को  सीधे विमान में बिठाकर स्वर्ग न ले जाने के बजाय ऐसे उत्पाती लोगों के हाथों मरवाकर ले जा रहा है..... 
जय जोहार..........

मंगलवार, 18 मई 2010

नक्सली हवन कुंड में आहूत हवन सामग्री की कीमत

13 अप्रैल १९१९, पंजाब के अमृतसर का जलियाँ वाला बाग
बैसाखी पर्व के उल्लास के साथ भीषण नर संहार की अभी भी
कहानी कहता
4.30 बजे संध्या, अपने वतन की आजादी पाने बुलाई गई थी
सभा जहाँ हुए थे जमा हिन्दू मुस्लिम संग संग
अंग्रेजी हकूमत को  अंदेशा होने
लगा था, डर लगने लगा था, ब्रिटिश राज के अंत होने का 
चलवा दी गई गोलियां, निहत्थों पर
देखते ही देखते बहने लगी खून कि नदियाँ
चीत्कार,  पुकार कोई सुनने वाला न था 
आर्डर जारी करने वाला था मेजर जनरल डायर
कितना बुजदिल था वह, कह सकते हैं उसे कायर 
कायर था, था  पराये देश का,
इस वतन को गुलामी की बेड़ियों में 
जकड़े रहना देखना चाहता था,
लोगों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया
आखिर मिली हमें आजादी,
क्या पता था,
इस आजाद मुल्क में अपने ही लोग तुले
हुए हैं मचा के तबाही, लाने को बर्बादी
नक्सलवादी तैयार किये हुए हैं अग्निकुंड 
दे रहे हैं अपनों की ही आहुति,  
बाद में ऐलान होता है  मृतक के परिजनों को
देने का रूपये लाख, दो लाख, चार लाख,
ऐसा प्रतीत होता है मानो आहुति के लिए 
हवन  सामग्री की कीमत हो 
क्या कहेंगे इन्हें "कायरों में महा कायर?"
जय जोहार......



जाको राखे साइयां मार सके न कोय. बाल न बांका कर सके जो जग बैरी होय (समापन)..

(6) 
दूसरे दिन सुबह  उसे होश आ गया था. ऑक्सीजन मॉक्स हट चुका था. वैसे मेरी बिटिया उसके पास जा जा कर उसके साथ में सभी के होने का एहसास दिलाते रहती थी. मैं पुनः देखने गया. उसका पहला प्रश्न था "पापाजी आप कैसे हैं व मम्मी कैसी है?" मुंह से आवाज नहीं निकल पाई पर इशारे से कहा सब ठीक है.  वहां से आकर भर्राई  आवाज में पत्नी व बिटिया को बेटे की हालत ले दे के  बता सका. उनकी आँखों से भी आंसू छलकने लगा. तीसरे दिन बेटे को वार्ड में शिफ्ट किया गया. जिस कक्ष में शिफ्ट किया गया वह कमरा मच्छरों से भरा था.  तुरंत एयरकंडीशंड कमरे में ले जाया गया. चौथे दिन उसके सर में लगे पाइप केथेटर इत्यादि खोल दिए गए और घर ले जाने के लिए डॉक्टर ने अपनी स्वीकृति दे दी. चिकित्सालयीन प्रभार भुगतान हेतु औपचारिकताएं पूरी की जा रही थी कि बेटे को ज्वर ने अपने शिकंजे में कस लिया. मन गवाह नहीं दिया कि उसे इस हालत में घर ले जाया जावे.  ऊंची ऊंची एंटीबायोटिक दवाएं, इंजेक्शन दिया जाने लगा. ज्वर ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा था. डोक्टरों को बताया गया था कि यह ज्वर बेटे को गले में इन्फेक्शन के कारण हो सकता है पर दो दिनों तक डॉक्टरों ने इस बात की ओर ध्यान नहीं दिया. अंततः तीसरे दिन बेटे का  गला चेक कर उचित औषधि देने कहा गया.  ज्वर की तीव्रता पूरी तरह ख़तम नहीं हुई थी पर कम अवश्य होता जा रहा  था. दिनांक 30.05.2006 को उस अस्पताल से बेटे को डिस्चार्ज किया गया  और  हम सभी शाम तक  अपने घर  भिलाई पहुँच गए. 
"प्रति उपकार करौं का तोरा 
सन्मुख होई न सकत मन मोरा" 
गाँव वालों, अजनबी राहगीरों जिन्होंने अपनी गाड़ी में बिठाकर चिकित्सालय तक तत्परता से पहुंचाया, परिवार वालों, विभागवालों सभी का सहयोग अनुकरणीय, अविस्मर्णीय एवं "सुनु सब तुम्हरि उऋण मैं नाही. देखेंव करि विचार मन माही" याने इस उपकार का ऋण न चुका सकने वाला है.    
जय जोहार......  
                                                                             "जय हनुमान जय जय सिया राम" 

