आईए मन की गति से उमड़त-घुमड़ते विचारों के दांव-पेंचों की इस नई दुनिया मे आपका स्वागत है-कृपया टिप्पणी करना ना भुलें-आपकी टिप्पणी से हमारा उत्साह बढता है

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

नव-वर्ष में उगते सूरज की सुनहरी रश्मियाँ

 नव-वर्ष में उगते सूरज की  
सुनहरी रश्मियाँ 
समाहित हो जन-मानस के 
रग रग में 
कर दे समूल नष्ट 
शारीरिक व्याधियों को,
मानसिक विकृतियों को।
नव वर्ष के उगते सूरज की 
 सुनहरी रश्मियाँ
उखाड़ फ़ेंक दुनिया से 
हर तरह के विकार 
अत्याचार,दुराचार,व्यभिचार,
दो हजार बारह की तरह 
हो न फिर से समूचा राष्ट्र शर्मसार
नव वर्ष की बहुत बहुत बधाइयों सहित 
जय जोहार ......................................

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

कब बंद होगा अत्याचार ???

(1)
हे माँ आदि शक्ति!  
केवल स्वार्थवश
करता मानव तेरी भक्ति
साधना, अराधना 
नौ  दिन/रात  का व्रत 
उन सभी बुराइयों का 
त्याग नहीं; दमन कर।
(2)
समापन होते ही "नवरात्रि" का 
अंग प्रत्यंग हो जाते हैं 
क्रियाशील 
अपनी अपनी आवश्यकताएं 
पूरी करने की फ़िराक में।
(3) 
लपलपाने लगती है जीभ 
नाना प्रकार के व्यंजनों 
खाद्यपदार्थों को देख  
लालायित है नासिका 
मादक महक पान को। 
 (4)
"मनसिज डालता" डोरे
मिट जाता माता का स्वरूप 
मन मस्तिष्क से 
बन जाती पराई नार 
केवल और केवल भोग्या।
(5)
सुनाई पड़ती चीत्कार
हो चुकी होती है कोई अबला 
दरिंदों की शिकार 
करता वह जी भर के
शारीरिक शोषण 
या कहें बलात्कार।
(6)
माँ कब सुनेंगी आप 
इनकी अबलाओं की पुकार
कब करेंगी इनमे शक्ति का संचार
कब मिटेगा व्यभिचार
कब बंद होगा अत्याचार ??? 
जय जोहार ...........

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

बंधकर परिणय-सूत्र में

                       बंधकर परिणय-सूत्र में, सहज हि उपजे प्रीत।
रख पाये प्रेम सहेज के, वही है सच्चा मीत।।"

                  मनुष्य के सोलह संस्कारों में से एक और मुख्य संस्कार "विवाह" महज वासना तृप्ति का साधन नहीं है बल्कि सांस्कारिक परिवार के निर्माण में सहायक है और जिससे समाज का भी निर्माण होता है। हाल ही में अखबार में एक ऐसा रोचक प्रसंग छपा था। पर्वराज दीपावली के आगमन में चंद दिन, नहीं नहीं शायद चंद घंटे बचे थे।  तभी तो घर में वृद्ध दंपत्ति (दादा दादी के उम्र के को भी यह रास नहीं आ रहा था कि त्यौहार बिना मिठाई मने। पकवान भले बना न सकें, मिठाई तो ला सकते हैं मिष्टान भण्डार से। चल पड़े ऑटो से बाज़ार।  भले ही चल सकने में असमर्थ थे फिर भी पत्नी के साथ जाने के लिए तैयार हो गए। हाँ दादी जरा अपने पति महाशय से हेल्थ के मामले में ठीक थीं।
                        रास्ते में ही मिष्टान भण्डार दिखाई दिया। वृद्धा माता को मालूम है कि उनके श्रीमान जी चलने में असमर्थ हैं अतएव चल पड़ीं स्वयं मिठाई लेने। पर यह क्या शॉप में इतनी भीड़ कि कोई सुन ही नहीं रहा है माताजी की आवाज। कई बार आवाज देने के बाद भी रिस्पोंस नहीं मिलने के कारण दूसरे शॉप की ओर बढ़ती हैं इतने में दादाजी की भी इच्छा होती है कि वे भी उस शॉप में पहुंचे। अतएव ले जाती हैं दादी जी उन्हें सहारा देकर और फिर खरीदते हैं अपनी पसंद की मिठाई। उसमे यह सारांश निकाला गया कि आज के प्रेमी कहने को तो प्रेमिका के  लिए चाँद तारे तोड़ लाने को कहते हैं, अपनी जान दे देने को कहते हैं ...और शादी के बाद चंद  ही दिनों में तलाक की नौबत आ जाती है। क्या कहियेगा प्यार की कौन सी डोर ज्यादा मजबूत होती है .....विवाह के पहले हुए प्रेम की या विवाह के बाद के प्रेम की ?
जय जोहार .........

