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मंगलवार, 17 नवंबर 2009

रेल गाड़ी के जनरल डब्बा

                                                             भाग - १
१४ तारीख के लिखी दे  रहेवं के मोला १५ के अपन बनिया समाज के प्रादेशिक सम्मलेन माँ जाए बर हे.  तौ एखरे बर १५ तारीख के बिहनिया बिहनिया करीब ६.४५ बजे  मैं बिलासपुर जाए बर घर ले निकलेवं. दक्षिण बिहार एक्सप्रेस हा तकरीबन ७.०५ के दुरुग ले छूट थे. अपन डुगडुगी (हीरो पुक ई जेड) माँ स्टेशन तक गेंव. गाड़ी ल स्टैंड माँ  रखेंव. एक्दमेच गाडी छूटे के टाइम हो गे रहिसे. गनीमत हे चार पांच ठन टिकट काउंटर खुल गे हवै. एक टिकट काउंटर माँ कम भीड़ भाड़ रहिसे  उंहचे टिकट लेंव अउ दउड़त  दउड़त पलेट फारम नंबर ४ माँ पहुचेंव.  गाड़ी खड़े रहय.  एकेच ठन ताराचंद (टी. सी.,टिकट चेक करैया) खड़े रहय. अउ ओखर मेर स्लीपर क्लास के टिकट बर एक्स्ट्रा पैसा देके टिकट लेवैया के भरमार. का पूछे बर हे . टी. सी. के चेहरा पसीना से तरबतर रहय. महू बिलासपुर बर स्लीपर के टिकट मागेवं त  कहिदिस लोकल टी. टी. आही त बनही. गाड़ी छूटे के टेम हो गे रहिसे गार्ड अपन भिसिल ला बजा दे रहिसे. अब  एक्सप्रेस गाड़ी माँ जेमा जनरल डब्बा गिने चुने रथे, बिना रिजर्वेशन जनरल बोगी माँ यात्रा करना  माने धक्का मुक्की ले हलकान होत जाव. सबो किसम के हलकानी, बैठे के जगा नहीं, चोरी अउ पॉकेट मारी के डर.....अउ कई किसम के खतरा जी. एखरे पाय के मैं रिजर्वेशन बोगी माँ इन्तिजाम करके जाथौं. पर का करौं  ओ दिन ताराचंद  घलो ला सुने के फुर्सत नहीं. गेंव पीछू के आधा ठन  बोगी माँ. असल माँ वो बोगी हा जनाना बोगी रहय फेर इहाँ कहाँ के नियम अउ कानून.  औरत मरद सबो घुसरे हें. झन पूछ ले दे के  महू घुसरेंव.  रेंगिस गाड़ी हा. गाड़ी के रेंगे ले जैसे गहुँ पिसवाय ला जाबे त आटा हा जब डब्बा माँ भराथे त डब्बा ला   हलाये के बाद ही  आटा एडजस्ट होथे. ओइसने गाड़ी के रेंगे ले हमन एडजस्ट होएन.  मैं सिंगल सीट वाले भाई ल अपन आधा डबलरोटी रखे बर निवेदन करके टिक गे रेहेंव.  अब पहुंचिस गाड़ी पावर हॉउस स्टेशन. का पूछे बर हे. एक तो आधा बोगी के डब्बा, पहिली च ले खच खच ले भरे रहय तभो ले सवारी घुसरते जाथे बेसुध होके. हमन सब जानथन के अइसन बेरा ल ताकत रथें अपन रोजी रोटी बर निकले बिचारा पाकिट मरैया  मन. तभो ले गाड़ी झन छूटे  कहिके लकर धकर चढ़ते जाथन. गाड़ी हा छूटे लागिस त ओ दिन तीन झन के बाट लग गे. एक झन के पर्स माँ पांच हजार रूपया अउ ए टी एम्  रहय बाकी दू झन के शायद चालीस पचास रुपिया भर. इंखर मन के २-३ के  ग्रुप रथे. एक झन ला देख डारिन. पीटीन घलो. फेर चोरी होए  समान हा तो पार्सल हो गे रहिसे दूसर ला, कहाँ ले मिलै. आखिर जेखर चोरी होए रहिसे ओ बिचारा हा भिलाई -३ माँ जी आर पी थाना माँ  रपट लिखवाए बर उतर गे.  अब इहाँ गाड़ी माँ खड़े पसेंजर मन बेंच माँ बैठे लोगन ले आघू के स्टेशन माँ जगा मिलही कहिके दीन हीन बरोबर देखत हे. पूछत घलो हे कहाँ उतरहू कहिके. जम्मो झन ले ओ मन ला "टा टा" मिलिस. ओ मन टाटानगर जवैया रहैं. एती डब्बा भीतर किसम किसम के बात. कहत हें,  "पुलिस ल बताये ले का फरक पड़ही, फिफ्टी फिफ्टी के सौदा रथे जी". "चोर चोर मौसेरे भाई"........ बाकी पाकिट मरैया मन एमा झूठ नई बोलय पुलिस मेरन ईमानदारी से बक देथें ...... किसिम किसिम के गोठ. महू गोठ बात के आनंद लेत पहुंचेवं बिलासपुर करीब १०.०० बजे. १०.१५ के सम्मलेन आयोजन स्थल माँ पहुँच गेंव. अब सम्मलेन के बात भाग-२ माँ लिखिहौं.
जय जोहार.  

4 टिप्‍पणियां:

wcwk (When Celebrities Were Kids) ने कहा…

nice post...

wcwk Team
http://wcwk.blogspot.com/

शरद कोकास ने कहा…

भाई मोला त हासी आवत हे और रुके के कोनो उपाय होही त बताबे ..
आधी डबलरोटी रखे बर जगा..हाहाहाहाहाहाहाहाहाहहा

ललित शर्मा ने कहा…

आघु के कथा के इंतजार हवय

शरद कोकास ने कहा…

एक ठन रेलागाड़ी के कविता मै घलौ लिखे हौं "शरद कोकास " पे देखलेबे ।