जाको राखे सांइया मार सके न कोय ..... जारी

(3)
                        दुर्घटना का हश्र ये रहा कि बेटे के माथे पर जम कर चोट  लगी थी. रक्त प्रवाह देखा नहीं जा रहा था. पत्नी तो बेहोश होने जैसी थी. एक मारुती कार रुकी. कार में बैठा परिवार दुर्ग की ओर ही आ रहा था जैसा कि कार वाले भाई साहब द्वारा बताया गया. निवेदन करने पर मुझे व मेरे बच्चे को रायपुर स्थित मेकाहारा अस्पताल ले जाने के लिए कार वाले भाई साहब राजी हो गए और रायपुर के लिए रवाना हुए.  रास्ते में प्रभु ने प्रेरणा दी कि रायपुर ले जाते तक बेटे के माथे का  रक्त प्रवाह न रुका तो क्या होगा? क्यों न घटना स्थल से 8-10 किलोमीटर दूर स्थित धरसींवा ग्राम के प्राथमिक चिकित्सा केंद्र में प्राथमिक उपचार करा लिया जावे.  अतएव हम लोग धरसींवा के अस्पताल में उतर गये. कार वाले भाई साहब को धन्यवाद के शब्द भी न कह पाए क्योंकि वे तत्काल निकल पड़े. स्वाभाविक है उन्होंने इतनी मदद कर दिया वही  बहुत है. नही तो दुर्घटना प्रकरण  में सामान्यतया पुलिसिया कार्रवाई में पड़ने के डर से कौन  ध्यान देता है?  उधर घटना स्थल पर घायल पत्नी और बिटिया दोनों  पड़े थे कि गाँव वालों की मदद से एक और गाड़ी "टाटा सुमो" रुकी और उन  दोनों को अपनी गाड़ी में बिठा चिकित्सालय के लिए रवाना हुई. पत्नी तो बेहोशी की हालत में थी. वह एकदम भूल गयी थी कि हम कहाँ और किस हालत में हैं.  बिटिया से बार बार पूछे जा रही थी कि 'हम कहाँ जा रहे थे', 'गाड़ी कौन चला रहा था' , 'सुरम्य (बेटा) कैसा है' ... 'पापाजी (मुझे) कैसे हैं' .....आदि आदि. बिटिया सुरभि भी रोने लगी यह सोचकर कि मम्मी को क्या हो गया है? गाड़ी वाले की सज्जनता देखिये; उन्होंने पत्नी से कहा धैर्य रखिये सब ठीक है. ढाढस बंधाते रहे.  इधर मैं बेटे को लेकर धरसीवां अस्पताल पहुँचते ही पत्नी से चलित दूरभाष (मोबाइल) के माध्यम से बताया कि हम लोग धरसींवा अस्पताल में हैं. अतः "टाटा सूमो" वहीँ आकर रुकी. पूछने पर उन्होंने अपना नाम संजय अग्रवाल व रहना तहसील बिल्हा बताया. क्या कहूं इनके द्वारा हमें पहुंचायी गई  सहायता के बारे में. साक्षात भगवान् आ गए थे ऐसा लगा. सामयिक उपचार में आज की तकनालोजी की देन इस मोबाइल की भूमिका को भी नहीं भुलाया जा सकता.  तत्काल समाचार सभी महत्वपूर्ण स्थानों में पहुँच गया.  विभागीय अधिकारी, मेरे अभिभावक (माता पिता तुल्य) छोटे मामाजी व  मामीजी समय पर  धरसीवां अस्पताल पहुँच गए.
  (4)
                             बेटे व पत्नी को ज्यादा चोट लगी थी. बिटिया सही- सलामत थी और  हम सभी को ढाढस बंधाये जा रही थी. उसके साहस का भी कोई जवाब नहीं. धरसीवां उपचार केंद्र तक बेटा भी विचलित नहीं था. वहां उसके सर से हो रहे रक्त प्रवाह रोकने का उपाय चल ही रहा था कि एकाएक उसकी स्थिति बिगड़ने लगी. झटके आना, मुंह से झाग निकलना आदि. मेरे तो होश फाख्ता हो गए. बेचैनी बेहोशी व रोना.  आज भी मेरे मामाजी व बेटे के पास उपस्थित लोग इस बात की याद दिलाते हैं तो मन सिहर जाता है. यहाँ तक कि डॉक्टर के पसीने छूटने  लगे थे. डॉक्टर सुशील शर्मा सर्जन ओर्थोपेडिक. त्वरित प्राथमिक उपचार के पश्चात उसे एम्बुलेंस से स्वयं डॉक्टर साहब द्वारा  रायपुर स्थित अग्रवाल हॉस्पिटल ले जाया गया. सी टी स्केन, पेथोलोजी जांच में जरा भी देर नहीं की गई. इन कार्यों में मेरे विभागीय अधिकारियों, मेरे अभिभावकों मेरे ससुराल वालों का सहयोग अविस्मर्णीय एवं जिन्दगी भर उनके इस उपकार को न छूटा जा सकने वाला रहेगा. सी टी स्केन की रिपोर्ट नोर्मल बतायी गई. डॉक्टरों द्वारा यह आश्वत किया गया की घबराने की कोई बात नहीं है. माथे की हड्डी में थोड़ा सा फ्रेक्चर है जिसे शल्य क्रिया द्वारा ठीक किया जा सकेगा.  
(5) 
                            बेटे को अस्पताल के गहन चिकित्सा इकाई में रखा गया. उसे देखने को मन तड़प रहा था. देखने दिया गया. ऑक्सीजन मॉक्स लगा हुआ था. बेटा पूरे होश में था. इशारे से बात कर रहा था. देखकर थोड़ा सुकून मिला किन्तु अश्रु प्रवाह को न रोक सका.  बेटे की आँखों में भी आंसू भर आये थे. भले ही वह कह रहा था कि नहीं रो रहा है. इधर  अंदरूनी चोट से पत्नी भी कराह रही थी किन्तु सारा ध्यान बेटे में लगा था.  रात साढ़े आठ बजे (8.30PM) बेटे को शल्य क्रिया कक्ष ले जाया गया. शल्य क्रिया (ऑपरेशन) करीब रात ग्यारह बजे तक चली.  चूँकि शल्य क्रिया पूर्व उसे निश्चेत किया गया था, उसी अवस्था में गहन चिकित्सा इकाई में पुनः लाया गया.  वह रात बड़ी मुश्किल से कटी "दुःख में सुमिरन सब करै" को हम चरितार्थ कर रहे थे मन ही मन " मन्त्र जप" चल रहा था...........क्रमशः 

सोमवार, 17 मई 2010

"जाको राखे साइयाँ मार सके न कोय"