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

सोलह संस्कार

हमारा हिन्दू धर्म शास्त्र नाना प्रकार के कर्मकांडों से भरा पड़ा है। वैसे जन्म से लेकर मृत्यु तक सोलह संस्कार माने गए हैं।
1. गर्भाधान      2. पुंसवन      3. सीमंतोन्नायन      4. जातक्रम     5. नामकरण
6. निष्क्रमण     7. अन्नप्राशन   8. चूड़ाकर्म           9. कर्णवेध     10. यज्ञोपवीत
11. वेदारंभ      12. केशांत     13. समावर्तन        14. विवाह     15. आवसश्याधाम
16. श्रोताधाम 
इन संस्कारों के बारे में ज्यादा जानकारी तो नहीं है और न ही इन संस्कारों के निष्पादन की तार्किक आवश्यकता के बारे में। पता नहीं हम भी, जैसा कि घर में सयानो के द्वारा कहा जाता है कुछ संस्कारों के निष्पादन/सम्पादन के लिए, उसे मान लेते हैं। अभी हाल ही में हम "गयाजी" गए थे। माता जी तो शैशवा अवस्था में ही, और पिताजी जब हम छठवी कक्षा में थे तब दिवंगत हो चुके हैं। कहा जाता है कि अश्विन मास (क्वार) के कृष्ण पक्ष के पंद्रह दिन पितरों के लिए होते हैं। उन दिनों मृतात्मा की शान्ति के लिए तर्पण इत्यादि किया जाता है और जिन्हें इन पंद्रह दिनों के तर्पण क्रिया से निजात पानी है वे गया जी में जाकर पिंड दान कर आयें। ऐसा करने से जो भी सगे सम्बन्धी दिवंगत हो गए हैं उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है। अतएव हम भी 20 नवम्बर को गयाजी के लिए रवाना हुए थे। 21 व 22 को पिंड दान/श्राद्ध कर्म कर आये। चाहे मृत व्यक्ति के अस्थि प्रवाह के लिए इलाहबाद में कराये जाने वाले कर्मकांड हों या फिर श्राद्ध कर्म के लिए किये जाने वाले कर्मकांड, पंडों की गतिविधियों के बारे में अक्सर बुरा ही सुनने को मिलता था। वह प्रत्यक्ष देखने को मिल गया। हम तो चूंकि जाने से पहले ही हमारे क्षेत्र के यजमानो का काम निपटवाने वाले पंडाजी से संपर्क कर लिए थे इसलिए काम सहज ढंग से निपट गया। वहां जो नजारा देखने को मिला वह ऐसा था कि व्यक्ति कहाँ अपने दिवंगत परिजनों की आत्मा की शांति के लिए, उनके स्वर्ग-गमन की कामना के लिए गया है मगर दान दक्षिणा पण्डाजी के मन माफिक नहीं मिला तो पण्डाजी के गाली गलौच में उतर आने के कारण मन खिन्न हो गया। चूंकि बचपन से ही विभिन्न कर्मकांडों की अनिवार्यता के बारे में घुट्टी पिला दी गई है, मन इन कर्मकांडों को निबटाये बिना शंकित रहता है। वैसे हमें मन से ईश्वर में ध्यान लगाने से ही संतुष्टि मिलती है। गयाजी से आने के बाद 
 सार यही समझने लायक है वर्तमान में खासकर "पैसा पितु पैसा सखा पैसा ही भगवान्". 
जय जोहार ..... 

सोमवार, 19 नवंबर 2012

मरते ही माला पहने चित्र

             ईश्वर/अल्लाह/गुरुग्रंथ साहिब/गॉड, जिन्हें भी हम सर्वोपरि सत्ता माने, उनकी ही रचना है यह जगत। प्रत्येक धार्मिक ग्रन्थ अपने अपने ढंग से इसकी व्याख्या करता है। श्री रामचरित मानस में स्पष्ट रूप से लिखा है;
"बड़े भाग मानुस तन पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन्हि गावा।।
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा। पाइ न जेहि परलोक संवारा।। 

             सारांश में यदि जीवन मरण के चक्र से मुक्ति पाना है तो मनुष्य रूप में जन्म लेकर ही मुक्ति प्राप्त की जा सकती है, सदाचार परोपकार के माध्यम से। प्रायः दिखाई पड़ता है कि जीते जी एक दूसरे के प्रति मन में कितनी कटुता भरी होती है चाहे वह माँ-बाप भाई-बहन आस पास के लोग कोई भी क्यों न हों किन्तु उनके निधन पर अनायास आंसू छलक पड़ते हैं, अरे छलकते नही तो कम से कम आँखें नम तो हो ही जाती हैं। हम, उस माँ के प्रति भी जिसने अपने कोख में 9 महीने रख तीव्र प्रसव वेदना सहकर, इस धरा पर अवतरित किया और उस पिता के प्रति भी जिसने हमारे भविष्य संवारने के लिए क्या क्या नहीं किया उसके प्रति भी निष्ठुर हो जाते हैं। अपनी सुख सुविधा के ख्यालों में वृद्ध माता को अपने घर में स्थान देना पसंद नहीं करते। दिखाने लगते हैं वृद्धाश्रम का रास्ता। हाँ एक बात अलग है यदि कोई बन्दा किसी समूह का जबरदस्त नेतृत्व करने वाला निकल गया, परिवार में, समाज में, गाँव में, तहसील में, जिले में, प्रांत में और फिर राष्ट्र में तो बात ही क्या। और वास्तव में उसका योगदान सबके हित में दिखाई पड़ने लगे तो सोने में सुहागा। फिर भी जीते जी वे अपने विरोधियों को फूटी आँख नहीं सुहाते। किन्तु जैसे ही हो जाता है ऐसे लोगों का निधन विरोधी भी सर्वप्रथम अपने फायदे को निहारते हुए दिवंगत व्यक्ति के प्रति संवेदना सहानुभूति जताते नहीं थकते। अभी हाल की घटना दूरदर्शन के माध्यम से देखने से उक्त विचार मन में उमड़ने लगे और मष्तिष्क में उभर आईं ये चंद पंक्तियाँ: 
                                        (1)
 जीवन-मरण सत्य शाश्वत 
है दुनिया की सोच विचित्र
जीते जी लगते बोझ धरा का
मरते ही माला पहने चित्र
(2)
मानुस तन कर प्रवेश आत्मा,
विकार-जाल में फंस जाती
भौतिक सुख उपभोग-लालसा
दिन प्रतिदिन बढ़ती जाती
(3)
भोग विलास की चाह कराये 
तरह तरह के पाप
अपनी सुख सुविधा खातिर 
त्याग देत माँ बाप 
(4)
अंतहीन स्वारथ-सागर में 
रह रह डुबकी लगाय 
परमारथ में ढूंढें स्वारथ
सोचें कैसे पुण्य कमाय 
(5)
शायद त्याग तन सूक्ष्म अणु
रहि नहि जात मलीन
 लख जन देत श्रद्धांजलि 
होय पंच तत्व-विलीन 
जय जोहार ....

