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सोमवार, 21 जून 2010

घुरुवा के दिन घलो बहुरथे

घुरुवा के दिन घलो बहुरथे 
 
ऊपर दिखत हे तउन फ़ोटू माँ दू ठन हा "घुरुवा" के आय अउ एक ठन हा अइसे  बस्ती के, जेन ला  "घुरुवा" च केहे जा सकथे. हमन देखे होबो अउ अनुभव घलो करे होबो के गाँव मा "घुरुवा" के का महत्त्व रहै.  पहिली अतेक आधुनिकता के ज़माना नइ रहिसे.  माटी के घर माँ रहन अउ माटी च के खपरा (भट्ठी मा पका के बनाये) के रहै छान्ही. घर माँ खूब गाय भैंसी पालें. घर ला बने गाय अउ भइन्स के गोबर मा लीपें.  उही गोबर ले छेना थोपें. अउ छेना(कंडा)  के  आगी मा चुल्हा माँ भोजन रान्धें.  पहिली आज कस कचरा फेंके के पलास्टिक के डब्बा उब्बा(जेन ला आज डस्ट बिन कथें) के उपयोग नइ होवत रहिस. घर ले थोर किन दुरिहा मा कचरा ला फ़ेंक देत रहिन हे.  ओमा चाहे गोबर होय चाहे अउ कांही कुछु. कुल मिला के गंदगी रहै. वैसे गोबरे च ला कुढ़ोवें. अउ एखरे ढेर ला कहैं "घुरुवा". गोबर के ये ढेर हा खेती बर अब्बड़ फायदा के चीज रहै. एला कथें गोबर खातू.  एखरो किम्मत रखें जी जेखर "घुरुवा" रहै ओ मन. खेती किसानी के दिन मा इन घुरुवन के बहुत डिमांड रहै. इन्खरो दिन हा फिर जाय अउ घुरुवा के मालिक के ओखर लेवैया के घलो. जम्मो  बर फायदेमंद रहै.  एक बात अउ ये घुरवा के लेवैया ला कचरा के ढेर माँ कांही कीमती चीज मिल गे त झन पूछ. मिले के संभावना बिलकुल रथे च. त ये तो होईस घुरुवा के गोठ.
                                   हमर देश माँ ओइसने एक तबका अइसे हे के  झुग्गी झोपड़ी मा कइसनो करके अपन गुजर बसर करत हे. एक लाँघन दू फरहार करके रहत हे. इहों कभू कभू होनहार लइका निकल जाथे जउन हा कंडिल (लालटेन) अउ चिमनी के अंजोर मा, अउ नही त सड़क मा लगे खम्भा के लाईट के अंजोर माँ पढ़ लिख के अतेक बड़े आदमी बन जाथे के ओखर पूरा घर परिवार तर जाथे. अउ दूसर मन तहां ले केहे ल धर लेथें "घुरुवा के दिन बहुरगे" कहिके.  मैं अपन एक संगवारी ल देखे हंव. ओखर सियान (ददा) हा ठेला चला के ओला पढ़ाइस. आज ओ हा टेलीफोन विभाग मा बने नौकरी करत हे. अपन परिवार ला चलावत हे. बहुत हुसियार रहै. गणित मा ८०-९० प्रतिशत नंबर लावे. ओखर इंजीनियरिंग कालेज मा घलो होगे रहिसे सिलेक्शन. फेर इही रुपिया पैसा के परबन्ध अउ पहिली कालेज मा रेकिंग के नाव मा होअइया मार पीट के डर माँ बिचारा पढ़ नई पईस. सार चीज जउन केहे चाहत हौं वो आय "कमल हा कीचड़ माँ ही खिलथे.  घुरुवा घलो उपयोगी होथे कभू कभू.  आप सबो के समझ आवै कहिके अलकरहा भाखा के मायने घलो लिख देथौं:-
                                                       लालटेन/लेम्प के अंजोर  मा पढ़त

घुरुवा = कचरा/गोबर के ढेर                                                              
अनुभव घलो करे होबो = अनुभव किये होंगे.
अतेक = इतना  
खपरा = खपरैल 
भोजन रान्धें = खाना बनाते थे. (कूकिंग) 
खम्भा के लाईट के अंजोर माँ = सड़क में लगे खम्बे के  लाईट के उजाले में.
इन्खरो दिन हा फिर जाय = इनकी भी तकदीर चमक जाती थी या इनमे भी बदलाव आ जाता था. 
एक लाँघन दू फरहार करके रहत हे = दो जून की रोटी भी नसीब न हो पाना. एक जून खा रहे हैं तो दो दिन उपवास .
"घुरुवा के दिन बहुरगे"  = कूड़े के ढेर के दिन भी बदल गए याने इनकी भी  तकदीर चमक गयी. 
वैसे ज्यादा कठिन नही है. समझ में आ ही जावेगी. 
जय जोहार........

सोमवार, 7 जून 2010

ए का जिनिस ए = यह क्या चीज है

आनी बानी के बियन्जन अउ ओखर नाव। काला बचांव अउ काला खांव. एखरे ऊपर एक किस्सा के सुरता आगे. एक झन गवैंहा हा हलवाई  के दुकान माँ जाथे अउ कई परकार के चीज माढ़े रथे ओमा ले एक मा इशारा करके पूछथे जी. ए का जिनिस ए कहिके. हलवाई कथे "खाजा" . ओला कहानी समझ मा नई परे सोचथे कइसे गोठियाथे हलवाई हा? खा जा कहत हे. फेर पूछथे: ये का जिनिस ए ? फेर उही जवाब; "खाजा". ओ गवैंहा के भेजा मा नई घुसरै. दू तीन पईत दोहराथे. जवाब मा कोनो बदलाव नहीं. अब ओखर दिमाग चढ़ गे रथे. शुरू कर देथे खाए बर. हलवाई परेशान. कथे " अरे अरे ये क्या कर रहा है ?" जवाब पाथे काय करत हौं अतेक जुवार होगे पूछत मोला के ये का जिनिस आय तैं  कहत हस "खा जा" त खाथौं अउ काय. हलवाई अब काय बोलै.....
बियंजन = पकवान 
नाव = नाम
माढे रथे = रखा रहता है                                                  
काला खांव = किसको खाऊं
 काला  बचांव = किसको बचाऊं
सुरता = याद 
गवैंहा = देहाती 
सुरता आगे = याद आ गया 
परकार = प्रकार 
ओमा ले = उसमे से 
जिनिस = चीज 
पूछथे = पूछता है 
गोठियाथे = बताता है या कहता है 
उही = वही 
दू तीन पईत = दो तीन बार 
भेजा माँ नई घुसरै = समझ में नहीं आता या भेजे में नई घुसता.
दिमाग चढ़ जाथे = जोश में आ जाना आवेग में आ जाना या कहें दिमाग गरम हो जाना 
काय करत हौं = क्या कर रहा हूँ 
अतेक जुवार होगे = इतनी देर हो गयी. 
हलवाई अब काय बोलै = हलवाई अब क्या बोले 
मित्रों अब हमारी ये  मीठी बोली (गुरतुर गोठ) समझ में आ ही जावेगी.  
जय जोहार.......