                          आज  है वह तारीख  जब हम इस दुनिया में आये. वर्ष था 1963 आज से केवल पांच दिन बाद  याने 22  मई 1963,  माताजी ने हमारा साथ छोड़ दिया. स्वर्ग सिधार गईं.  मगर विधि का विधान देखिये.  हमारी नानी ने हमें पूर्ण माँ का प्यार दिया पाला पोंसा  और हम आज इस मुकाम पर हैं.  यहीं ख़त्म नहीं होती कहानी.  वर्ष 1976 दिन व तारीख ठीक ठीक याद नहीं है.  सर से बाप का साया भी उठ गया.  धन्य हैं मेरे मातामही, पितामही, मातुलान/मामीजी.  माताजी की बहन याने मौसीजी का भी यही हाल रहा अंतर केवल इतना कि उनकी संतानों में २ बेटियां व एक बेटा है.  हम हैं अपने माँ बाप के इकलौते बेटे. आज मौसी व मौसा जी भी नहीं हैं.  वैसे इन बातों के अलावा हमारे साथ घटनाएं/दुर्घटनाएं भी बहुत घटी हैं.  अब माने या न माने मैं बचपन से कई दुर्घटनाओं का शिकार हुआ हूँ.  22 मई सन दो हजार छः  की घटना ने तो झकझोर ही दिया था.  22 मई याने  माँ की पुण्य तिथि.(माता पिता दोनों को हम सभी की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित व ईश्वर से प्रार्थना कि अगले जनम में आपकी संतान होऊं और आप लोगों की सेवा का अवसर प्राप्त हो. )  प्रस्तुत है घटना का पूर्ण विवरण:-
(1)
                           सन दो हजार चार में हम भिलाई से  स्थानांतरित होकर गए थे बिलासपुर. 20 मई दो हजार छः   साप्ताहिक अवकाश होने के नाते कर्तव्य स्थल बिलासपुर से  हम लगभग रात डेढ़ बजे अपने घर भिलाई  पहुंचे थे. रविवार का समय अच्छे से बच्चों के साथ बिताया. चूंकि हमारे तात्कालिक प्रभाग प्रमुख श्री सालुंखे साहेब भ्रमण पर बाहर निकले थे, सोचा गया कि आराम से छत्तीसगढ़ ट्रेन से निकला जावे. वैसे हम प्रायः साउथ बिहार एक्सप्रेस से जाया करते थे. उन दिनों यह ट्रेन सूर्योदय से पहले करीब पांच बजकर बीस मिनट पर दुर्ग स्टेशन से छूटती थी. "छत्तीसगढ़" ट्रेन के बारे में रेलवे इन्क्वारी से पूछा गया. पता चला लगभग एक घंटे विलम्ब से चल रही है. 
(2) 
                          इस दरमियान सर्व सहमति से योजना बनी कि क्यों न कुछ दिनों के लिए स्ववाहन से सपरिवार बिलासपुर भ्रमण कर आया जावे. मुंगेली जाने का भी प्लान था. फटाफट सामान गाड़ी में रखे गए. मेरे बेटे ने उसी समय गिटार सीखना शुरू किया था. अतएव सोचा गया कि गिटार भी साथ ले चलें. गाड़ी बिलासपुर के लिए रवाना हुई. बिना किसी व्यवधान के रायपुर शहर पार कर लिए. बड़ी मस्ती और दंभ में कि यह जनाब तो अब गाड़ी चलाने में माहिर हो गया है, गति का ध्यान न रखते हुए चले जा रहे थे.  पता नही क्यों किसी बात की चर्चा होने पर  इस जनाब को  अपनी आँखों में चित्रित करने की आदत सी हो गई है. ध्यान केन्द्रित नहीं रख पाता. चर्चा होने लगी  पत्नी के  दिवंगत बड़े पिता जी याने हमारे बड़ा श्वसुर की.  उनकी छवि मानस पटल पर दिखाई पड़ने लगी. हाँ जगह थी "धरसीवां" के पास की. वहां अक्सर दुर्घटनाएं होते रहती हैं. दुर्घटना जन्य  क्षेत्र माना जाने लगा है. सामने से एकाएक आती हुई मोटर साइकिल के पार करने से किंकर्तव्य विमूढ़ हो अपना संतुलन खो बैठा व खड़ी लारी में कार घुसा दिया. ईश्वर की कृपा देखिये. घायल पत्नी बच्चों व स्वयम के लिए दूत भेज दिया ताकि समय रहते उपचार सुविधा प्राप्त हो जावे. बिलासपुर से कार से  आ रहे भले मानुषों से ऐसा सहयोग मिला जिसे हम कभी भी नहीं भुला सकते और न ही उनके इस उपकार का बदला चुका सकते. वैसे तो पता नही इस नाचीज पर कितनो के ऐसे ऋण हैं जिससे उऋण  हुआ ही नहीं जा सकता.  ईश्वर से सदैव यह प्रार्थना रहेगी कि हमारे पूरे परिवार को किसी भी समय किसी की भी  विषम परिस्थिति में सहायता करने की प्रेरणा एवं शक्ति प्रदान करे.
                                                                    क्रमशः                                                                                                                                                                                                                               
                                                          

रविवार, 16 मई 2010

गुरतुर गोठ छत्तीसगढी

(१)
केहे के आय गुरतुर, कोन जनि काबर नई पावै 
काखरो आशीर्वचन के दू भाखा 
सोचे ल पड़ जाथे, कैसे फैले पूरा जग माँ 
बर के पेड़  सरीख  ये भाखा के शाखा 
(२) 
वैसे तो ये आय ब्लॉग के दुनिया 
बोलथे तूती ओखरे जेखर गड़े हे इहाँ झंडा 
नवा नवा दुकानदार के कारोबार 
शुरू माँ रथे ठंडा ठंडा 
(३) 

अपन अपन मठ ले संगी,  बड़े बड़े स्वामी मन  गरियाथें
कोन काखर बर काय कहत हे तेला 
जासूसी कर  सोरियाथे
(४)

ये सब करे के जरूरत नई ये, गुरतुर बोली, ज्ञान के बानी, 
लिखौ गीत गजल  कहानी 
नवा चेला ल बने पाठ पढ़ावौ 
उंखर बने हौसला बढ़ावौ 
पाहौ चीज इहाँ आनी बानी .

जय जोहार.......


