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शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011
रविवार, 20 दिसंबर 2009
यात्री की यात्रा अभी जारी है..
सभी को मेरा पुनः नमस्कार !!
वास्तव में अभी कुछ दिनों से मेरी दैनिक यात्रा रेल से सुचारु रूप से नहीं हो पा रही है. वजह कभी कभी बॉस की कार से जाना हो जाता है. अब बॉस के साथ कार से जाने में भी नित नयी चीजें देखने को, अनुभव करने को मिलती हैं. पहली बात तो यदि आप अकेले अपने वहन से जा रहे हों तो भी मन कुछ न कुछ सोचते रहता है यद्यपि आपका सारा ध्यान रास्ते में अपने वाहन चालन पर रहता है पर मन तो है, इसकी गति की तुलना हवा से की गयी है, स्थिर थोड़े ही रहने वाला है. हम और बॉस जब जा रहे होते हैं तो काफी देर तक चुप रहते हैं तो शायद उन्हें कुछ अच्छा नहीं लगता. कार वही ड्राइव कर रहे होते हैं. वही कुछ टॉपिक निकालकर बात शुरू करते हैं फिर बीच बीच में हम भी उनकी बातों पर अपनी हाँ की मुहर लगा देते हैं या अपनी भी छोटी सी आप बीती सुना देते हैं. मुझे यात्रा के दौरान जो बात पिंच हुई वह यह कि हम जब कभी वाहन चलन करते हैं तो कैसे भी चलायें, हम अपने आप को एक अच्छा ड्राईवर मानते हैं. चाहे हम किसी भी प्रकार से ओवर टेक कर लें जायज है. पर यदि कोई दूसरा वही चीज करने लगता है तो मुह से सीधे गाली निकल जाती है. वास्तव में हुआ ये था कि शिवनाथ नदी कि छोटी पुलिया में दोनों तरफ से गाड़ियाँ (दुर्ग जानेवाली और राजनंदगांव जाने वाली) पुलिया में घुस आयी थीं. एक तरफ की गाड़ियों को पीछे करना पड़ा था लेकिन दुपहिया वाले कैसे भी घुस कर निकल जा रहे थे इससे हमारी गाड़ी को निकलने में लेट हो रहा था. बॉस को जल्दी जाना था इसलिए उनके मुह से उन दुपहिया वाहन वालों के लिए कुछ विशेषण युक्त शब्द निकलने लगे. मैंने मन ही मन सोचा हम भी जब मोटर साइकिल चलाते रहते हैं तब उस परिस्थिति में शोर्ट कट ही सोचते हैं और निकलने का प्रयास करते हैं तो उस समय भी हमारे लिए भी लोग यही सोचते होंगे. होता है अपने को अच्छा लगे वह सब जायज है. और आजकल सभी व्यस्त हैं चाहे काम से हो या " बीजी विदाउट वर्क" हैं. सबको कुल मिलाकर जल्दी है भाई... अब जादा नहीं लिख पाऊंगा मुझे भी जल्दी है ............
सोमवार, 14 दिसंबर 2009
दूर (जहाँ से अप डाउन किया जा सके ), पदस्थ नौकरी पेशा लोगों की दैनिक यात्रा
नमस्कार जी!
मैं भाई सोचा कोई मेरी सुनेगा कुछ ट्यूशन पढ़ा देगा. ब्लॉग सजाने के लिए. और क्या क्या तकनीकियाँ हैं जिसे प्रयोग करके तरह तरह के ब्लॉग बनाए जाते हैं यह बताने के लिए. ऐसा सोच एक फिर ब्लॉग खोल लिया केवल यात्रा की यादें पोस्ट करने के लिए. .... ठीक है इसी में चलने देता हूँ... आज वह दिन याद आ रहा है जब हम भिलाई से कुम्हारी उसी वाल्टियर ट्रेन से जा रहे थे. पॉवर हाउस से ही १५ मिनट लेट निकली थी. अब चरोदा स्टेशन के एच केबिन में खड़ी हो गयी. काफी देर तक हिलने डुलने का नाम नहीं. उस दिन हमको रेलवे के कुछ सांकेतिक शब्द के बारे में पता चला. बात दरअसल ये हुई की हम यात्रीगण अब आपे से बाहर होने लगे थे. पहुँच गए केबिन के अन्दर. वहां बैठे एक महाशय से पूछने पर सही स्थिति बताने के बजाय शायद "नियंत्रक" से संपर्क में लगे थे या कोई और केबिन में संपर्क कर रहे थे. कह रहे थे "अलहाबाद " कभी "कलकत्ता" कभी "बॉम्बे". हममे से एक से रहा नहीं गया. वे बोलने लगे बात तो अलहाबाद, कलकत्ता, बॉम्बे की हो रही है और इनका काम देखो तो रायपुर के मौदहापारा से गया बीता है. हुआ ये था कि चरोदा के बाद बीच बीच में केबिन बने हुए हैं "ए" "बी" "सी" से लेकर
शायद "एच" आखरी केबिन हो उनसे लाइन क्लियर होने की जानकारी ली जा रही थी और प्रत्येक कबिन के नाम के लिए उन शहरों के नाम लिए जा रहे थे . "मौदहापारा" सुन सबका आक्रोश हंसी के माहौल में बदल गया... उस दिन पहुंचे तो आखिर देरी से ही.... फिर भी मजे लेते हुए....