गुरुवार, 15 नवंबर 2012

देख रहा यह दृश्य सारा जहां है

देख रहा यह दृश्य सारा जहां है
पीड़ा है माँ के मन में
बेटे से दूर रहने की 
मांगती है भगवान् से
बेटे की सलामती की दुआ। 
मगर वाह रे वर्तमान!
माँ बाप का ही दोष है 
अथवा जमाने का;
बेटे को ऊंची तालीम, 
दिलाने की तमन्ना
 उसे ऊंचे ओहदे पर 
देख पाने का ख़्वाब। 
नतीजा; 
दौलत की चाह, 
चकाचौंध करती  
पाश्चात्य सभ्यता, 
चला जाता है वह
सात समंदर पार। 
पसीने की कमाई से 
तैयार आशियाना 
बन गया है डरावना खण्डहर 
व्यतीत हो रहा है 
शेष समय वृद्धाश्रम में।
आ गया वह क्षण, 
आत्मा के निर्गमन का 
अत्याज्य मोह! 
   अपनों को समीप पाने का 
चीत्कार रही है आत्मा 
बेटा! बेटा! ...बेटी! बेटी!
प्रतीक्षा की घड़ी समाप्त! 
कहाँ है बेटा, बेटी कहाँ है?
कंधे देना भी हो नहीं पाता मुनासिब, 
       देख रहा यह दृश्य सारा जहां है .......... 
जय जोहार ........... 

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

महा लक्ष्मी नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुवरेश्वरी।
हरी प्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे।।
माँ लक्ष्मी ! दुःख दारिद्र्य दूर करे   
पाप ताप संताप हरे 
दीप ज्योति नमोस्तुते 
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं 
जय जोहार ....
 

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं


 प्रकाश-पर्व दीपावली, जग, जीवन तिमिरारि।
माँ लक्ष्मी तेरे सामने, मागें हाथ पसारि।।
धन धान्य परि पूर्ण करे, होय सत्कर्म की जीत।
बैर-भाव का नाश हो, उमड़े जन जन प्रीत।।

 
लक्ष्मी चंचल होत है रुकत न रोके जाय। 
तनि ठहर ठौर गरीब के, कुटिया दियो सजाय।।
 कुटी महल बिच भेद तजि, रंक की रखियो लाज।
दोउ कर जोरे बिनवौं, मात पधारो आज।।
माता लक्ष्मी सदा सहाय करें।। 
हमारे पूरे परिवार की ओर से आप सभी मित्रों को दीपावली की  अनंत शुभकामनाएं .......
आगे आज देवारी तिहार 
जम्मो साथी संगी संगवारी मन 
सुमिर के लक्ष्मी दाई ल चिटिकुन
तिहार मनावौ बड़ जोरदार 
जय जोहार ..........

सोमवार, 12 नवंबर 2012

नरक चतुर्दशी की हार्दिक शुभकामनाएं

धन-दौलत देवी लक्ष्मी, धन्वंतरि रोग भगाय।

कल है नरक चतुर्दशी, उबटन लगा नहाय।।

आप सभी की चिर-सुखी दीर्घायु जीवन की

प्रार्थना पभु से करते हुए

नरक चतुर्दशी की हार्दिक शुभकामनाएं
जय जोहार ...............