आगे अक्ती तिहार अउ भगवान् परशुराम जयंती

                                      भगवान् परशुराम जी की जय 
जम्मो झन ला भगवान् परशुराम जयंती के गाड़ा गाड़ा बधाई 
अक्ती तिहार। इही हा ओ दिन आय जेमा महूरत फ़हूरत नई देखे जाय। पुतरी पुतरा के बिहाव तो ठीक हे, ए दारी तो अब्ब्ड अकन बिहाव हे जी। एखर अलावा एखर महिमा अउ हे। इहिच दिन मा भगवान परशुराम के जनम दिन मनाये जाथे। वैसे भी हमर देश सर्व धर्म समभाव के विचार करत आनी बानी के परब मनाथे। सोचे जाय त रोजेच तिहार हे। ग्रन्थ, वेद,  पुरान  हा हमर सन्सक्रिति हा तिहार बार ले  भरे हे। थोकिन दिन मा आ जाही रथ जात्रा, हरेली,  राखी, दशहरा देवारी…………। अकति के दिन के  तिहार के नाव ले बचपन के सुरता आ जाथे। हमर ममा मामी इंहां रात के पुतरी पुतरा के बिहाव करैं। पहिली बिहनिया ले घर माँ बडे मटका जेला करसी घलो कथें ओमा अउ  ओखर संगे संग  छोटे छोटे चुकिया मा  चुकिया मा  आमा अउ कांदा (शकरकंद) डार के पूजा होवे. अक्ती के दिन ले मटका के पानी पियाई शुरू होवे.  अब सूरज भगवान् हा  धरती माँ अंगरा फेंकत हे त अक्ती के अगोरा नई करन शुरू  हो  जाथे करसी के पानी पियाई चईते महीना ले. अरे हाँ जलवायु ला देख के खाए पिए के घलो कैसे बेवस्था बने रहिसे पहिली. अक्ती के दिन ले ही चना अउ गंहू ला भूंज के पिसाये पिसान ला जेला सतुआ कथें खाय के दिन शुरू होवे. ये सतुआ हा पेट बर हे  बड़ा फायदेमंद. एखरे ऊपर ले एक ठन कहानी याद आगे. बानी अउ भाखा के का परभाव परथे.  दू झन राहगीर रेंगत रेंगत अपन कोनो गाँव जात रहैं.  एक झन मेर सतुआ रहै अउ एक झन मेर धान.  धान वाले हा सोचिस मोला भूख लगही त कैसे करिहौं. धान ला कुटाना पकाना बड़ पिचकाट. बड़ चतुरा.  ओला  सूझिस काबर न सतुआ वाले मेरन ले सतुआ ले जाय. कैसे भाखा के परयोग करिस ध्यान देहु ; कहत हे सेतुवा वाले ल  "सतुआ खाए बर बड़ मेहनत हे; सतुआ मन मेतुआ जब घोरब जब घारब तब खाब तब जाब. धान बिचारी भली कुटी खाई चली. अड़हा हा अपन सतुआ ला दे दिस धान वाले ला. बज गे ओखर बारा. धान वाले के होगे वारा  न्यारा. तौ भैया इही गोठ संग अक्ती के गाड़ा  गाड़ा बधाई. जम्मो नवा जोड़ी बनईया मन ला उंखर सुग्घर जिनगी के बधाई. भगवान् परशुराम ला परनाम करत ..............
जय जोहार. 
16/05/2010            

दोस्ती ल रिश्ता मा कैसे फिट करे जात रहिस?

ओतेक बड़े त नई हो गे हन. तभो ले अतका कहे के लाइक हो गे हन अपन लइका मन ला  के हमर लैकाई मा ए दइसे दइसे होवत रहिसे. पहिली संगवारी बनावे त एक दूसर बर मर मिटैया संगवारी बनावें.  अपन दोस्ती ल पुख्ता करे बर आनी बानी के तरीका  अपनावें तैसे लागथे. जैसे "मितान" "तुलसीदल" "महापरसाद" "जंवारा" "भोजली" अउ काय काय आय तेखर सुरता नई आवत हे;  नांव देवें.  अउ एक दूसर ला संबोधन बर इही सब नांव के  परयोग  करैं. एला "बदई " कथें. उदाहरण "मितान" बदे हन जी, फलाना बदे हन जी .  बड़ा पवित्र रिश्ता माने जाय जी. अईसन संगवारी के लइका मन अपन दाई ददा के मितान मितानिन  ला फूल दाई फूल ददा के नांव ले संबोधित करैं. अब्बड़ परेम रहै एक दूसर संग. अब अईसन परेम हा नंदावत जात हे. अब सब देखावा होगे हे.  अंतर्मन ले निभाये के बारी आथे त तिरियाये लाग्थें. दुरिहा भाग्थें. काय करबे सब ये जुग के परभाव ताय. ठीक हे रे भाई देश काल परिस्थिति ला ध्यान माँ रखके अपन अपन रद्दा माँ रेंगे ल परथे. वैसे मोर रिश्ते दारी मा भतीजा हवे. ओखर तीन संगवारी अईसे हें  बचपन से  चारों के  घर मा अतेक एक दूसर संग परेम हावै के कोनो पोरोगराम हो  सुख हो चाहे दुख हो, सब्बोझन मिल बाँट के निपटाथे.  अभी अभी दैनिक भास्कर के नगर संस्करण माँ छपे रहिसे ये बारे मा.  ये मन भेलाई के लक्ष्मी नगर माँ एके डिजाईन के मकान बनवाये हें, एके दिन चारों झन गृह प्रवेश कराइन. मिलजुल के पार्टी करिन. अत्केच नई ये. ए मन भिलाई इस्पात संयंत्र म नौकरी करथें शायद एके डिपार्ट्मेन्ट मा।  महू देखत हौं अब्बड दिन ले।  कहूं घूमे बर एल टी सी लेके जाहीं तभो  एक संग. एला कथें दोस्ती. ऊंचा नीचा मा एक दूसर के मदद करे बर तैयार. दोस्ती के मिसाल हे भाई.
जय जोहार.... घुघुवा कस जागत हौं अब जाथौं सुतिहौं.
तारीख: १६/०५/२०१०      

