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शुक्रवार, 14 मई 2010

"जरा सा"

                            दो छोटे छोटे शब्द; " जरा सा".   इनका प्रयोग कितना प्रभावशाली. चेतावनी के लिए अति उपयुक्त.  आजकल आप किसी दुकान में या कार्यालय में नीति वचन के रूप में लिख़ा देख सकते हैं. कुछ उदाहरण नीचे है;
जरा सा रूप क्या मिला - दर्पण ही तोड़ डाला 
जरा सा ज्ञान क्या मिला - सबसे बड़ा ज्ञानी समझ बैठे ........ आदि आदि .  ये सब बातें पढ़ते समय ही अच्छी लगती हैं थोड़ी देर के लिए "दर्शन" में समा जाते हैं.  बाद में फिर वही पुराने ढर्रे पर चलना शुरू. ईश्वर ने सभी को बुद्धि प्रदान किया है. फर्क इतना है कि (अनुभव के आधार पर) किसी को कम किसी को ज्यादा और तदनुसार  अपनी बुद्धि अपना विवेक का इस्तेमाल सभी करते हैं. मुझे इस "जरा सा" का प्रयोग "सम्मान" के साथ किया जाना बहुत अच्छा लगा. जरा सा सम्मान क्या मिल जाता है हम गदगद हो जाते हैं. किन्तु मुझे बार बार गीत की यह पंक्ति "गदगद" होने से पहले जरूर याद आती है; "किया अभिमान तो फिर मान नहीं पायेगा, होगा प्यारे वही जो श्रीराम जी को भायेगा". तात्पर्य यदि सम्मान मिल भी गया है तो भैया हवा में न उड़ें, पैर जमीन पर ही रहे. सम्मान या पुरष्कार न पाने वाले शख्स तुच्छ न समझ लिए जाँय. बड़े से बड़े कार्य संपादित किये व्यक्ति यह नहीं कहते  कि  "मैंने यह कार्य किया है"  इसके दो उदाहरण हमें रामचरित मानस में देखने को मिलता है. भगवान् परशुराम जी राजा जनक के दरबार में क्रोधित अवस्था में शिव धनुष तोड़ने वाले का नाम पूछ रहे हैं.  श्री राम जी से उत्तर मिलता है "नाथ संभु धनु भंजनि हारा. होइहैं कोऊ एक दास तुम्हारा".   मैंने तोडा नहीं कह रहे हैं. "होगा कोई आपका दास" यह उत्तर दे रहे हैं.  इसी प्रकार श्रीराम चन्द्र जी हनुमान जी से पूछते हैं कि  लंका में उन्होंने माता सीता का पता कैसे लगा लिया. अनेक निशाचरों से लड़ कैसे लिए? रावण कि नगरी  लंका को जला कैसे दिया गया? अशोक वाटिका कैसे उजाड़ी गई? हनुमान जी सहज भाव से उत्तर देते हैं  "नाथ न कछु मोरी प्रभुताई.  सो सब तव प्रताप रघुराई" ... मैंने कुछ नहीं किया वह सब आपका ही प्रताप है प्रभु...... 
                             "जरा सा" का अच्छे व बुरे दोनों के लिए प्रयोग:-  जरा से के लिए ट्रेन छूट  गयी. दूसरी ओर - जरा सी देर हुई होती तो ट्रेन मिलती ही नहीं. बैठे हैं गपियाते घंटों. इधर घर में कुछ काम बोला गया है हुआ नहीं और घर घुसते ही शब्द बाणों  से छलनी शुरू. फिर क्या जोश में शुरू हो गए जनाब "जरा सा किसी से बात क्या करने लगा...तुमने तो  खामखाँ पूरा घर सर पे उठा लिया"........ दूसरी ओर जरा  याने व्याधि. शायद वृद्धावस्था को भी "जरा" ही कहते हैं.  
                               अरे अरे हम भी कहाँ कहाँ "ज्ञान" बघारने लगे. भूल गए यहाँ तो ज्ञान के मामले में दत्त/ प्रदत्त बड़े बड़े ग्यानी लोग हैं भाई.......  
जय जोहार............दिनांक १४/०५/2010    

4 टिप्‍पणियां:

ललित शर्मा ने कहा…

जय हो ग्यानी बबा के

तैहां मौज लेवत रह
बाकी अपन सतौरी धराए

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

एक तीर छोड़ा है और कईयों को बेधा है. मेरा प्रयास रहेगा कि इस थोड़े से के दंभ को दूर कर सकूं.
शब्‍दों में छुपे संदेश के लिए धन्‍यवाद भाई साहब.

'उदय' ने कहा…

...बहुत खूब... अदभुत !!!

मनोज कुमार ने कहा…

उत्तम।