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

लिख मारते थे केवल "नाइस"

ब्लॉग्गिंग के शुरू शुरू के वो दिन 
दिन रात कुछ भी पोस्ट चटका 
और केवल टिप्पणियों की संख्या गिन 
चालू थी ब्लॉग वाणी 
जैसे भी हो कुछ न कुछ लिखा करते थे 
कृपा करती थीं माँ  वीणा पाणी (सरस्वती)
लिख नहीं पाते थे कोई रचना 
दिखानी होती थी  सक्रियता 
ज्यादा से ज्यादा ब्लॉग में 
जा टिपियाते थे 
भले रचनाएं पढ़ें या ना पढ़ें 
नहीं मिलती थीं टिप्पणियों के लिए  च्वाइस 
लिख मारते थे केवल "नाइस"
आज ब्लॉग्गिंग के साथ साथ 
है फेस बुक,  ट्विटर ..
हैं मस्त सब उन्ही में 
बच्चों से लेकर मिसेज एंड मिस्टर 
क्यों ! सही है न ब्रदर & सिस्टर?
........जय जोहार 

 

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

तगड़ा सुरक्षा कवच

 तगड़ा सुरक्षा कवच 
          अभी अभी हम पढ़ रहे थे ब्लॉगर मित्रों के वे पोस्ट जिन्हें ब्लॉग फॉर वार्ता में शामिल किया गया है। रचना पढ़ने के बाद मेरी आदत है जहां तक मेरे मन में कुछ भाव उमड़ते हैं उन्हें टिपण्णी के रूप में प्रकट करने से नहीं रोक पाता। आज आदरणीया संगीता पुरी जी द्वारा भारत वर्ष के विभिन्न प्रान्तों में महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला पर्व  "करवा चौथ" के बारे में ब्लॉगर मित्र/मित्राणियों द्वारा  लिखे  विचारों को ब्लॉग फॉर वार्ता में रखा गया है। हमने भी एक पोस्ट पढ़ा। जब टिपण्णी लिखने की बारी आई तो हम टिपण्णी प्रकाशन के लिए लगे सुरक्षा कवच को बेध नहीं पाए। कहीं रोबोट तो नहीं हैं यह जांचने के लिए कुछ शब्दों को मुद्रित करने कहा जाता है। तीन-चार बार प्रयत्न किये। सफल नहीं हो पाए। चलिए कोई बात नहीं, सुरक्षा कवच तगड़ा होना ही चाहिए।  वैसे कई रचनाओं में टिपण्णी देते वक्त यह लिखा मिलता है "आपकी टिपण्णी सहेज दी गई है, रचनाकार द्वारा अनुमति दिए जाने पर प्रकाशित कर दी जायेगी" यह हमें ठीक लगा।
           जोर जबरदस्ती के कारण नहीं, आस्था और श्रद्धा के साथ वास्तविक पति-प्रेम का प्रतीक पर्व "करवा-चौथ" मनाने वाली समस्त सुहागिनों को हार्दिक बधाई। हमारे छत्तीसगढ़ में इस पर्व के बजाय "हरतालिका व्रत" को ज्यादा प्रधानता देते हैं।
जय जोहार .....

बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

घाटे की अर्थ व्यवस्था

घाटे की अर्थ व्यवस्था 
          जहां देखिये घाटे की अर्थ-व्यवस्था। प्रत्येक समाज की अपनी सामाजिक पत्रिका छपती होगी। हमारे समाज में इसका बीड़ा एक ही व्यक्ति द्वारा मुख्य संपादक/प्रकाशक/मुद्रक सभी की  भूमिका निभाते हुए उठाया गया है जैसा कि "केसर ज्योति" नाम की त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन नियमित रूप से 11 वर्षों से किया जा रहा है। पत्रिका किसी प्रांत तक सीमित नहीं है। हर प्रांत में बसे स्वजातीय बंधुओं के पास पत्रिका पहुंचाने का प्रयास किया जाता रहा है। वैसे पत्रिका को छत्तीसगढ़ प्रांत से अच्छा प्रतिसाद मिला है। मगर बड़े दुःख की बात है कि प्रधान सम्पादक महोदय सदैव यही रोना रोते रहते हैं कि कभी 4.5 लाख  रुपये के घाटे पर चल रहा है पत्रिका के सम्पादन का कार्य तो कभी 6.5 लाख रूपये के घाटे पर। यह बात समझ में नहीं आई  कि वास्तव में यदि इतना घाटा  हुआ है तो 11 वें वर्ष का सफ़र कैसे जारी रख पाई है यह पत्रिका। इसमें कोई संदेह नहीं है कि किसी कार्य को अकेले सम्पादित करने पर कठिनाई तो आएगी ही। अब समाज में हर कोई चाहता है कि पत्रिका में उसका नाम अवश्य दिखे। केवल उसका ही नहीं पूरे परिवार का नाम दिखे। उसकी रचनाओं को प्रकाशित किया जाय। जब सहयोग के लिए निवेदन किया जाता है तब आना कानी। सदस्यता शुल्क दे देने मात्र से यह समझा जाता है कि सम्पादक उसकी हर बात माने।
           अभी अभी प्रधान सम्पादक महोदय से हुई मुलाक़ात ने मुझे कुछ बातें लिखने पर मजबूर कर दिया है। कोई व्यक्ति क्या सचमुच इतना घाटा सहकर अपना कारोबार जारी रख सकता है विशेष रूप से आय का और कोई जरिया न हो तब।  दूसरी बात पिछले साल तक इस क्षेत्र की जनता भरपूर सहयोग करती थी वह इस समय प्रधान सम्पादक महोदय से कटी कटी सी क्यों है? क्या उनके दवारा अपनाया गया सिद्धांत "घाटे की अर्थ-व्यवस्था" इसका कारण है या और कुछ। संपादक महोदय से पूछने पर कहा जाता है कि वे स्वतः हत्प्रभ हैं। "दीपावली विशेषांक" के नाम पर विज्ञापन संकलन (याने विज्ञापन के लिए राशि संकलन) हेतु सम्पादक महोदय जी विगत डेढ़ महीनों से यात्रा पर हैं। दुर्ग उनका आखरी पड़ाव था। आज ही अपनी इंदौर नगरी के लिए रवाना हुए हैं। हमने भी उनसे कह दिया कि जब पूरा देश "घाटे की अर्थ-व्यवस्था" पर चलाया जा सकता है तो आपकी पत्रिका क्यों नहीं चल सकती।
जय जोहार .......