शनिवार, 15 मई 2010

क्रिकेट , मीडिया और मदमस्त मानुस

अखबार का मुख्य-पृष्ठ सजा है बड़े बड़े अक्षरों में लिखे शीर्षक  " किसने कहा ऎसी नाईट पार्टियों में जाएँ" से  
मैच की जीत,
कप्तान बन जाता है मीडिया का मीत 
छपता है शीर्षक "धोनी के धुरंधरों के आगे 
विरोधी हो गए ढेर"
वाह क्या बात है बन जाते हैं टीम के 
खिलाड़ी "बब्बर शेर" 
शौक से टी वी चेनल दिखाता है 
हर नई रंगीन पार्टी का सीन 
राष्ट्रीय खेल "हाकी" दर किनार रख
उसे बना दिया जाता है दीन हीन
कौन नहीं जानता  
इस खेल पर "लक्ष्मी कृपा" असीम है 
हार क्या हुई, तरह तरह की 
आलोचना रुपी गेंदे फेंकी जा रही है, मत पूछिए,
क्या लाइन है, लेंग्थ है, क्या "सीम"  है 
किसी भी चीज के लिए आवश्यक होता है जज्बा. जब दिल में देश के प्रति जज्बा उमडेगा,  दृष्टि होगी लक्ष्य पर. लक्ष्य याने विजय, और विजय प्राप्त हो सकता है अनुशासन में रहकर. दर असल हमारे भारत में टाइम पास करने वालों की कमी नहीं है. हमारी तरह. किरकिट शुरू हुआ नहीं की चिपक गए दूर दर्शन से. "ऎसी दीवानगी देखी कभी नहीं" किसी फिलम के गाने की लाइन इस खेल पर लागू होती है. बड़े बड़े धनाढ्य लुटाते हैं पैसा इस पर. कुल मिलाकर मानस है मद मस्त.  जितना भी कहें, लिखें, कम है. 
जय जोहार. .......

शुक्रवार, 14 मई 2010

कवि घाघ कहिन

मुझे ज्योतिष सम्बन्धी तनिक भी जानकारी नही है। फिर भी मै ज्योतिषीय किताबें पढ़ना पसन्द करता हूँ। दर असल ज्योतिष को शायद सही सही रूप मे जन-मानस के समक्ष किसी के द्वारा प्रस्तुत नही किया जा सका है। यद्यपि यह एक विग्यान है। खैर! छोडिये  इन बातों को।  यह ब्लागर इन्ही ज्योतिषीय किताबों से चुनकर   कुछ हट के (इस ब्लागर के लिये कुछ हट के , वैसे आप लोगों के लिये नहीं ) लिख्नना चाह रहा है। लीजिये गौर फ़रमाइये; 
कवि घाघ कहिन  
बिन बैलन खेती करे, बिन भैयन के रार. 
बिन मेहरारू घर कराइ, चौदह साख लबार 
कवि घाघ कहते हैं जो व्यक्ति बिना बैलों  की खेती की बात करें, बिना भाइयों की सहायता के लड़ाई झगड़ा करने की बात करे और बिना पत्नी के घर बसाने की बात करे तो निश्चित रूप से वह बहुत बड़ा झूठा है. क्योंकि खेती का कार्य बैलों के बिना या आवश्यक उपकरणों के बिना नहीं किया जा सकता है.  लड़ाई झगड़े के कार्य  में  भाई के सहयोग की बहुत आवश्यकता होती है . अकेला व्यक्ति कभी भी किसी से हार सकता है.  इसी प्रकार घर बसाने के लिए पत्नी की आवश्यकता प्रथम  होती है.  पत्नी ही होती है जो घर को संभालती है और गृहस्थी को सुचारू रूप से चलाती है. 
जय जोहार.................... 
दिनांक १४/०५/२०१० 

"जरा सा"

                            दो छोटे छोटे शब्द; " जरा सा".   इनका प्रयोग कितना प्रभावशाली. चेतावनी के लिए अति उपयुक्त.  आजकल आप किसी दुकान में या कार्यालय में नीति वचन के रूप में लिख़ा देख सकते हैं. कुछ उदाहरण नीचे है;
जरा सा रूप क्या मिला - दर्पण ही तोड़ डाला 
जरा सा ज्ञान क्या मिला - सबसे बड़ा ज्ञानी समझ बैठे ........ आदि आदि .  ये सब बातें पढ़ते समय ही अच्छी लगती हैं थोड़ी देर के लिए "दर्शन" में समा जाते हैं.  बाद में फिर वही पुराने ढर्रे पर चलना शुरू. ईश्वर ने सभी को बुद्धि प्रदान किया है. फर्क इतना है कि (अनुभव के आधार पर) किसी को कम किसी को ज्यादा और तदनुसार  अपनी बुद्धि अपना विवेक का इस्तेमाल सभी करते हैं. मुझे इस "जरा सा" का प्रयोग "सम्मान" के साथ किया जाना बहुत अच्छा लगा. जरा सा सम्मान क्या मिल जाता है हम गदगद हो जाते हैं. किन्तु मुझे बार बार गीत की यह पंक्ति "गदगद" होने से पहले जरूर याद आती है; "किया अभिमान तो फिर मान नहीं पायेगा, होगा प्यारे वही जो श्रीराम जी को भायेगा". तात्पर्य यदि सम्मान मिल भी गया है तो भैया हवा में न उड़ें, पैर जमीन पर ही रहे. सम्मान या पुरष्कार न पाने वाले शख्स तुच्छ न समझ लिए जाँय. बड़े से बड़े कार्य संपादित किये व्यक्ति यह नहीं कहते  कि  "मैंने यह कार्य किया है"  इसके दो उदाहरण हमें रामचरित मानस में देखने को मिलता है. भगवान् परशुराम जी राजा जनक के दरबार में क्रोधित अवस्था में शिव धनुष तोड़ने वाले का नाम पूछ रहे हैं.  श्री राम जी से उत्तर मिलता है "नाथ संभु धनु भंजनि हारा. होइहैं कोऊ एक दास तुम्हारा".   मैंने तोडा नहीं कह रहे हैं. "होगा कोई आपका दास" यह उत्तर दे रहे हैं.  इसी प्रकार श्रीराम चन्द्र जी हनुमान जी से पूछते हैं कि  लंका में उन्होंने माता सीता का पता कैसे लगा लिया. अनेक निशाचरों से लड़ कैसे लिए? रावण कि नगरी  लंका को जला कैसे दिया गया? अशोक वाटिका कैसे उजाड़ी गई? हनुमान जी सहज भाव से उत्तर देते हैं  "नाथ न कछु मोरी प्रभुताई.  सो सब तव प्रताप रघुराई" ... मैंने कुछ नहीं किया वह सब आपका ही प्रताप है प्रभु...... 
                             "जरा सा" का अच्छे व बुरे दोनों के लिए प्रयोग:-  जरा से के लिए ट्रेन छूट  गयी. दूसरी ओर - जरा सी देर हुई होती तो ट्रेन मिलती ही नहीं. बैठे हैं गपियाते घंटों. इधर घर में कुछ काम बोला गया है हुआ नहीं और घर घुसते ही शब्द बाणों  से छलनी शुरू. फिर क्या जोश में शुरू हो गए जनाब "जरा सा किसी से बात क्या करने लगा...तुमने तो  खामखाँ पूरा घर सर पे उठा लिया"........ दूसरी ओर जरा  याने व्याधि. शायद वृद्धावस्था को भी "जरा" ही कहते हैं.  
                               अरे अरे हम भी कहाँ कहाँ "ज्ञान" बघारने लगे. भूल गए यहाँ तो ज्ञान के मामले में दत्त/ प्रदत्त बड़े बड़े ग्यानी लोग हैं भाई.......  
जय जोहार............दिनांक १४/०५/2010    

