आईए मन की गति से उमड़त-घुमड़ते विचारों के दांव-पेंचों की इस नई दुनिया मे आपका स्वागत है-कृपया टिप्पणी करना ना भुलें-आपकी टिप्पणी से हमारा उत्साह बढता है

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

चुनाव लड़ने की चाहत



चुनाव लड़ने की चाहत
चाहत लोक हित की
या स्वहित की
स्वहित कैसे कहें
आने लगती है हिचकी

चाहता कानून सबूत
दोषी पाया जान सिद्ध करने
खुले आम ले जाते मदिरा
कपड़े, कम्बल
झुग्गी झोपड़ियों में रहनेवालों के
के बीच वितरण करने

बनाते इन्हें अकर्मण्य
देकर दो-तीन रुपये किलो चांवल,
मुफ्त नमक
कर कैसे सकती जनता नमक हरामी

धन्य है! चुनाव आयोग
"खुले आम" पे लगा लगाम
भले अंदर हो बंटवारा जारी
जय हो जय हो जय हो
निकल पड़े
बड़े धाक जमाने ताबड़ तोड़
सभाएं करते
है सबको कुर्सी प्यारी
जय जोहार ......

2 टिप्‍पणियां:

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

कोण भाखा म लिखे हव ? समझ के बाहिर हे ...

"नेह्दूत" ने कहा…

wahhh