सोमवार, 29 अक्तूबर 2012

शरद पूर्णिमा की बहुत बहुत बधाई

             शरद पूर्णिमा की बहुत   
                बहुत बधाई
जय जोहार ..... 

शनिवार, 27 अक्तूबर 2012

वे क्या मल्टीप्लाइड बाई टू थे

            क्या मानव द्वारा ईश्वर पूजा, ध्यान, योग, या कहें आज की तारीख में धर्मग्रंथों में लिखे उपदेश निहायत ही आज के जीवन में अनुपयोगी हैं? विजयादशमी के दिन चर्चा चल रही थी; क्या सचमुच रावण के दस शीश थे? और हाथ कान आँख याने मानव के कंधे से जुड़े व कंधे के ऊपर के अंग जो 2-2 होते हैं, वे क्या मल्टीप्लाइड बाई टू थे? आश्चर्य व्यक्त किया जा रहा था कि कैसे देवियों/देवताओं की कभी अष्ट भुजाएं कभी सहस्त्र भुजाएं हो सकती हैं? कहा जा रहा था सब काल्पनिक है। यह भी हास्य का विषय बना हुआ था कि कैसे किसी एक व्यक्ति के सैकड़ों/हजारों बच्चे हो सकते हैं। मेरे मन में भी ऐसे प्रश्नों का उत्तर सूझ नहीं रहा है क्योंकि हक़ीक़त में हमने  किसी भी धर्मग्रन्थ का अध्ययन नहीं किया है  किन्तु एक बात बार बार मन-मस्तिष्क को सोचने पर मजबूर कर रहा है कि उस समय मनुष्य अपनी तप  साधना से, योग साधना से निश्चय ही उर्जावान रहा होगा। दीर्घ-जीवी रहा होगा। जहां तक उनकी संतानों की संख्या का प्रश्न है यह भी अविश्वसनीय नही हो सकता जैसा कि अभी तक किसी किसी घर में दर्जन भर सगे भाई-बहन हो सकते हैं तो औसत आयु के हिसाब से प्राचीन युगों में शत व सहस्त्र में संख्या हो सकती है। वैसे प्रवचनों में इन सबकी व्याख्या की जाती है कि इन देवी देवताओं के अंग हों या इनकी संताने, रानियाँ, पटरानियाँ,  ये सब ज्ञान, वेद, उपनिषद ही हैं अथवा इनकी शाखाएं हैं।   
             कर्मकांड को भी एक पाखण्ड कहा जाता है। वैसे इसकी आड़ में आज के तथाकथित ईश्वर-अभिकर्ताओं द्वारा लोगों को भ्रमित कर पैसे वसूलना, चमत्कारों का प्रदर्शन कर अनुयायी बनाकर  कुकर्म करना निश्चय ही दंडात्मक है।  मैं, चूंकि अपने मन की संतुष्टि के लिए ही क्यों न हों; थोड़ी बहुत पूजा-पाठ सम्पादित कर लेता हूँ। पता नहीं इसके बिना मन को सुकून नहीं मिलता। लेकिन दिन रात एक ही प्रश्न उठते रहता है, क्या प्राचीन धर्म ग्रन्थ उपनिषेद सब व्यर्थ हैं? क्या पूजा-पाठ सब व्यर्थ है?  बस इस बात का उत्तर मेरे समस्त मित्रों से प्राप्त होने की आशा में ....
जय जोहार  ........
              

"शून्यं चाशून्यं च"

                             शून्यं चाशून्यं च 

            माँ भगवती की अराधना के अभी अभी बीते वे नौ दिन थे। श्रद्धा, विश्वास, आस्था के सम्पूर्ण दर्शन कराने वाले ये नौ दिन। एक तरफ माँ शक्ति के उपासक की उपासना, दूसरी और "आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनं। पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरी" की अवधारणा के साथ पहाड़ावाली माँ बमलेश्वरी के दर्शन की लालसा लिए मीलों पैदल चलने वालों की श्रद्धा व आस्था। माँ भगवती भक्तों को अपने किसी न किसी स्वरूप का दर्शन अवश्य कराती है। लगता है हमने भी माँ के विभिन्न स्वरूपों में से एक "शून्य" स्वरुप का ब्लॉग के माध्यम से दर्शन किया। मन को रोक नहीं पाए। ध्यान आया माँ भवानी की नवरात्रि में स्तुति के लिए पढ़े जाने वाले श्लोकों का। ये श्लोक पुस्तक "दुर्गा शप्तसती" में उपलब्ध हैं। "श्रीदेव्यथर्वशीर्षम" स्तोत्र में माँ भगवती अपने स्वरूपों का वर्णन करती हैं। उन स्तोत्रों में एक है "अहम् ब्रम्हस्वरूपिणी। मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत।शून्यं चाशून्यं च।" माँ कहती हैं; " मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ। मुझसे प्रकृति-पुरुषात्मक सद्रूप और अस्द्रूप जगत उत्पन्न हुआ।"