बुधवार, 12 मई 2010

आरती ब्लॉग देवा की

ॐ जय ब्लॉग देवा प्रभु जय ब्लॉग देवा 
गूगल धाम विराज्यो, नेट की माया प्रकाश्यो 
भक्त करे सेवा. //ॐ जय//


नाना तकनीकों के मालिक सबको पाठ पढ़ावै
नित नव प्रयोग कर कर के, कैसे कोई ब्लॉग सजावै//ॐ जय //


सवा अरब आबादी वाला,  है अपना ये देश
तेरी माया लेखन खातिर जन में भड़का गया आवेश.//ॐ जय//


प्रभु तेरी कृपा से टूटा कागज़ कलम से नाता 
तुम्हरे द्वारा सबकी प्रतिभा जन जन तक पहुँच है पाता //ॐ जय//


करै विनती यह मूरख ब्लोगर, करि किरपा सुनि लीजै
मचे मचाये न खींचातानी, ऐसी सुध बुध हमको दीजै.// ॐ जय//


ब्लोग्देव की आरति प्रतिदिन जो कोई ब्लोगर गावै 
गाडा भर की टिपण्णी हर पोस्ट में हर ब्लोगर नित नित पावै. //ॐ जय//


  
ॐ जय ब्लॉग देवा प्रभु जय ब्लॉग देवा 
गूगल धाम विराज्यो, नेट की माया प्रकाश्यो 
भक्त करे सेवा. //ॐ जय//

ब्लॉग देवा की जय 

जय जोहार........




मंगलवार, 11 मई 2010

पांच का पहाड़ा चल रहा ......

क्या बात है, जान-बूझ कर नहीं है,  पर देख रहा हूँ "उमड़त घुमड़त विचार" का गत दिनों लिख़ा गया प्रत्येक पोस्ट (तीन पोस्ट में लगातार) पांच-पांच टिपण्णी पाने वाला बना है. संयोग से ही सही. अरे हाँ अब कहाँ सुनने को मिलता है पहाड़ा. अब तो बच्चों को नर्सरी से काउंटिंग, पहाड़े के नाम पर "टेबल" चलता है. पहले पहाड़ा याद करने के अलग अलग सलीके होते थे मसलन (हमारी छत्तीसगढ़ी बोली में) के निया पीठ जोरी के जोरा? जवाब हाजिर चार निया पीठ जोरी के जोरा. गौर फरमाएं;  चार नवाम छत्तीस = ३६ याने तीन और छः दोनों की पीठ जुड़ रही है. इसी प्रकार: " के निया चुल्हा मा लकड़ी"  ? उत्तर मिलता "नौ निया चूल्हा माँ लकड़ी" देखिये कैसे: नौ नवाम इक्यासी = ८१;  आठ हो गया चूल्हा और एक जो है चूल्हे में घुस रही लकड़ी.  ऐसे ही चार नवाम का उल्टा सात नवाम ले लीजिये:- के निया मुंह जोरी के जोरा? उत्तर हाजिर सात निया मुह जोरी के जोरा. बिलकुल सही:- सात नवाम  तिरसठ = ६३ छः और तीन दोनों के मुंह जुड़ रहे हैं.  पौवा, अद्धा, सवैया, डेढ़ा सब रटाया जाता था. ठीक है भाई अब तो विज्ञान व तकनालोजी ने बहुत प्रगति कर ली है. नो मेन्युअल वर्क.  कंप्यूटर है, केलकुलेटर है ..... अब तो कापी किताब की भी जरूरत नहीं है. देखिये न हमही खुद ब्लोगवा में टकाटक कर रहे हैं....... अचानक ही विचार उमड़ गया लिख बैठे.
जय जोहार........

सोमवार, 10 मई 2010

ब्लॉग में प्रयुक्त होने वाले शब्दों की कड़ी में अगला शब्द "चिट्ठा चर्चा"
(३)
चिट्ठा चर्चा 
अपने ब्लॉगर मित्रों की प्रतिभा से वाकिफ 
कराने का अच्छा प्लेट-फॉर्म 
किन्तु किन्ही किन्ही  को लगता 
चर्चे के ऊपर चर्चा, चर्चे के चर्चे के ऊपर चर्चा
अरे लिखते चलो अपने ब्लॉग में रचनाएं 
यहाँ लगे रहना याने होता है फ़िज़ूल में 
     टाइम खर्चा 
(४)
ब्लॉगवाणी 
अपनी वाणी को लेखन के सहारे 
जन जन तक पहुंचाने वालों को इंगित करना
कि देखिये,  आपकी रचना ब्लॉग वाणी में दिखाई जा रही है 
लोगों को भा रही है, अनवरत लिखते जाइए 
सक्रियता क्रमांक पर डालते रहिये नज़र 
इस तकनीक द्वारा आपकी गाड़ी किस कदर आगे बढ़ाई जा रही है. 
बार बार मुंह खुल रहा, आ रही है खूब जम्हाई 
यह लिख के अब मैं जा रहा हूँ सोने भाई.
जय जोहार. 

