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सोमवार, 24 मई 2010

गरमी का मौसम, तप रही है धरती

(१) 
बुझाने अपने पेट की आग 
कमाने के चक्कर में 
करती जनता भागम भाग 
       (२)
गरमी का मौसम, तप रही है धरती 
दिमाग ठिकाने रहता नहीं, 
क्या अच्छा है क्या बुरा है
जनता जरा भी परवाह नहीं करती 
(३)
आदत नहीं सुधरती अपनी, बह रहा है नल से  पानी बहने दें
क्यों करे स्विच ऑफ, कमरे की लाईट बुझी हो या जली
पानी की किल्लत  होती है, गुल रहती है बिजली, 
रात में नींद हराम, दिन में होवे नहीं काम, 
कैसी  मच जाती है खलबली.
(४)
सुबह सुबह कालोनी के एक घर  में सुलग रही थी आग 
कागज़ जलने की महक ने हमारी नींद को कहा तू भाग 
उठ गए,  देखे बाहर,  आखिर क्या हो रहा है 
पता चला घर के  सामने वाले ब्लाक के ऊपर के  क्वाटर में 
उड़ रहा है धुआं, अन्दर रखे कागजातों का अंतिम संस्कार हो रहा है.
(जैसा कि पता चला उस क्वाटर में कोई रहते नहीं थे) 
फैले न यह  आग और कहीं, सोच दमकल तुरत बुलाये 
घंटे भर की एक्सरसाइज से आखिर आग पे काबू पाए.
(आग लगने का सही सही कारण हमें ज्ञात नहीं हो पाया है.)
 (५)
क्या करें इस भीषण गर्मी में सब का चढ़ा रहता है पारा 
धीरज धर, जरा  सोच समझ कर, करें काम  का निपटारा 
जय जोहार ................

4 टिप्‍पणियां:

'उदय' ने कहा…

... तेज गर्मी .. गर्मा-गरम मौसम ... जीना मुश्किल हो गया है ... एक प्रसंशनीय रचना !!!

दिलीप ने कहा…

paanchon hi rachnaayein bahut khoob..garmi ne behaal kar rakha hai

राजकुमार सोनी ने कहा…

शायद मैं गर्मी से उतना परेशान नहीं होता हूं। गर्मी का मौसम मेरी आजादी का मौसम होता है क्योंकि बचपन में छुटिटयों के लिए मैं इस मौसम का बेसब्री से इन्तजार किया करता था। यह मौसम मुझसे मेरा बचपन लौटा देता है।
मै ठीक-ठाक जी रहा हूं।

nilesh mathur ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचनाएँ हैं!