शनिवार, 29 मई 2010

का साग खाए ले शुरू, मात जाथे बाद मा रमझाझर

जाड़ के दिन माँ येती बिहनिया के काम बूता करे के बाद घर गोसईनीन मन काय करै. एक दू घंटा सुतिन फेर चार साढ़े चार बजे संझा जुवार एक जघा जुरियाये लगिन. तहां ले शुरू गोठियाना. वइसे ये जुरियाना हा गाँव माँ का का होवत हे एखर खबर मिले के अस्थान घलो आय. भले ये खबर हा कतका सही हे कतका बनावटी ये बात अलग आय. 
हाँ एक बात जरूर हे बहुत कम अइसे  देखे जाय के एक दूसर के नाव (नाम) ले के कोनो ल  संबोधित करै. अब देखौ एक दृश्य; शुरू होवत हे गोठियाना (नाव मन मनगढ़ंत आय पढ़ैया मन अपन ऊपर झन ले लेहू) 
मंगलू के दाई: "का साग खाए" ओ सुकारो के भौजी? 
सुकारो के भौजी:  ये दे गर्मी के दिन माँ काहीं बने असन सागो नई आवै, भइगे कोंहड़ा  अमटहा (मही याने छांछ वाला) रांधे रेहेंव. 
मंगलू के दाई: वाह एला भइगे कथस, अम्टाहा साग हा तो अब्बड़ मिठाथे वो. मोर लार गिरे लागिस.
अउ दू तीन झन बइठे रहै ओहू मन मंगलू के दाई के बात माँ हामी भरे लगिन. 
सुकारो के भौजी(मंगलू के दाई ला):  ले का होगे बांचे हवे. ले जाबे . 
अब अतका तक तो ठीक हे. फेर होगे चालू ; 
मंगलू के दाई हा धीमे अवाज मा तिसरैया बइठे रहै तौन डहर इसारा करके केहे लागिस: 
"भइगे ओ हमर गाँव के इज्ज़त दांव मा लग गे हे टुरी टूरा मन के बढती उम्मर का का नई होवत हे 
अब देख न लछमिन के दाई ददा ला फिकर नई ये लछमिन के गोड़ हा फिसलत हे कोन जनि जब देखबे तब कोन टूरा आथे बने शहरिया कस फूल पेंट पहिने फटफटी मा अउ टुरी टूरा दूनो चलिन. दाई ददा तो निकले रथें काम बूता माँ." बस ये बात निकलना रहिसे के लछमिन के दाई के होगे शुरू : मोर टुरी के चरित्तर माँ तय लांछन लगाथस जबरदस्ती. पहिली अपन घर ला देख. अब टूरी टूरा के बात ले हट के बिहाता मन ऊपर आगे. अपन शादी शुदा ननद ला देख. अपन मइके माँ बइठे हे.  कोन जनि खाखर संग फंसे हे के ओखर घरवाला हा ओला छोड़ दिस. अब हो गे इनखर मन माँ शुरू एक झन कहत हे तय ऐसे हस दूसर कहत हे तय ऐसे हस दूनो डहर ले मर्यादा ले बाहिर के  भाखा के बान चलाई शुरू राणी दुखहाई,  अउ भइगे इहाँ लिखे के लाइक नो है, तइसन तइसन गारी .... इहाँ तक नौबत आगे के मार पीट माँ उतर आईन.  मात गे रमझाझर.......... ( यहाँ सारांश यह है कि गाँव में प्रायः महिलायें एक स्थान पर इकट्ठे हो जाया करती थीं सब्जी भाजी से शुरू कर घर घर के किस्से शुरू कर देती थीं कभी कभी वहीँ बैठी महिलायें एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप शुरू कर देती थीं और रमझाझर याने महाभारत शुरू हो जाता था.) ........जय जोहार.   

शुक्रवार, 28 मई 2010

छत्तीसगढ़ी के गुरतुर गोठ, (छत्तीसगढ़ की मीठी बोली)

छत्तीसगढ़ी बोली को आप अंग्रेजी की तरह बोली जाने वाली कह सकते हैं. मिसाल के तौर पर एक वाक्य लेते हैं "पिताजी भोजन कर रहे हैं"  कर रहे हैं शब्द का प्रयोग  अंग्रेजी में बहु वचन के लिए होगा (means plural number) नहीं तो साधारण तौर पर लिखेंगे Father is eating. हम हिंदी में बड़ों के प्रति आदर भाव प्रकट  करने के लिए  "कर रहे हैं"  प्रयोग करते हैं.  पर छत्तीसगढ़ी में अंग्रेजी के माफिक कहेंगे ददा खाथे. ददा याने पिताजी. खाथे याने खा रहे हैं.  ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं. मेरा बचपन गाँव में बीता है. पहले गाँव में मनोरंजन के कोई साधन नहीं हुआ करते थे. ज्यादा हुआ किसी चौपाल में छोटा मोटा गीत संगीत का (फ्री स्टाइल में गाने बजाने वालों का) कार्यक्रम होते रहता था. वह भी किसी त्यौहार विशेष के अवसर पर. अन्यथा महिलायें कहीं पर एक साथ बैठ कर बतियाते रहती थीं. अन्य व्यक्ति के बारे में चर्चा कर, निंदा कर, उन्हें मजा आता था. बतौर प्रहसन इसे लिखा जावेगा. कृपया प्रतीक्षा करें.  मुझे याद आ रहा है उच्चतर माध्यमिक शिक्षा ग्रहण करने के दौरान हिंदी के पीरिएड में व्याख्याता महोदय द्वारा किसी विषय पर निबंध लिखने का तरीका क्या क्या होता है यह उदाहरण छत्तीसगढ़ी बोली के माध्यम से बताया गया. उन्होंने शुरू किया "भूमिका" से. अब भूमिका क्या होती है इसे समझाने के लिए जो मजेदार बात उन्होंने बताई वह थी गाँव  में यदि किसी के घर भोजन बन रहा हो और भोजन बनाने वाली को पता चलता है कि सब्जी में डालने के लिए नमक नहीं है तब वह पड़ोस से नमक मांगने जाती है और बतौर भूमिका के पड़ोसन को आवाज देते हुए कहती है; "हवस का ओ मंगलू के दाई ? का साग रांधत हस ओ? तात्पर्य मंगलू की माँ क्या सब्जी बना रही हो? लेना उसे वहां से नमक है पर बतौर भूमिका वह पहले यह प्रश्न कर रही है. यह अलग बात है कि कभी कभी संवाद यहाँ से शुरू होकर महाभारत में भी तब्दील हो जाता था. प्रहसन के रूप में एक छोटा उदाहरण दिया जावेगा ..... अगले  पोस्ट में.
जय जोहार......... 