छोटी सी मुलाक़ात नए ब्लागरों के संग

शायद अपरान्ह है या पूर्वान्ह 
श्री पाबला जी ने हमारे मोबाइल की घंटी घनघनवाया 
कहा आज शाम छः बजे हिमालय काम्प्लेक्स में ब्लोगर्स मीटिंग है भाया 
आज हम थे इतने व्यस्त, 
पर व्यस्त रहने के बाद भी 
काम  न होता देख हो गए थे त्रस्त
दोपहर में चले गए  निद्रा माँ की शरण में 
उठे तीन बजे, चार बज गया उदर-भरण में (भोजन हुआ)
आलस्य - संग हुई दोस्ती,  हुआ सांध्य स्नान 
फिर अचानक ब्लोगरों से मिलने को आया ध्यान 
जाने से पहले सोचा पूछ लें, ब्लोगर मिलन हो चुका 
या चल रहा 
समय पे नहीं आ पा  रहे हैं, हमको है यह खल रहा 
खटखटाए मोबाइल संजीव का, मिला हमें जवाब 
अरे अभी अभी है शुरू हुआ आ जाइए जनाब 
पर पाबला जी ने लगाई पेनाल्टी हम पर, पर हुआ न  पैमाना तय 
जैसे ही पहुंचे काफी हाउस, हुआ माहौल ब्लॉगमय 
भाई शरद संजीव सूर्यकांत बैठे थे  पास पास (एक पंक्ति में)
पाबला जी के संग बैठे थे दो मेहमान खासम ख़ास (सामने)
परिचय की कड़ी में जुड़े नरेश सोनी जी, श्री सतीश चव्हान 
अगली मीटिंग अपने घर करने का सतीश जी ने किया आह्वान 
ललित जी ,  ग्वालानी जी की गैर हाजिरी  थोड़ी जरूर खली
फिर भी ज्यादा से ज्यादा अपने क्षेत्र के ब्लोगरों को इसमें 
शामिल करने की चर्चा चली 
कुछ दूर दराज के मित्रों से मोबाइल थ्रू भी बात किये ( अजय  झा  जी ) 
कथा व्यथा अपनी अपनी  आपस में सहजता से दिए लिए 
ब्लोगर मिलें, यह कैसे हो सकता, न हो फोटोग्राफी सेसन  
आनंद लिए फोटोग्राफी का, देखेंगे फोटो मिलने पर हम दिखते 
हैं कईसन  कईसन 
हुई न ख़तम ये चर्चा, गए सब पान दुकान 
कोऊ मांगे तनि खैनिवा औ कोऊ चबावई पान 
यही थी समापन की जगह, होने लगे सब अंतर्ध्यान 
फोटू फाटू न होवन से  यह पोस्ट लग रहा निष्प्राण 
जय जोहार .............. 

रविवार, 9 मई 2010

ब्लॉग लेखन में प्रयुक्त होने वाले शब्द

(१)

सक्रियता क्रमांक 
ब्लॉग में लिखे गए लेख/कविता
 आदि के पठन पाठन की आवृत्ति,  चाहे वह  ब्लॉगर मित्रों के द्वारा 
हो या स्वतः के द्वारा; बतलाता है सक्रियता क्रमांक 

(२)
हवाले 
वर्तमान में ज्यादातर प्रयोग में लाये जाने वाला शब्द
भ्रष्टाचार, गबन, अवैध बन जाता है वैध, होकर हवाले के हवाले 
आम जनता समझ नहीं पाती; पूछने पर उत्तर मिलता है 
तू अभी नादान है, तू तो बेटा अभी हवा  ले. 
(खैर ब्लॉग में सन्दर्भ से अवगत करता है कि आप कहाँ कहाँ किनके हवाले हैं) 
जय जोहार........

नक्सलवाद के अग्निकुंड में चढ़ रही लाशों की चढ़ोतरी

आज है मातृ-दिवस, सुबह सुबह अखबार के मुख्य पेज पर नक्सलवाद की बलि चढ़ चुके फिर ८-१० पुलिस महकमे के इन्स्पेक्टरों सिपाहियों की खबर पढ़ा। क्या बीती होगी उन माताओं के दिलों पर्……। उन शहीदों को, उन माताओं को शत शत नमन। मन उद्वेलित है;  
"छिहत्तर लोगों की लाशें 
पूरी तरह दफ़न हुई नहीं हैं 
सन्डे अखबार का मुख्य पृष्ठ 
कर दिया इसमें बढ़ोतरी 
पुलिस महकमे के ८-१० जांबाज 
अधिकारी, सिपाही नक्सलवाद की
धधकती आग में धकेल दिए गए 
जल गए, खाक हो गए 
आम जनता द्वारा 
भगवद गीता, रामायण प्रवचन सुन 
व्यास गद्दी पर अर्पण करते दान दक्षिणा के  माफिक
शासक प्रशासक द्वारा चढ़ाए जा रहे हैं 
नक्सलवाद के अग्निकुंड में इनकी चढ़ोतरी        
जय जोहार....... 

मातृ-दिवस

माता के नाम का "दिवस" मना साबित क्या हम करते हैं 
एक ही दिन निभा औपचारिकता,  खुशी का अभिनय क्यों हम  करते हैं
है पृथ्वी से भी ज्यादा गौरव माता का, कौन नहीं यह जानता 
माता है सदैव वन्दिता,  क्यों  कोई नहीं यह मानता 
साया माँ का  हट चुका है सर से, चेहरा तक है याद नहीं   
अगले जनम में पा लूं  तुझे  माँ, प्रभु से करता हूँ फ़रियाद यही 
माँ तुझे कोटि कोटि प्रणाम! तेरे आशीर्वाद से  तेरा यह बेटा तेरे पोती पोते के साथ खुश है 
और प्रार्थना करता है तू जहाँ भी है, तू भी खुश रहे ...............    