            हमने देखा अपने ब्लॉग में पूर्व में लिखे कुछ पोस्ट को। पाया की माँ भगवती "शून्य" रूप में न केवल टिपण्णी कॉलम में बल्कि पोस्ट देखने वालों की संख्या वाले कॉलम में भी पधारी हुई हैं।  माँ भगवती को सादर साष्टांग प्रणाम!
मेरे समस्त ब्लॉगर मित्रों को अमृत बरसाने वाला पर्व "शरद पूर्णिमा" की अग्रिम बधाई सहित .......
जय जोहार ...... 

 

बुधवार, 24 अक्तूबर 2012

दशहरे की बहुत बहुत बधाई


हन - दुर्गुणों का करें 
क्ति का संचार हो 
      "रि" रे जन जन की पीड़ा
  राष्ट्र-हित ही सार हो  
दशहरे की बहुत बहुत बधाई

जय जोहार...........

"विजयादशमी" की बहुत बहुत शुभकामनाएं एवं बधाई


 


समस्त मित्रों को दुराचार पर सदाचार की विजय का प्रतीक 

पर्व "विजयादशमी" की बहुत बहुत शुभकामनाएं एवं बधाई 
जय जोहार----------

कद रावन का बढ़ता जाय


मन का रावन मारें पहले
पुतला बाद में लियो जलाय
 देखत जग हर साल नज़ारा 
 कद रावन का बढ़ता जाय
रावन  मारन रावन  आवें 
रामचंद की जय बुलवाय
 था रावन  पंडित बड़ ग्यानी 
   नीत कुनीत का गुर लछमन को 
 आखिर क्षण में दियो बताय
  कलजुग-रावण राज करत हैं 
   मति जनता का नित भरमाय
   बिनती "सूरज" की जन जन से
  ताक़त अपनी दियो बताय
   करें न घोटाला होय न हवाला
     अरु गरीब का छिने न निवाला  
      मार काट सब बंद होइ जाय
......जय जोहार 
विजयादशमी के पावन पर्व में आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं  

मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012

प्रथमं शैलपुत्री

"ॐ नमश्चंडिकायै"
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी 
तृतीयं चन्द्रघंटेति कूष्मांडेति चतुर्थकं 
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीतिच  
सप्तमं कालरात्रेति महागौरीतिचाष्टमं 
नवमं सिद्धिदात्रीच नवदुर्गा प्रकीर्तिता  
उक्तान्येतानि नामानि ब्रहमणैव महात्मना 
माँ शैलपुत्री सबका कल्याण करे  
जय जोहार।।।।।।।।
    
" ॐ नमश्चंडिकायै "
 "ॐ जयंती मंगलाकाली भद्रकाली कपालिनी 
दुर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा सुधा नमोस्तुते" 
माँ भगवती सबकी मनोकामना पूरी करें
 जय जोहार 

सोमवार, 15 अक्तूबर 2012

"नवरात्रि " की आप सभी मित्रों को बहुत बहुत बधाई."

jay maa durge
"देवी प्रपन्नार्ति हरे प्रसीद प्रसीद मातर्रजगतोखिलस्य 
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमेश्वरी देवि चराचरस्य "
"विश्व शान्ति  की कामना  सहित "नवरात्रि " की आप सभी मित्रों को बहुत बहुत बधाई." 
              जय जोहार....................
 

इत उत चित दौड़ाइ बिनु


"साहित्य का "सा" नहीं जानू 
अपने को कवि कैसे मानू"
      इस बात का आभास अंतरजाल की इस आभासी दुनिया में प्रशंसकों की प्रशंसा के बीच खोये रहने के कारण नहीं हो पाया था। कितनी भी उम्र हम पार कर लें किसी न किसी रूप में "गुरु"/मार्ग दर्शक की आवश्यकता पड़ती है। धन्य हैं अरुण निगम भैया। कुछ ऐसे टिप्स दिए कि अपने आप को निम्नलिखित पंक्तियाँ लिखने से नहीं रोक पा रहा हूँ। साथ ही माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने के दौरान हिंदी व्याकरण में बताये गए सूत्र की भी पुनरावृत्ति हो गई।
शबद संयोजन मात्रा कविता का आधार।
याद न आवे सूत्र यदि, रचना सब बेकार।।
सूत्र संग यह होय, सही भाव प्रकटीकरन।
समझ सके हर कोय, इत उत चित दौड़ाइ बिनु।।
जय जोहार.............

