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शनिवार, 29 मई 2010

पूछ रहा है मन अपने आप से कुछ सवाल:

१.     क्या मैं (याने जनता) भारत का नागरिक हूँ.
२.     मुझे क्या सचमुच अपने वतन से अपने माँ बाप जितना प्यार है?
३.    क्या मुझे राष्ट्र को समर्पित या गाँव शहर में जनता के पैसे से (कर के माध्यम से वसूले गए) बने चाहे वह  शौचालय  हो, जल संग्रहण के लिए बनी टंकी हो, बस स्थानक में, रेलवे स्टेशन, या कहें सार्वजनिक स्थल में बने तमाम सुविधा की चीजें हों अथवा अच्छे स्मारक हों, अथवा कहें उपयोगी चीजें हों, उसकी हिफाजत भले न कर पाऊं, उन चीजों को बर्बाद करने की तो नहीं सोचता हूँ या कर ही देता हूँ? 
 ४.    मैं जन प्रतिनिधि चुन कर गाँव की पंचायत से लेकर संसद तक भेजता हूँ पर क्या मैं कभी उनके द्वारा कराये  जा रहे कार्यों की समीक्षा कर व्यक्तिगत भले न हों सामूहिक रूप में कमी बेसी के बारे में उन प्रतिनिधियों को  अवगत कराता हूँ?
५.      यदि मुझे किसी कार्यालय में अपना निजी काम करवाना है, और वहां कतार में खड़े होने की जरूरत पड़ती है, तो क्या मुझे यह नहीं लगता कि मेरा काम जल्दी हो चाहे बड़े अफसर कि पहुँच से हो या प्रलोभन देकर? क्या मुझे यह नही लगता कि मैं ऊंचे ओहदे वाला हूँ मेरा काम तो अफसर अपनी कुर्सी पर बिठाकर कैसे  नहीं करेगा? कैसे ठेस पहुँचती है, यदि काउंटर में कोई मना कर दे, मन कहता है दो टके  की तनख्वाह पाने  वाला अदना सा कर्मचारी, मुझे कतार में खड़े होने को कह रहा है. 
६.      मेरे जेहन में कई ऐसे प्रश्न उठ रहे हैं.  संक्षिप्त में राष्ट्र हित में एक आम जनता होने के नाते मैं अपनी जिम्मेदारियां किस कदर निभा रहा हूँ?  हर गली में, घर में भजन करते मिल जाते हैं सरकार भ्रष्ट है, अत्याचार हो रहा है, आदि आदि, पर क्या यह  सोचा गया है कि उस स्थान पर बैठा व्यक्ति कहाँ से गया है. हम और आप से ही ना. फलां मंत्री बन गया, क्या  पूछना है, जश्न और फटाके... क्यों भाई ? हमें अपने अपने ओहदे के अनुसार कुछ शक्तियां मिल जाती हैं जिसे  अधिकार कहते हैं.  और अधिकार मिला नहीं कि कर्त्तव्य गया चूल्हे में. यह कोई व्यक्ति विशेष के लिए नहीं  है, सामान्य सी बात है...... गैर शासकीय संस्था बनाई जा रही है कि वह सरकार के कार्यों की निगरानी  रखे या सार्वजनिक हित के काम कराएं, प्रस्तावना भेजें. शायद इसके लिए भी राशि शासन से  स्वीकृत होती  है. अब गैर शासकीय संस्था इस पर कितनी खरी उतरी  है अलग बात है.  बस मन में ही केवल यह बात उठती है, एक प्रतिशत हम अपनी जिम्मेदारी नहीं समझ रहे हैं. संक्षिप्त में हम स्वतः सोंचें हम क्या कर रहे हैं, हमारा क्या योगदान है,  क्या हो सकता है? फिर न केवल ऊँगली उठायें उतर जायं मैदान में और सुधारात्मक कदम उठायें.  अकेले चना भांड नहीं फोड़ सकता. अतः संगठित होकर,  निःस्वार्थ, अवगुणों को दूर भगाने में जुट जायं. नहीं तो फिर "कोऊ नृप होय हमै का हानी" का सिद्धांत तो चल ही रहा है.  
जय जोहार...........

5 टिप्‍पणियां:

दिलीप ने कहा…

suryakant ji aksar yahi sawaal mere dimaag me bhi aate hain ki main kya de raha hun samaaj aur rashtra ko karm ke dvara....par ab main aksar prayas karta hun...jyada se jyada sach bolun...aur achcha kaam karun...

पलक ने कहा…

मेरे नए ब्‍लोग पर मेरी नई कविता शरीर के उभार पर तेरी आंख http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/05/blog-post_30.html और पोस्‍ट पर दीजिए सर, अपनी प्रतिक्रिया।

'उदय' ने कहा…

...जोहार ... जोहार ...!!!

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सही!

जय जोहार!

पापा जी ने कहा…

पुत्र
तू कुछ न कुछ कर के ही दम लेगा
बचपन से ही जुझारु स्वभाव है, लेकिन बीच बीच मे तू कौन सी भाषा मे लिखने बैठ जाता है
जुझारुपन को पहचान
पापा जी