बुधवार, 5 मई 2010

पारा याने "पारद"/मरकरी/ की महिमा

पारा काफी चढ़ गया था धीरे धीरे उतर रहा 
ब्लॉग जगत में लगे न, पता कौन किसका पर क़तर रहा.  
पारा याने मरकरी जिसे पारद भी कहते हैं, जिसे हमने उच्चतर माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने के दौरान शायद यदि सही याद हो हमें तो 80  वें नंबर का तरल रूप में अविष्कृत धातु है. "चांदी जैसा सफ़ेद" किन्तु जहरीला. रासायनिक विश्लेषण हम नहीं कर पायेंगे पर इसकी उपयोगिता सभी को विदित है. इस धातु का गलनांक 38 .83 डिग्री सेल्सियस व क्वथनांक (उबलनांक) 356 .73 डिग्री सेल्सियस है. यह पर तापमापी यंत्र में प्रयुक्त होता है. इस तापमापी यंत्र के आविष्कारक या कहें भिन्न भिन्न प्रकार के तापमापी यंत्र बनाने वालों में मुख्य रूप से नाम फैरनहाईट एंडरयु सेल्सियस के नाम आते हैं. और दोनों के नाम पर तापमान का पैमाना भी निर्धारित हो गया है. याने सामान्य तापमान 37 .83 डिग्री सेल्सियस याने 98 .4 डिग्री फैरनहाईट. यह होता है सामान्य ताप मान.  यदि इस यंत्र का आविष्कार न होता तो न जाने हम ज्वर से पीड़ित व्यक्ति का शीघ्र इलाज कैसे कर पाते? जैसे ही ज्वर की तीव्रता यह यंत्र बताने लगता है जैसे कि 100  डिग्री से ऊपर पारा चढ़ा ज्वर से पीड़ित व्यक्ति को सरल उपाय के बतौर माथे पर पानी की पट्टी लगाना होता है. यदि शरीर का तापमान बढ़ता गया और यदि हमारे पास यह यंत्र नहीं है, समझिये पीड़ित व्यक्ति के ज्वर को  कैसे  नियंत्रण में लाया जा सकता है ?   यह खोज निकाला गया है कि शरीर अधिकतम कितने डिग्री तक ताप (तापमान) सह सकता है.  जैसे ही पारा 101 के ऊपर गया समझो माथे पे गीले कपडे से पोंछना जरूरी. पूरे शरीर को स्पन्जिंग करना आवश्यक.  पारे की महिमा यहाँ पर स्वास्थ्य की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण. अब पारे की महिमा  इस शब्द के नित्य प्रयोग के रूप में देखिये.
                        
                                    कार्यालय पहुंचे, साहब का मूड पढ़े, चेहरे की भाव भंगिमा देखे, हमारे पहुँचने से पहले किसी के ऊपर बरस भी रहे थे.  और बाहर निकल कर मुह से निकल पड़ा "आज साहब का पारा चढ़ा हुआ है"  कार्यालय ही क्यों घर में, मित्र मंडली में जरा खटपट हुई नहीं की बस, किसी न किसी का पारा चढ़ जाता है.

                                        भाई जी मैं भी सोचूं इस ब्लॉग जगत में हमारा भी पारा चढ़ते जाता है सो ठीक नहीं मालूम पड़ता. यहाँ परे का गिरना उत्तम माना जाता है. कहिये गलनांक  क्वथनांक के बजाय हिमांक में रहना उत्तम है. सो हम आज देखे पर 221 डिग्री पे था कल तक. आज 298 पहुँच  गया.  सोचे आज कुछ यहाँ स्पन्जिंग कर दिया जावे. सो बैठ गए पोस्ट करने. देखें कहाँ तक गिरता है पारा.........  (पौराणिक कथाओं में, ग्रंथों में वैसे और भी वर्णन मिलेगा ..... एक जो हम "पारद शिवलिंग के बारे में सुनते हैं तो कहूँगा  यहाँ तो पारद की महिमा स्वयमेव बढ़ जाती है).  एक बात और अभी अप्रैल महीने में जो पारा चढ़ा हुआ था ज्यादा, बीच बीच में कहीं आंधी तूफ़ान व बारिश होने की वजह से नीचे हो गया है.
सभी मित्रों को जय जोहार.....
 


शनिवार, 1 मई 2010

राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास

'ॐ श्री गणेशाय नमः"
"ॐ हं हनुमते नमः"
शनिवार का दिन. सोचा हूँ शनिवार के दिन श्रीरामचरितमानस के सुन्दर काण्ड से कुछ न कुछ चौपाई हो या दोहा, यहाँ उद्धृत करूं. सो आज मन बोला की दोहा क्रमांक ३७ का जिक्र हो जाय. इसका शाब्दिक अर्थ कितना सटीक है. सच्चा मंत्री, सच्चा गुरु, और सही वैद्य वही होगा जो बिना भय के चाटुकारिता छोड़ सही सही बातें कहे.  किसी भी राज्य का कल्याण राजा की खोखली प्रशंसा से नहीं हो सकता. यदि राजा गलत है तो स्पष्ट उन्हें बताना होगा की वह कहाँ गलत है. याने उचित सलाह. गुरु यदि धर्म की सही व्याख्या नहीं करते वहाँ धर्म का नाश और यदि वैद्य यदि परहेज के लिए सही चेतावनी न दे, डर के मारे, तो जीवन ख़तम.  सारांश में इनके द्वारा यदि भय लाभ या नाराजगी से कोई ठकुरसुहाती बात कही गयी तो समझ लो राज्य, धर्म, और शरीर तीनो का नाश होना निश्चित. लंका नरेश रावण की यही स्थिति थी.  भाई आज दैनिक काम काज में खासकर आप शासकीय कर्मचारी हैं तो यही होता है "बॉस  इज आलवेज राईट " का मूलमंत्र अपनाओ.  बॉस का कल्याण भले न हो अधीनस्थ का कल्याण जरूर होने की आशा रहती है यदि बॉस चाटुकार पसंद है तो.  प्रस्तुत है दोहा:-
"सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहि भय आस.
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास".. श्री राम चन्द्र भज जय शरणम...
जय जोहार...........

क्या ली अपने मन की तलाशी है

"नीयत आपकी साफ़ हो तो खुशियाँ आपकी दासी है 
कर्म आपका सही है तो घर में ही मथुरा काशी  है" 
उपरोक्त पंक्तियाँ मैंने लिखी नहीं है, कार्यालय जाते  वक्त एक ट्रक के पीछे लिखी  मिली . भले ही "स" और "श" का फर्क है तुकबंदी में. पर बात पते की है. वैसे जानते सभी हैं. कोई नई चीज नहीं है. दो टूक बात इस बारे में मेरे दिमाग में आयी कि इन दो पंक्तियों में दो  पंक्तियां और जोड़ दी जावे  तो वर्तमान में जन मानस के लिए  कैसा रहेगा;
विद्वजनो के उपदेश में कैसे शब्दों की नक्काशी है 
प्रवचन सुन हम गद गद होते, 
क्या ली अपने मन की तलाशी है 
तात्पर्य, सभी जगह उपदेशात्मक पंक्तियाँ लिखी रहेंगी हम पढेंगे भी. जहाँ तक अमल में  लाने की बात है वही ढाक के तीन पांत 
जय जोहार..........