रविवार, 14 अक्तूबर 2012

घुट घुट जन जो जी रहा

देखते पढ़ते हर पोस्ट चेहरा-ए-किताब में
उमड़ते घुमड़ते भावों को, उकेरते हैं ख़्वाब में
राजनीति से नीति हटी, बच गया केवल राज 
घुट घुट जन जो जी रहा रास न आया काज 
मंहगाई, कितनी बढ़ रही, कौन हरे गरीब की पीड़ा
पिशाच "भ्रष्टाचार" हनन का का कौन उठावेगा बीड़ा
"शक्ति"-साधना दिवस "नवरात्रि" होगी सोलह (अक्टोबर) से प्रारम्भ
सोचूं,  हत होगा "भ्रष्टाचार" भी, संग संग शुम्भ-निशुम्भ
नौ दिन का त्यौहार "नवरात्रि" रख संयम सभी मनावें 
विश्व शान्ति की करें कामना, माँ को श्रद्धा सुमन चढ़ावें 
नवरात्रि की अग्रिम बधाई सहित
.............जय जोहार।।।।

रविवार, 7 अक्तूबर 2012

साबुन अउ शेम्पू लगा के नहाये

साबुन अउ शेम्पू लगा के नहाये 
घूमे एती ओती टुरी चूंदी ला छरियाये
तभो ले चूंदी अरझैच नहीं
गोठियावै काखरो मेरन, कोनो ओरझेच नहीं
काबर के मुह कान जम्मो रथे गमछा भीतर
गोठियाने वाला सोचथे, मारत हौं तीतर  
करलई हे इही बात के ददा अउ दाई ला
कउन आय बहिनी नइ चिन्हावै भाई ला
संगे संग काम करथें टुरी-टूरा तहां हो जथे पियार
दाई ददा ल कथें अपन मन ल मार डार
बदल गे हे अब के सब रीति रिवाज
झुका देथे माँ बाप ल इंखर मिजाज
दुनो के परिवार माँ यदि माड़ जथे जोंगा
बाजे लगथे गुदुम बाजा(आज के डीजे), लमा के चोंगा
अउ बिगड़ गे बात, तभो इन ल नई ये कौनो बात के फिकर 
जुग बदल गे हे कायच कर लेबे, अउ कतेक करबे,
अइसन बात के जिकर.......
जय जोहार............... 
एती-ओती = इधर-उधर। चुंदी = बाल, केश। छारियाये=बिखेरे। अरझैच नहीं= बाल उलझता नहीं।
गोठियावै काखरो मेरन = किसी के साथ भी बात कर रहे हों। कोनो ओरझेच नही = इन से कोई नही लगता(उलझता). काबर के = क्योंकि। मुह कान जम्मो = मुह कान सभी (पूरा चेहरा). गमझा = साफा या स्कार्फ। मारत हौं तीतर = याने तीतर मार रहा हूँ। करलई हे = अफ़सोस है। ददा दाई = माँ बाप। नई चिन्हावै = पहचान नहीं आते। टुरी-टुरा = लड़का लड़की। माड़ जथे जोंगा = बात बन जाती है। कायच कर लेबे = क्या कर सकते हैं। कतेक कर लेबे = कितना कर सकते हैं। 
अइसन बात के = इस प्रकार की बातों का।

शनिवार, 15 सितंबर 2012

इसमें कछु नहीं है हर्जा

धन्य है हमारा देश! 
भिन्न भिन्न बोली 
भिन्न भिन्न भाषा 
हर का  पृथक पृथक परिवेश 
कब तक बनी रहेगी "बेचारी"
पाकर भी  राजभाषा का दर्जा 
सोचती है;  कम से कम याद
तो करते हो, पखवाड़ा ही सही
परिपाटी चलने दो, 
इसमें कछु नहीं है हर्जा  
जय जोहार ........

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

मेरी लेखनी क्यूं कुंठित हुइ जा रही

मेरी लेखनी क्यूं कुंठित हुइ  जा रही 
तुझे कागज़ की कोरी पन्नी क्यूं नही भा  रही 
सोचती क्या दिन-रात तू 
तेरी उकेरी चंद पंक्तियाँ 
क्यूं जन -आशीष नहीं पा रही 
शब्द सागर भंवर जाल में 
व्यर्थ  डूबती क्यूं जा रही 
सीने तक गहराई नाप पैठ क्यूं नहीं पा रही 
मेरी लेखनी क्यूं कुंठित हुइ  जा रही
जय जोहार......... 

बुधवार, 15 अगस्त 2012

स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक बधाई, सभी मित्रों को
 
आजादी की छः सठवी सालगिरह
सोचता हूँ ; आम आदमी से लेकर                                       
देश के कर्णधारों के बीच होती नहीं 
इस बात पर जिरह 
कि  खूब कमायें खूब खाएं 
पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान 
न पहुचाएं  
मानता हूँ  आम आदमी 
होता है तमाम घोटालों का शिकार 
लगा देता है झड़ी  आलोचनाओं की 
भूल जाता है उसके पास क्या है 
समाधान के लिए इलाज 
सोचता नहीं, 
लगी है उसी की रकम 
सार्वजनिक जन-सुविधा के लिए 
उपलब्ध कराये गए संसाधनों में 
फिर भी;  बजाय उसकी हिफाजत के 
लग जाता है ध्वस्त करने में .
क्या यही है स्वतंत्रता ?
 जय जोहार .......