गुरुवार, 27 मई 2010

छत्तीसगढ़ी पुडिया

जैसा कि कल हमने ललित भाई के आने के समाचार का पोस्ट लगाया, उसमे क्षेत्रीय बोली का प्रयोग भी किया। टिप्पणी भी आई है जैसे को तैसा का विचार के साथ याने छत्तीसगढी मे। आज सोचा क्यों न अपनी बोली मे एक छोटी सी पुडिया यहां छोड़ दी जाय।  लीजिये मै ब्लोग लिखने की लत क्यों पाला ? इसका उत्तर छत्तीसगढ़ी में  "मोला ललित भाई लुति लगाइस तेखरे पाय के इंहां बैठे बिना चैन नइ परै। अर्थात ललित भाई ने उकसाया ब्लोग मे आने के लिये इसीलिये रोज यहां बैठे बिना चैन नही पड़ता। लुति लगाना = उकसाना। तेखरे पाय के = इसी वजह से या इसी कारण से।(१)  धूप बडी तेज है।(२)  धरती तप रही है।(३)  बिना जूते चप्पल के आप पैर नही रख सकते। अपनी बोली मे " (१) कतेक तीपत हे ये घाम हा। (२) भोंभरा जरत हे। (३) बिन पनही के तैं रेन्गे नई सकस।" धूप बडी ………पैर नही रख सकते" वाक्यांश के अर्थ  के लिये सन्केत है हिन्दी शब्दों का रन्ग(१)  नीला और छत्तीसगढी के लिये लाल। (२) हिन्दी के लिये  बैगनी छत्तीसगढी के लिये गुलाबी। (३) हिन्दी के लिये सन्तरा और छत्तीस्गढी के लिये भूरा। अभी इतना ही। …  हाँ ललित भाई लगता है थकान की वजह से अभी दिखाई नही पड़ रहे हैं। वैसे कल बोले थे कि अभी पठन पाठन मे लगेंगे फिर अपनी गाड़ी शुरु करेन्गे। ……जय जोहार्…

बुधवार, 26 मई 2010

"मैं गोंडवाना मा हंव गा"

तारीख २६ दिन बुधवार.  जिन्दगी के रोज के ढर्रे के मुताबिक भिलाई से कर्तव्यस्थली राजनांदगांव आगमन. दोपहर के डेढ़  बज रहे थे, बड़ी बड़ी मूंछों वाले जनाब, "शेर सिंह" के नाम से संबोधित किये  जाने वाले, दुलारू ललित भाई का फ़ोन आया. "मैं गोंडवाना मा हंव गा" (याने मैं गोंडवाना ट्रेन में हूँ) मैं  समझ गया साहब दिल्ली से लौट रहे हैं. आइसक्रीम का क्रीम (दिल्लीवाली aaiskreem) अब बचा नहीं है.    मैं बोला "गोंडवाना अभी?  बोले: "हाँ रे भाई लेट चलत हे" (ट्रेन लेट है). तोर ड्यूटी ख़तम होए के बेरा मा पहुँचही, तहूँ आजा ट्रेन मा संघर जाबो. (हाँ ट्रेन लेट चल रही है, तुम्हारी ड्यूटी ख़तम होने के समय पर पहुंचेगी राजनांदगांव, आ जाओ स्टेशन,  साथ चलेंगे). हमारे साथ एक समस्या है हम अपनी ओर से कुशल क्षेम पूछने के आलावा और कुछ नहीं कर पाते.    किसी की क्या समस्या है, चलो हल कर दें, तत्काल नहीं सूझता.  यदि किसी से परिचय हुआ हो और वह रिश्ते में बदल गया हो तो अपनत्व के नाते उससे अपनी  बात कह देना  सहज नहीं है. लेकिन इस बात को मानना पड़ेगा कि ललित भाई साहब ने हमें अपना समझ एक अवसर प्रदान किया हमसे सेवा लेने का. अच्छा लगा. सो चले आये हम भी ट्रेन में. मिले. बहुत मजा आ गया. और तो और दुर्ग पहुँचने पर मूंछों वाले हमारे ललित भाई के अनुज श्री जी. एल. शरमा जी, कृषि विश्वविद्यालय  रायपुर  में पदस्थ,    जिनकी जन्म तारीख भी वही है जो हमारी जन्म तारीख है, से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ. दर असल वे  कुछ अपने काम से दुर्ग आये थे  कार से. ललित भाई द्वारा उनसे चलित दूरभाष से संपर्क करने पर ज्ञात हुआ. भाई जी के कहने पर निर्णय लिया गया  कार से ही अपने गंतव्य स्थान के लिए रवाना हुआ जाय. मेल मिलाप हुआ. जलपान इत्यादि हुआ. फिर ललित भाई एंड कंपनी अपने ठिकाने की ओर रवाना हुए और हम भी हमेशा कि तरह अपनी डुगडुगी (मोपेड) स्टेशन के स्टैंड से उठा अपने घर की ओर...........जय जोहार........! 

मंगलवार, 25 मई 2010

इहाँ तो पंद्रही होथे सियान

भाई ललित न फ़ोन है न कोई  ब्लॉग में प्रविष्टी 
कहाँ हो गए हैं अंतरध्यान
बोले थे अठ्वाही के बाद मिलेंगे
इहाँ तो पंद्रही होथे सियान 
(पंद्रह दिन हो रहे हैं)
आईसक्रीम ख़तम नई होवत हे का जी? 
जय जोहार........

रविवार, 16 मई 2010

गुरतुर गोठ छत्तीसगढी

(१)
केहे के आय गुरतुर, कोन जनि काबर नई पावै 
काखरो आशीर्वचन के दू भाखा 
सोचे ल पड़ जाथे, कैसे फैले पूरा जग माँ 
बर के पेड़  सरीख  ये भाखा के शाखा 
(२) 
वैसे तो ये आय ब्लॉग के दुनिया 
बोलथे तूती ओखरे जेखर गड़े हे इहाँ झंडा 
नवा नवा दुकानदार के कारोबार 
शुरू माँ रथे ठंडा ठंडा 
(३) 

अपन अपन मठ ले संगी,  बड़े बड़े स्वामी मन  गरियाथें
कोन काखर बर काय कहत हे तेला 
जासूसी कर  सोरियाथे
(४)

ये सब करे के जरूरत नई ये, गुरतुर बोली, ज्ञान के बानी, 
लिखौ गीत गजल  कहानी 
नवा चेला ल बने पाठ पढ़ावौ 
उंखर बने हौसला बढ़ावौ 
पाहौ चीज इहाँ आनी बानी .

जय जोहार.......


