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शनिवार, 24 अप्रैल 2010
फर्स्ट आने का सुख
शनिवार, 10 अप्रैल 2010
ॐ हं हनुमते नमः
आज शनिवार है कहते हैं हनुमान जी की आराधना का दिन है, कारण शनि देव हनुमत कृपा वालों को ज्यादा परेशान नहीं करते. श्रीरामचरित मानस की महत्ता इस बात से जग जाहिर है की यह ग्रन्थ प्रायः हिन्दू समुदाय के हर मानस के घर रखा पायेंगे. मैं भी सुन्दर काण्ड का पाठ समय समय पर कर लेता हूँ, याद आ रहा है प्रसंग: प्रभु श्री राम चन्द्र जी का "जड़" (समुद्र सोखने का प्रसंग) के प्रति भी प्रेम का उदाहरण. श्री रामचंद्र जी के समक्ष समुद्र कहाँ लगता है, पर सर्वप्रथम श्रीरामचन्द्र जी समुद्र सोखने के लिए "विनय" की नीति अपनाते हैं न कि बलपूर्वक अग्निबाण से सोखने की. चूंकि सागर 'जड़" है बुद्धि भले हो सकती है इनमे विवेक का आभाव है, इसीलिए जड़ भी हठ करने लगता है, सोच यह हो जाती है कि आज जरूरत श्रीराम चंद्रजी को है समुन्द्र पार कर सेना लंका ले जाने की (गरज उनकी है) उसका व्यवहार अत्यंत कठोर हो जाता है. विनय का कोई प्रभाव नहीं पड़ता;
"विनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति
बोले राम सकोप तब भय बिन होय न प्रीति" (दोहा क्रमांक ५७)
स्वाभाविक है क्रोध आएगा ही. प्रभु कहते हैं ---- बिना भय के प्रीति नहीं होती. जिसे प्रचलित भाषा में कहते हैं-- लातों के भूत बातों से नहीं मानते. लक्षमण जी से धनुष बाण मंगवाते हैं. यहीं पर मनुष्य के स्वभाव को उद्धृत करते हुए भगवान् राम के द्वारा किये गए इस संकेत को कि स्वभाव अनुसार मनुष्य पर किन किन बातों का असर नहीं होता, सहज ढंग से गोस्वामी तुलसीदास जी ने चित्रित किया है
लछिमन बान सरासन आनू. सौ सौ बारिधि बिसिख कृसानू.
सठ सन विनय कुटिल सन प्रीती. सहज कृपन सन सुन्दर नीती. (१)
ममता रत सन ज्ञान कहानी. अति लोभी सन बिरति बखानी. (२)
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा. ऊसर बीज बये फल जथा.
मूर्ख से विनय, कुटिल के साथ प्रीति, स्वाभाविक कंजूस से सुन्दर नीति (उदारता का उपदेश) ममता में फंसे हुए मनुष्य से ज्ञान की कथा, अत्यंत लोभी से वैराग्य का वर्णन, क्रोधी से शम (शांति की बात) और कामी से भगवान् की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसे ऊसर में बीज बोने से होता है अर्थात सब व्यर्थ.
यहाँ पर इन बातों को लिखने वाले का कतई यह अभिप्राय नहीं है कि वह प्रवचन करने बैठ गया अथवा किसी विशेष धर्म ग्रन्थ का अंधानुकरण करने वाला हूँ. या यूँ कहें कि इस पर टीका करने बैठ गया. ऐसा कुछ भी नहीं है. बड़े बड़े विद्वदजनों को सादर प्रणाम करता हूँ. यह तो इस ग्रन्थ को पढ़कर मात्र शाब्दिक अर्थ को समझकर मन में उत्पन्न हुए भावों का प्रकटीकरण है. भाई हित अनहित तो अपने अपने दर्शन के अनुसार आँका जाता है. जैसे वाद विवाद प्रतियोगिता होती है तो पक्ष वाले किसी विषय पर अच्छाइयां ढूंढकर अपना तर्क प्रस्तुत करते हैं तो विरोध में बोलने वाले बुराइयों को प्रतिपादित करने में लग जाते हैं. यहाँ वाद विवाद की बात नहीं है. किसी भी धर्म, सम्प्रदाय का हो उनके ग्रंथों में लिखी जनहित की बातों को, अच्छाइयों को जरूर अपनाना चाहिए, उनका सम्मान करना चाहिए बजाय इसके कि खोद खोद कर बुराइयां ढूंढ कर लड़ने कटने पर उतारू हो जाएँ. सभी को सभी धर्मो का बराबर सम्मान करना चाहिए ...... याने "सर्वधर्म समभाव"
सियावर राम चन्द्र की जय
पवनसुत हनुमान की जय
उमापति महादेव की जय
सभी संतों की जय
और सभी मित्रों को मेरा जय जोहार ...........
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