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

लोग हमसे बिदकने लगे हैं


                   बहुत दिनों से मेरे अंतरजाल में फोंट की समस्या उत्पन्न होने या  यूँ कहें कि   नेटवर्किंग के बारे में अपने  अल्प ज्ञान  के कारण एक भी पोस्ट नहीं लिख पाया. पोस्ट के बदले "रचना"  अरे अरे अरे ... भाषा विज्ञान अथवा साहित्य का "सा" भी जिसे ज्ञात न हो वह रचना शब्द कैसे प्रयोग में ला सकता है, "पोस्ट" कहना चाहिए ..अतः "पोस्ट" लिख देता हूँ.  आजकल मित्र मंडली से अलग थलग महसूस कर रहा हूँ. यह न समझा जाय कि मित्र मंडली ने मुझे अलग कर दिया है. इस सन्दर्भ में मेरे मन में उपज रहा संदेह कहें या मन का भ्रम चार पंक्तियों में प्रकट करने से रोक नहीं पा रहा हूँ  :-
लोग हमसे बिदकने लगे हैं
रिश्ते नातों के सेतु भसकने लगने हैं 
दिया है कुदरत ने  ज़िन्दगी का  तोहफा-ए-जुबाँ  
जुबाँ से निकले अलफ़ाज़,
 लगता है लोगों के  दिल को  चुभने  लगे हैं
लोगों के बीच जिसका कोई वजूद नहीं, 
पल- पल बनके "अरसा" गुज़रने लगे हैं 
ऐ मालिक! करता है अर्ज़ तुझसे ये नाचीज़ 
जल्दी दफा कर दुनिया से इसे 
लगता है हम दिला न पाए  एहसास अपनेपन  का 
अपनों के बीच हम  पराये लगने लगे हैं 
जय जोहार..........

शनिवार, 3 मार्च 2012

होली का त्यौहार, पौराणिक कथा, धार्मिक, पारंपरिक व वैज्ञानिक कारण


             होलिका दहन पर्व के कई मत, मतांतर हैं। इसे मुख्य रूप से हिरण्य कश्यप की बहन होलिका के दहन का दिन माना जाता है, वहीं शास्त्रों में कई तरह के मत दिए गए हैं। फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक आठ दिन होलाष्टक के बाद होलिका दहन की परंपरा है।  पारंपरिक दृष्टिकोण  कहता  है कि खेत से उपजी नई फसल या कहें नव अन्न का  यज्ञ/ हवन किया जाता है. यह परंपरा गांवों में अभी भी प्रचलित है।
            सामान्यत: रंगों के  इस त्यौहार के संबंध में भगवान विष्णु के भक्त प्रहलाद  को गोद में लेकर  हिरण्यकश्यप की बहन होलिका, जिन्हें वरदान प्राप्त था कि अग्नि उन्हें जला नहीं सकती,   के अग्निकुंड में बैठने जाने  की कथा प्रचलित है। वस्तुतः हिरण्यकश्यप अमरत्व का वरदान पा लेने के आवेश में (यद्यपि यह उसका  भ्रम ही था)  अपने को ईश्वर समझ बैठता है व चाहता है कि सभी उसकी ही भक्ति करे. वह आततायी हो जाता है. अपने पुत्र प्रहलाद को परम पिता परमेश्वर की भक्ति करने से रोकता है किन्तु प्रहलाद अडिग रहता है. उसे ज्ञात है कि  ईश्वर एक है. प्रहलाद की  भक्ति में इतनी शक्ति थी कि होलिका का दहन हो जाता है वहीं  भक्त प्रहलाद बच जाते  हैं.    इसके साथ ही होली से  सम्बंधित कई मान्यताएं प्रचलित हैं-
                शास्त्रों के अनुसार होलाष्टक के दौरान मानव मन-मस्तिष्क में काम भाव रहता है। भगवान शंकर द्वारा क्रोधाग्नि से काम दहन किया गया था, तभी से होलिका दहन की शुरुआत होना भी माना गया है।
                   होली इस पर्व के पीछे वैज्ञानिक कारण भी मौजूद हैं। ऐसा माना जाता है कि दो ऋतुओं का यह समय संधि काल होता है अर्थात  सर्दी के  जाने और गर्मी के  आगमन की  के दिन हैं। ऐसे में सर्द गर्म (शीत ज्वर) से अधिकाधिक लोगों के स्वास्थ्य खराब होते हैं। इसी के निवारणार्थ वातावरण में गर्मी लाने के लिए होलिका दहन किए जाते हैं।
                   शास्त्रों के अनुसार इस दिन आम्र मंजरी, चंदन का लेप लगाने व उसका पान करने, गोविंद पुरुषोत्तम के हिंडोलने में दर्शन करने से वैकुंठ में स्थान मिलना माना गया है। भविष्य पुराण में बताया गया कि नारद ने युधिष्ठिर से कहा कि इस दिन अभय दान देने व होलिका दहन करने से अनिष्ट  दूर होते हैं।

                           सारांश में यह कहा जा सकता है  कि  अपने मन के विकारों को जला प्रेम के रंगों में एक दूसरे को रंगने का पर्व है.  आयें हम सब मिलकर आत्मीयता के साथ इस पर्व का आनंद लें....... मेरे सभी मित्रों को "होली" की सप्रेम बहुत बहुत बधाई..........
जय जोहार.......

रविवार, 1 जनवरी 2012