आगे अक्ती तिहार अउ भगवान् परशुराम जयंती

                                      भगवान् परशुराम जी की जय 
जम्मो झन ला भगवान् परशुराम जयंती के गाड़ा गाड़ा बधाई 
अक्ती तिहार। इही हा ओ दिन आय जेमा महूरत फ़हूरत नई देखे जाय। पुतरी पुतरा के बिहाव तो ठीक हे, ए दारी तो अब्ब्ड अकन बिहाव हे जी। एखर अलावा एखर महिमा अउ हे। इहिच दिन मा भगवान परशुराम के जनम दिन मनाये जाथे। वैसे भी हमर देश सर्व धर्म समभाव के विचार करत आनी बानी के परब मनाथे। सोचे जाय त रोजेच तिहार हे। ग्रन्थ, वेद,  पुरान  हा हमर सन्सक्रिति हा तिहार बार ले  भरे हे। थोकिन दिन मा आ जाही रथ जात्रा, हरेली,  राखी, दशहरा देवारी…………। अकति के दिन के  तिहार के नाव ले बचपन के सुरता आ जाथे। हमर ममा मामी इंहां रात के पुतरी पुतरा के बिहाव करैं। पहिली बिहनिया ले घर माँ बडे मटका जेला करसी घलो कथें ओमा अउ  ओखर संगे संग  छोटे छोटे चुकिया मा  चुकिया मा  आमा अउ कांदा (शकरकंद) डार के पूजा होवे. अक्ती के दिन ले मटका के पानी पियाई शुरू होवे.  अब सूरज भगवान् हा  धरती माँ अंगरा फेंकत हे त अक्ती के अगोरा नई करन शुरू  हो  जाथे करसी के पानी पियाई चईते महीना ले. अरे हाँ जलवायु ला देख के खाए पिए के घलो कैसे बेवस्था बने रहिसे पहिली. अक्ती के दिन ले ही चना अउ गंहू ला भूंज के पिसाये पिसान ला जेला सतुआ कथें खाय के दिन शुरू होवे. ये सतुआ हा पेट बर हे  बड़ा फायदेमंद. एखरे ऊपर ले एक ठन कहानी याद आगे. बानी अउ भाखा के का परभाव परथे.  दू झन राहगीर रेंगत रेंगत अपन कोनो गाँव जात रहैं.  एक झन मेर सतुआ रहै अउ एक झन मेर धान.  धान वाले हा सोचिस मोला भूख लगही त कैसे करिहौं. धान ला कुटाना पकाना बड़ पिचकाट. बड़ चतुरा.  ओला  सूझिस काबर न सतुआ वाले मेरन ले सतुआ ले जाय. कैसे भाखा के परयोग करिस ध्यान देहु ; कहत हे सेतुवा वाले ल  "सतुआ खाए बर बड़ मेहनत हे; सतुआ मन मेतुआ जब घोरब जब घारब तब खाब तब जाब. धान बिचारी भली कुटी खाई चली. अड़हा हा अपन सतुआ ला दे दिस धान वाले ला. बज गे ओखर बारा. धान वाले के होगे वारा  न्यारा. तौ भैया इही गोठ संग अक्ती के गाड़ा  गाड़ा बधाई. जम्मो नवा जोड़ी बनईया मन ला उंखर सुग्घर जिनगी के बधाई. भगवान् परशुराम ला परनाम करत ..............
जय जोहार. 
16/05/2010            

दोस्ती ल रिश्ता मा कैसे फिट करे जात रहिस?

ओतेक बड़े त नई हो गे हन. तभो ले अतका कहे के लाइक हो गे हन अपन लइका मन ला  के हमर लैकाई मा ए दइसे दइसे होवत रहिसे. पहिली संगवारी बनावे त एक दूसर बर मर मिटैया संगवारी बनावें.  अपन दोस्ती ल पुख्ता करे बर आनी बानी के तरीका  अपनावें तैसे लागथे. जैसे "मितान" "तुलसीदल" "महापरसाद" "जंवारा" "भोजली" अउ काय काय आय तेखर सुरता नई आवत हे;  नांव देवें.  अउ एक दूसर ला संबोधन बर इही सब नांव के  परयोग  करैं. एला "बदई " कथें. उदाहरण "मितान" बदे हन जी, फलाना बदे हन जी .  बड़ा पवित्र रिश्ता माने जाय जी. अईसन संगवारी के लइका मन अपन दाई ददा के मितान मितानिन  ला फूल दाई फूल ददा के नांव ले संबोधित करैं. अब्बड़ परेम रहै एक दूसर संग. अब अईसन परेम हा नंदावत जात हे. अब सब देखावा होगे हे.  अंतर्मन ले निभाये के बारी आथे त तिरियाये लाग्थें. दुरिहा भाग्थें. काय करबे सब ये जुग के परभाव ताय. ठीक हे रे भाई देश काल परिस्थिति ला ध्यान माँ रखके अपन अपन रद्दा माँ रेंगे ल परथे. वैसे मोर रिश्ते दारी मा भतीजा हवे. ओखर तीन संगवारी अईसे हें  बचपन से  चारों के  घर मा अतेक एक दूसर संग परेम हावै के कोनो पोरोगराम हो  सुख हो चाहे दुख हो, सब्बोझन मिल बाँट के निपटाथे.  अभी अभी दैनिक भास्कर के नगर संस्करण माँ छपे रहिसे ये बारे मा.  ये मन भेलाई के लक्ष्मी नगर माँ एके डिजाईन के मकान बनवाये हें, एके दिन चारों झन गृह प्रवेश कराइन. मिलजुल के पार्टी करिन. अत्केच नई ये. ए मन भिलाई इस्पात संयंत्र म नौकरी करथें शायद एके डिपार्ट्मेन्ट मा।  महू देखत हौं अब्बड दिन ले।  कहूं घूमे बर एल टी सी लेके जाहीं तभो  एक संग. एला कथें दोस्ती. ऊंचा नीचा मा एक दूसर के मदद करे बर तैयार. दोस्ती के मिसाल हे भाई.
जय जोहार.... घुघुवा कस जागत हौं अब जाथौं सुतिहौं.
तारीख: १६/०५/२०१०      

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

पहिली के सियानिन देवे "असीस"

"अतिथि देवो भव" के भावना के साथ अतिथि अउ मेजबान के बीच जउन आत्मीयता पहिली रहै ओइसन बेवहार अब तिरियावत जाथे.  कनिहा झुका के बड़े मन के पाँव छुवाई, माने बड़े मन के चरन छू के उंखर सदाचरण ला उंखर आशीर्वाद के रूप मा पावौ, अपनावौ. अपन ब्लॉग के फालोवर मन के आंकड़ा ल देखेंव त सुरता आगे के पहिली दाई बूढी दाई मन उंखर पायलगी करन त कहैं "जुग जुग जी, भगवान तोला एक के एक्कैईस करै, दूधो नहाव पूतो फलौ........... अब एक के एक्कैईस हा तो बढ़त गरीबी मा, नई रहिगे कोनो करीबी माँ" (काबर के एकल परिवार के चलन जादा होगे हे) ला ध्यान मा रखत हुए उचित नई लगे.  हाँ ब्लॉग जगत मा ब्लोगिंग के महत्त्व ला बरकरार रखत सुग्घर सुग्घर विचार के अनुसरण करैया मन के संख्या बढे ले सुकून मिलथे.  अउ कहूं थोर बहुत उठा पटक के दृश्य दिखथे एमा त ओला इही हाना (कहावत) के "चार बर्तन टकराही त आवाज होबे करही समझ के फेर सामान्य हो जाना चाही. मोर ब्लॉग के नवा अनुसरण करैया मन ला धन्यवाद साभार! अउ जम्मो झन ला मोर जय जोहार. 

गुरुवार, 11 मार्च 2010

वाह रे मोर छत्तीसगढ़ के भुइंया

 वाह रे मोर छत्तीसगढ़ के भुइंया का का नई हवे तोर गरभ मा
खनिज सम्पदा ले लेके साग भाजी के अनेको परकार;
ओमा एक परकार  के नाव हे घुइंया

रत्न गर्भा इस धरती ने वाकई क्या क्या बहुमूल्य चीजें प्रदान नहीं किया है.  खनिज पदार्थों से लेकर शाक सब्जी, अनाज आदि आदि. इसे कुदरत का करिश्मा कहें या उस परम सत्ता की रचना. मानव भी इस रत्न गर्भा वसुंधरा की गोद में खेलने, अपने विवेक व बुद्धि से नए नए आविष्कार करने, यदि दुर्बुद्धि का शिकार हुआ तो अपनी हरकतों से "भले जन मानस " द्वारा  धरती का बोझ समझा जाने वाला प्राणी है. जिसकी जैसी सोच, वैसी ही उसकी हरकतें चलती हैं भले ही वह कितना ग्यानी हो कहने को स्वयं को सरल कहता हो "अभिमान" का अंश उसमे समा ही जाता है. और जहां यह अभिमान रुपी दुर्गुण का आगमन हुआ फिर दूसरे उसके सामने तुच्छ लगने लगते हैं.   आलोचना करने लग जाते हैं, समीक्षा नहीं.  आलोचना इस वजह से नहीं कि सामने वाला अपनी गलतियों को सुधार ले वरन आलोचना का मुख्य उद्देश्य अपने से नीचा दिखाना होता है. वस्तुतः हमारे इस ब्लॉग जगत में कुछ  ऐसा ही दृश्य दिखाई पड़ता है.

                       शाक सब्जी का  जिक्र इसलिए यहाँ किया गया है कि हमारी क्षेत्रीय बोली में एक सब्जी "कोचई" जिसे अरबी, घुइंया भी कहते हैं का उल्लेख टिपण्णी के माध्यम से हुआ है. यह सब्जी  कम से कम हमारे  इस छत्तीसगढ़ प्रांत मे मठे  व भिन्डी जिसे हम यहाँ क्षेत्रीय बोली में रमकेरिया/ रमकलिया   कहते हैं. के साथ काफी चाव से खाई जाती है.  इसी तारतम्य में हमारे नानाजी के सखा याने सखा नानाजी की एक बात जरूर याद आती है कि;
यदि किसी से हो गयी हो आपकी दुश्मनी, रखें न अपनी इच्छा अधूरी
खिला दें उन्हें  भिन्डी अरबी की मठे वाली सब्जी और गरम गरम पूरी
देखें जनाब के पेट में कैसे मचती है हलचल, होता है उदार व्याधि का शिकार
क्यों?  अच्छा है न दुश्मनों से बदला लेने का अच्छा नुस्खा यार
और अंत में  हम कहना नहीं भूलेंगे:........" जय जोहार" ..........








गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

ख़तम होईस चुनाव तिहार .... जय गंग


सब सूतथें त मोर बर बिहिनिया होथे. आनी बानी के गोठ हा दुनो दिमाग माँ घुमड़ थे. हमर देश हा तिहार के देश कहाथे. जम्मो धरम के तिहार बार मानथें. वैसे हमर सनातन धर्म माँ तिहार के कमी नई आय. फेर ये सब तिहार ले ऊपर उठके भाई हो सबले बड़े तिहार "चुनाव" के होथे.  अभी झार खंड माँ चुनाव होईस. मध्यप्रदेश  माँ होईस अउ छत्तीसगढ़ माँ स्थानीय निकाय मन के चुनाव आजे ख़तम होईस. लेकिन चुनाव घोषणा होए के बाद के ओ प्रदेश के , ओ शहर के का हालत रथे ओला मोर मुंगेरीलाल के दिमाग माँ एक अलग किसम ले बरनन करे के बिचार उमडीस. मोला सुरता आथे जब मैं पहिली दूसरी माँ पढ़त रेहेंव त बिहिनिया बिहिनिया ले चन्दन चोवा लगाए बसदेव मन हाथ माँ रिंग बरोबर झुनझुना ला हलावत अउ अइसने  गावत "एही रे बेटा सरवन आय...... जय गंग घर दुआरी मा  मांगे बर आवै. सोचथौं के आज चुनाव मा खड़े जन प्रतिनिधि मन दुआरी मा खड़े हे, बसदेव  के जघा मा अउ शुरू होगे हे ....  
आवौं मैं फलाना  पार्टी के उम्मीदवार 
मिलही वोट मोहिच ला तोर 
उम्मीद ले के   
आये हौं तोर द्वार .........जय गंग 
बने जाड परत हे बेटा, कम्बल देहों 
कुकरी देहों सोम रस के भरे भण्डार .... जय गंग 
अतका कही के रेंग दिस 
दूसर दिन हमर एक बाबाजी आइस 
ओहू चालू होगे 
कखरो बात मा तै झन आबे या
गाँव के एक झन मनखे हा

दारू के चक्कर मा अपन मेहरिया के
हाथ पाँव काट के कर दिस ओ बिचारी 
के बेडा पार ........ जय गंग
का जमाना आ गे हे सोचे ला परही
कब तक चलही अइसने











रविवार, 20 दिसंबर 2009

नवा साल आये बर बांचे हे दिन दस





नवा साल आये बर बांचे हे दिन दस 
अरे, आवत  हे जौन साल ओ हर आय सन दू हजार दस
पुन्नी के चंदा हा  ओखर स्वागत बर बने  खड़े रइही
 रौशनी बिखेर के  इहाँ हमन ला इही बात कइही
नई होवे ये साल, कोनो के घर  अंधियार
नाच गा के तहूँ अपन ख़ुशी मना ले यार 
फेर थोड केच  देरी माँ चंदा ला धर लेही  गरहन 
संसो माँ डार देहि मनखे मन ला के का होही अलहन 
अलहन के कमी नई ये;
आतंकी, नक्सली रोज खेलत हे खून के होली 
का वर्दी का बिन वर्दी वाले,गंवावत हे अपन परान 
कहूँ बारूदी सुरंग माँ फंसके, कहूँ खा के बन्दुक के गोली 
कुदरत के उपहार घलो हम सहेज के नई रख पावत हन
होवत हे गरम धरती महतारी एला जघा जघा गोहरावत हन 
आवौ कर लन आजे परतिग्या
ये खून के बोहैया मन ला सोझियाबो 
हथियार फेंके बर इनला जोजियाबो 
धरती मा  फेर हरियाली लाबो, 
नवा साल के स्वागत संगी,  अइसने करबो बस 
आवत हे नवा साल तौन हा आय सन  दू हजार दस 
जम्मो संगी संगवारी ला उंखर ऊपर एको ठन अलहन झन आवै 
बने ख़ुशी ख़ुशी बीते हर साल  एही शुभकामना के साथ जय जोहार
















शनिवार, 5 दिसंबर 2009

ठल्हा बनिया हलावे कनिहा

सर्वप्रथम परमपूज्य स्वामी १०००००००००१०८ स्वामी श्री निठल्लानंद जी को मेरा शाष्टांग प्रणाम !
गुरुदेव जादा तो नहीं पर अभी वर्त्तमान में मुंबई में चल रही क्रीडा "लम्ब दंड गोल पिंड दे दनादन ले दनादन" के बारे में चंद पोस्ट करने कहा अतः आपकी आज्ञानुसार दो शब्द लिख दे रहा हूँ.  यह क्रीडा आपकी तरह आपके शिष्य जो शीर्षक में दर्शित विशेषता लिए हुए है, उसको भी बहुत पसंद है.  वास्तव में ठल्हा तो नहीं रहता पर केवल घुटने में ही काम के बारे में सोचते रहता है और दुविधा में रहते हुए साथ ही "आज करै सो काल कर काल करै सो परसों. इतनी जल्दी क्या है प्यारे जीना है अभी बरसो" वाली
कहावत चरितार्थ करते हुए इस क्रीडा के दर्शन करने में लग जाता है. अभी घुटना भी निठल्ला हो गया है. ज्यादा कुछ सूझ नहीं रहा है. प्रभु आप ही मार्ग दर्शन करें. आगे जारी रहेगा संवाद..... अभी चचेरे भाई के यहाँ विवाह कार्यक्रम में सम्मिलित होने जाना है. और हाँ कल तो दर्शन हो ही रहे हैं  ना आपके.

रविवार, 29 नवंबर 2009

बिहाव के न्यौता खाव

महराज मन  के गणित ला देखौ, 
कतेक कम मुहूरत हे ये दारी 
करे बर बर बिहाव 
देख के न्यौतन के कारड ला 
पर जाथे सोचे बर भाई हो

काखर घर भेजौं रीत 
काखर घर खुदे जाँव 

जाके देख थन बिहाव घर माँ 
बिपतियाये घराती अपन काम बूता माँ 
हाय हेलो भर  कर लेथे, 
कहूँ बन के बाराती तैं गे हस त 
नचई  कुदई पेर देथे



मिल गे मंडली त बने लागथे 
नई तो हो जाथस तय बोर 
रीत दे के भागे के मन करथे
फेर बिन खाके जाय माँ लागथे
अन्याय हो जाही घोर 
काबर के 
किसिम किसिम के जिनिस बने हे 
जेला कथें आजकल बफेलो (बफे) 
फेर काहे  चूकौ संगवारी 
झन छोडो एको आइटम ला 
एक  एक करके गफेलो 
लेकिन ध्यान रहै
पेट तुंहर आय कोटना नो है 
सम्हल सम्हल के खाव
नई समझहू त हम का करबो 
दिखही रस्ता सुभीता खोली के 
उहाँ  हउरा फेट लगाव



ये दारी = इस समय 
बर बिहाव = शादी ब्याह 
खुदे = स्वयं 
न्यौतन कारड = निमंत्रण पत्र 
काखर घर = किसके घर 
रीत = उपहार 
बिपतियाये = व्यस्त 
काम बूता = काम में 
जिनिस = चीजें, व्यंजन 
गफेलो= खाओ, पेट में ले जाओ 
कोटना= मवेशी को चारा खिलाने का पत्थर का बना टब नुमा 
              चीज

हम का करबो = हम क्या करेंगे 
सुभीता खोली = जहाँ रोज सुबह जाया जाता है 
                        बताने कि जरूरत नहीं समझता 
हउराफेट= बार बार जाने कि क्रिया 






बुधवार, 25 नवंबर 2009

रेल गाड़ी के जनरल डब्बा

भाग - २
मैं सबले पहिली मोर ब्लॉग के अउ बिन ब्लॉग के घलो जम्मो संगवारी मन ला जयरामजी की कहत हौं.  भाग्ग-२ के संपादन बर अब्बड अगोरवायेवं तेखर खातिर माफ़ी चाहत हौं.  तौ टेशन ले पहुचेवं सम्मलेन के जघा माँ. सम्मलेन हा युवक युवती परिचय सम्मलेन रहिसे.  अइसन सम्मलेन माँ अपन अपन जोड़ा जोड़ी खोजे माँ सहूलियत रथे.  अरे बिहाव नई करैं त का होगे दाई ददा मन ला पता तो चल जाथे के काखर  टूरी अउ काखर टूरा बिहाव के लाइक हो गे हे.   देखत हौं लाव लश्कर के संग  अइसन गाड़ी(चमचमावत  कार) ले जेखर  मुड़ी माँ लाल लाईट लगे हे ओमा ले बढ़िया  जग जग ले उज्जर सफेद कपडा (पजामा अउ आधा बाँही के कुरता) पहिने एक झन  मनखे उतरिस. ओखर संग माँ लंगुरवा घलो रहिसे. अब बताये के जरूरत नई ये. तभो ले बता देथवं.  ओ मनखे रहिसे बेलासपुर के रहैया अउ आज जउन  अपन राज के खजाना मंत्री हे भाई अमर अग्रवाल. संग माँ ओखर बेलासपुर शहर के देख रेख करैया वैसे ओला शहर के प्रथम नागरिक माने जाथे महापौर जी भी रहिन अउ फेर मंत्री महोदय के चेला चपाटी. अब सम्मलेन के स्वागत दुआरी ले ओला परघावत हमर समाज के नगर अध्यक्ष अउ बड़े बड़े कार्यकर्ता मन मंच तक लेजिन.  ये दारी बने बेवस्था करे रहिन हमर समाज के करता धरता  मन. ओतकेच जुअर महू दुआरी माँ पहुँच गेवं. ऐसे लागिस महू तर गेंव. मोरो ऊपर फूल गिरिस तिलक घलो  लगाइन दुआरी माँ खड़े नोनी मन.  मंत्री जी  मेरन समय के कमी रहिसे.  कइसनो  कर के मंच माँ बैठारे गइस. हमर समाज के राष्ट्रीय स्तर के अउ प्रदेश स्तर के बड़े बड़े पदाधिकारी मन घलो मंच माँ मंत्री मन के संग माँ बइठिन.  मैं अपन एक जघा माँ कोंटिया गे रेहेंव. अब शुरू होईस मंच माँ बैठे मंत्रीजी समेत  जम्मो झन ला पुष्पहार से स्वागत करेके पारी. झन पूछौ भैया हो. मंत्री के स्वागत करैया कोरी खैरखा के  मात्रा माँ जी. करीब पौन घंटा ओही माँ बीत गे. फेर समाज के करता धरता के स्वागत करे माँ अलग. हड़बड़ी माँ अपन गोत्र ऋषि  कश्यप जी के पूजा ला घलो भुला गे रहिन. सुरता आये के बाद ओखर फोटो माँ दिया ला जलाइन.  कोनो समाज होए अपन समाज के एक ठन बने भवन के बेवस्था करथे. ओखर बर एडी चोटी एक करे ला परथे. एक तो अतेक दानवीर नई रहैं जउन  अकेल्लेच बनवा दै. फेर आज के तारीख माँ जमीन खोजे नई मिलत  हे. अउ मिलतो हे त भाव आगी लगे बरोबर हे. तौ अइसने बेरा माँ थोकिन कंत्री बन के नजूल उजूल के भुइंया मिल जाय कहिके मंत्री जी के सुरता करथन. वैसे तो जाने बात ए के कंत्री कोन आय. अतके माँ काम नई चलै.  बने भीड़ जोरे ल परथे त मंत्री जी पतियाथे के हाँ भविष्य माँ मोर बोट (वोट) के एक बहुत बड़े हिस्सा इंखर मेरन हवै.
तौ सबो झन (महिला सभा अउ तरुण सभा दुनो के बड़े बड़े पदाधिकारी मन ) अपन अपन गोठ बात रखिन. फेर मंत्री जी भी हां शुभ कामना के अपन दू शब्द कहिके ये परिचय सम्मलेन के महत्व  बताइन अउ भरोसा दइन के हमर समाज के भवन जउन अभी भूतल भर माँ बने हे ओला दुमंजला बनाये बर सहयोग मिलही सरकार ले.
मंत्री जी के बिदा होए के बाद समाज के सब बिहाव के लाइक नोनी बाबु के परिचय के सिलसिला शुरू होईस. संगे संग उनखर पंजीयन घलो. चाय नास्ता भोजन सबो के बेवस्था रहिसे. अरे हाँ एक ठन जउन बने बात अउ होईस ओ आये हमर समाज के हिंदी साहित्य के नामी शख्सियत स्वर्गीय प्यारेलाल जी गुप्त (जन्म १७ अगस्त १८९१ अउ निर्वाण १४ मार्च १९७६)  जेखर द्वारा  किताब लिखे गे हे; "प्राचीन छत्तीसगढ़(इतिहास ग्रन्थ) सुखी कुटुंब (उपन्यास) सरस्वती (मराठी से अनुदित) लबंगलता (उपन्यास) फ्रांस की राजक्रान्ति का इतिहास, ग्रीस का इतिहास, बिलासपुर वैभव (हिंदी गजेटियर) पुष्पहार (कहानी संग्रह) एक दिन (नाटक)" के स्मरण माँ जारी त्रैमासिक पत्रिका "पाठ"  के विमोचन माननीय मंत्री जी द्वारा करे गइस.  मैं खुद नई जानत रहेंव. ओ दिन जानेंव. बने लागिस. महू करीब सांझ के साढ़े पांच छै बजे तक रहेंव फेर अपन भेलाई बर ओही रेलगाड़ी माँ (आये के बेरा पसिंजर) माँ आयेवं अउ करीब ११ बजे रात के घर पहुचेंव.  लिखे बर तो अब्बड अकन ले चीज हे जी फेर जादा माँ आदमी बोरिया जाथे कहिके इहें समापन करत हौं. 
जय जोहार.     






मंगलवार, 17 नवंबर 2009

रेल गाड़ी के जनरल डब्बा

                                                             भाग - १
१४ तारीख के लिखी दे  रहेवं के मोला १५ के अपन बनिया समाज के प्रादेशिक सम्मलेन माँ जाए बर हे.  तौ एखरे बर १५ तारीख के बिहनिया बिहनिया करीब ६.४५ बजे  मैं बिलासपुर जाए बर घर ले निकलेवं. दक्षिण बिहार एक्सप्रेस हा तकरीबन ७.०५ के दुरुग ले छूट थे. अपन डुगडुगी (हीरो पुक ई जेड) माँ स्टेशन तक गेंव. गाड़ी ल स्टैंड माँ  रखेंव. एक्दमेच गाडी छूटे के टाइम हो गे रहिसे. गनीमत हे चार पांच ठन टिकट काउंटर खुल गे हवै. एक टिकट काउंटर माँ कम भीड़ भाड़ रहिसे  उंहचे टिकट लेंव अउ दउड़त  दउड़त पलेट फारम नंबर ४ माँ पहुचेंव.  गाड़ी खड़े रहय.  एकेच ठन ताराचंद (टी. सी.,टिकट चेक करैया) खड़े रहय. अउ ओखर मेर स्लीपर क्लास के टिकट बर एक्स्ट्रा पैसा देके टिकट लेवैया के भरमार. का पूछे बर हे . टी. सी. के चेहरा पसीना से तरबतर रहय. महू बिलासपुर बर स्लीपर के टिकट मागेवं त  कहिदिस लोकल टी. टी. आही त बनही. गाड़ी छूटे के टेम हो गे रहिसे गार्ड अपन भिसिल ला बजा दे रहिसे. अब  एक्सप्रेस गाड़ी माँ जेमा जनरल डब्बा गिने चुने रथे, बिना रिजर्वेशन जनरल बोगी माँ यात्रा करना  माने धक्का मुक्की ले हलकान होत जाव. सबो किसम के हलकानी, बैठे के जगा नहीं, चोरी अउ पॉकेट मारी के डर.....अउ कई किसम के खतरा जी. एखरे पाय के मैं रिजर्वेशन बोगी माँ इन्तिजाम करके जाथौं. पर का करौं  ओ दिन ताराचंद  घलो ला सुने के फुर्सत नहीं. गेंव पीछू के आधा ठन  बोगी माँ. असल माँ वो बोगी हा जनाना बोगी रहय फेर इहाँ कहाँ के नियम अउ कानून.  औरत मरद सबो घुसरे हें. झन पूछ ले दे के  महू घुसरेंव.  रेंगिस गाड़ी हा. गाड़ी के रेंगे ले जैसे गहुँ पिसवाय ला जाबे त आटा हा जब डब्बा माँ भराथे त डब्बा ला   हलाये के बाद ही  आटा एडजस्ट होथे. ओइसने गाड़ी के रेंगे ले हमन एडजस्ट होएन.  मैं सिंगल सीट वाले भाई ल अपन आधा डबलरोटी रखे बर निवेदन करके टिक गे रेहेंव.  अब पहुंचिस गाड़ी पावर हॉउस स्टेशन. का पूछे बर हे. एक तो आधा बोगी के डब्बा, पहिली च ले खच खच ले भरे रहय तभो ले सवारी घुसरते जाथे बेसुध होके. हमन सब जानथन के अइसन बेरा ल ताकत रथें अपन रोजी रोटी बर निकले बिचारा पाकिट मरैया  मन. तभो ले गाड़ी झन छूटे  कहिके लकर धकर चढ़ते जाथन. गाड़ी हा छूटे लागिस त ओ दिन तीन झन के बाट लग गे. एक झन के पर्स माँ पांच हजार रूपया अउ ए टी एम्  रहय बाकी दू झन के शायद चालीस पचास रुपिया भर. इंखर मन के २-३ के  ग्रुप रथे. एक झन ला देख डारिन. पीटीन घलो. फेर चोरी होए  समान हा तो पार्सल हो गे रहिसे दूसर ला, कहाँ ले मिलै. आखिर जेखर चोरी होए रहिसे ओ बिचारा हा भिलाई -३ माँ जी आर पी थाना माँ  रपट लिखवाए बर उतर गे.  अब इहाँ गाड़ी माँ खड़े पसेंजर मन बेंच माँ बैठे लोगन ले आघू के स्टेशन माँ जगा मिलही कहिके दीन हीन बरोबर देखत हे. पूछत घलो हे कहाँ उतरहू कहिके. जम्मो झन ले ओ मन ला "टा टा" मिलिस. ओ मन टाटानगर जवैया रहैं. एती डब्बा भीतर किसम किसम के बात. कहत हें,  "पुलिस ल बताये ले का फरक पड़ही, फिफ्टी फिफ्टी के सौदा रथे जी". "चोर चोर मौसेरे भाई"........ बाकी पाकिट मरैया मन एमा झूठ नई बोलय पुलिस मेरन ईमानदारी से बक देथें ...... किसिम किसिम के गोठ. महू गोठ बात के आनंद लेत पहुंचेवं बिलासपुर करीब १०.०० बजे. १०.१५ के सम्मलेन आयोजन स्थल माँ पहुँच गेंव. अब सम्मलेन के बात भाग-२ माँ लिखिहौं.
जय जोहार.  

रविवार, 15 नवंबर 2009

एक ठन जबरदस्त बीमारी

कोंजनी का बीमारी हा मोला जकड ले हे के छोडे के नाव नई लेथे। अपने च अपन माँ भुन्भुनावत रथौं। काहीं लेख ला पढ़हूँ चाहे किताब ला पढ़हूँ त बूजा हा सुरता माँ नई रहय। भुला जाथौं। कोनो भी विषय ला पढ़े के बाद ओखर बर तुरते विचार उपजथे। ओतके जुअर लिख ले त ठीक हे नई त आघू पाठ पीछू सपाट। कुल मिला के एला कथें भुलाए के बीमारी। अब का बतावं डागदर (अभी भी गवई माँ एही उच्चारन करथें उहाँ के मन, देखौ भाई डॉग डर याने कुकुर डेरा गे झन समझ लहू ) मेरन अपन इलाज बर गेवं। देख ताक के पूछिस कब ले हे ये बीमारी तोला। अब का बताओं ओतका जुवर सर्किट फ्यूज होगे दिमाग के उल्टा महि पूछे लगेवं डागडर ला "कउन बीमारी डागदर साहब। डागदर घलो भौंचक रहिगे। अब काय करबे ला इलाज होगे हे जी। अब बिहनिया ले जाय बर हे बेलासपुर। हमर समाज के राज्य स्तरीय सम्मलेन हावे। उठ पाहू के नही कहिके डेरावत हौं। अलारम हे न मोबाइल माँ। ओखरे आसरा माँ एला पोस्ट करे बर जागत हौं। अब जाथौं सोहौं। जम्मो झन ला सुग्घर रात अउ जय जोहार।

शनिवार, 14 नवंबर 2009

नवा बैला के नवा सिंग चल रे बैला टींगे टिंग

मैं हा बने देवारी के दिन ये बलाग लिखे ला शुरू करे रेहेवं। ललित भाई अउ शरद भाई के आशीर्वाद अउ प्रेरणा मिले के बाद एकदम जोशिया गे रहेवं। तहां ले बस हर दिन बलाग लेखे के मन करै। ओइसने ताय ...."नवा बैला के नवा सिंग चल रे बैला टींगे टिंग"। अब सोचे बर परथे थोकिन। तौ गति हा धीरे हो गे हे लिखे के। करीब २-३ दिन ले सुभीता खोली माँ तो नही पर अइसने बइठे बइठे गुनत रहेवं। भीतरे भीतर गुंगुआवत रहिस मोर सोच हा के ये बलाग लिखे माँ का नफा हे अउ का नकसान। छत्तीसगढ़ी माँ तो नई सोच सकेवं। हिन्दी माँ सही लिखत हौं। बलाग के जोड़ तोड़ ला पहिली कर डरे हवं। (बला + आग)। कोनो गुसियाहू झन। हाँ आलोचना समालोचना कर सकत हौ ;
जब से आया है यह डब्बा (कंप्यूटर) नई नई चीजों के साथ ब्लॉग लेखन का अच्छा दौर चला है। कवि साहित्यकार लेखक चिंतन करने वालों के लिए :- ब्लॉग लेखन एक कला है उन गृहिणियों के लिए जो अपने "उनको" पाते हैं इसमे व्यस्त सदा, उनके लिए बला है नव सीखिए, रखते हैं कुछ इसी तरह कर गुजरने की तमन्ना उनके ब्लॉग लेखन के लिए यह भला है और यदि इसे कोई तुलनात्मक दृष्टि से देखता हो और यदि कुछ हद नव सीखिए की भावना प्रकट हो रही हो उसकी चंद लकीरों से, प्रशंसनीय है हो रहा हो इसमे अग्रसर तो माहिर लोगों से कहूँगा आपका दिल क्यों जला है, उस नव सीखिए का लिखना आपको क्यों खला है।
चाहिए इन्हे आपका आशीर्वाद व अच्छे अच्छे सुझाव नव सिखियों को उनके मुकाम तक पहुचाव