शनिवार, 12 दिसंबर 2009
दूर (जहाँ से अप डाउन किया जा सके ), पदस्थ नौकरी पेशा लोगों की दैनिक यात्रा
सभी ब्लॉगर भाइयों को एक बार फिर जय जोहार. नौकरी पेशा लोगों की जिन्दगी से तो सभी वाकिफ हैं. यदि कहीं अप डाउन करने वाले हों तो जिन्दगी मशीन की भांति हो जाती है. पर हाँ उसमे भी दैनिक यात्री अपने अपने समूह के साथ एन्जॉय करने से नहीं चूकते. मुझे भी, चूंकि पत्नी भी बैंक में सेवारत है, विभाग प्रमुख द्वारा ज्यादा दूर नहीं भेजा जाता. नौकरी के २६ वर्ष पूरे होने वाले हैं. इसमें फिफ्टी परसेंट तो उप डाउन में निकला है. एक से एक घटनाएं हुई. उसी की आज याद आ रही है. खासकर आज मैं राजनंदगांव से रात के ८ बजे की तारसा लोकल से दुर्ग वापस आ रहा था तो खाद्य अधिकारी, ग्रामीण बैंक में पदस्थ अधिकारी, सभी साथ में थे. आप बीती सुना रहे थे. तो आज उनकी आप बीती ही यहाँ प्रस्तुत करना चाहूँगा. खाद्य अधिकारी महोदय का कार्यालय कलेक्ट्रेट में है जहाँ और भी कार्यालय पाए जाते हैं. बात ही बात में कहने लगे के दिन में तो वे दुनिया भर के झमेलों में पड़े रहते हैं. कार्यालयीन कार्य तो शाम पांच बजे शुरू होता है. दिन के झमेलों की शुरुआत उन्होंने विभाग देख "मांगीलाल" बन माँगनेवाले लोगों के बारे में कहना शुरू किया. "मांगीलाल" की श्रेणी में सर्वप्रथम ब्लैक मेल करने वाले तथाकथित पत्रकारों का जिक्र हुआ. ये ज्यादातर त्योहारों में कार्यालयों के चक्कर लगाते हैं और बमुश्किल १००-५० कोई समाचार पत्र छपवाते हैं. दूसरे नंबर पर रहे मांगते समय दीन हीन बनकर कार्यालय में घुस जाने वाले. यदि बात नहीं बनी तो तमाम असंसदीय भाषा का प्रयोग करने लगना इनकी फितरत में है. पर ऐसे लोगों से निजात पाने वालों की भी कमी नहीं है. क्या हुआ एक बार एक व्यक्ति अपने आपको एकदम परेशानी में होने का नाटक करते हुए ट्रेन में ही सभी यात्रियों से सहयोग की गुहार करने लगा. अपने किसी सम्बन्धी की मृत्यु की बात बताकर. ट्रेन में बैठे सज्जनों में से एक ने उस व्यक्ति से सहानुभूति जताते हुए (भांप तो लिए थे मांगने वाले की मंशा को) कहा कि यदि ऐसी बात है तो उस मृत व्यक्ति के संस्कारों में होने वाले सभी खर्चे वह वहन करेगा. ऐसा सुनते ही वह परेशान व्यक्ति वहां से खिसक गया. कहने का तात्पर्य यह है कि आज क्या क्या हथकंडे अपनाए जाते हैं मुफ्त का पैसा पाने के चक्कर में. यह तो हुई "मांगीलाल" वाली बात. अब जरा चर्चा करें कि आप ऑफिस से छूटने के बाद स्टेशन में खड़े हैं. पहले गाड़ी के राईट टाइम चलने की सूचना दी जा रही है और कुछ ही समय पश्चात् १५ मिनट लेट चलने का अन्नौंसमेंट होने लगता है. कारण पहले माल गाड़ी निकालना होता है. यह रेलवे की लक्ष्मी है. कैसा लगता है. खीज होती है ना ? पर इसमें भी दैनिक यात्रियों का एन्जॉय करना नहीं छूटता. एक बार की बात है हम उस समय रायपुर से भिलाई पॉवर हाउस ड्यूटी में आया करते थे. उस समय आज की तरह ट्रेन सुविधा नहीं थी शाम ६ बजे एक ही ट्रेन का इन्तेजार रहता था. वह ट्रेन थी वाल्तेरु. प्रायः यह ट्रेन विलम्ब से चलती थी. पहले मालगाड़ी क्रोस कराया जाता था. और पूछने पर भारी भरकम शरीर वाला स्टेशन मास्टर पतली आवाज में कुछ यूँ कहता "गोडी के इंजिन में ट्रबल है. पर जब हम राजनंदगांव से आज से दस साल पहले अप डाउन करते थे तब वहां का एक स्टेशन मास्टर जिनका नाम "माताभीख" था ईमानदारी से गाड़ी की सही स्थिति बता दिया करते थे. यहाँ तक कह देते थे की आज बस से चले जाइए. ऐसे कई अनुभव है एक साथ बखान नहीं किया जा सकता. शेष फिर ....... शुभ रात्रि व जय जोहार के साथ (जय जोहार नहीं छूटेगा, "जोहार" शब्द का प्रयोग तो रामायण में भी हुआ है.)
बुधवार, 25 नवंबर 2009
रेल गाड़ी के जनरल डब्बा
भाग - २
मैं सबले पहिली मोर ब्लॉग के अउ बिन ब्लॉग के घलो जम्मो संगवारी मन ला जयरामजी की कहत हौं. भाग्ग-२ के संपादन बर अब्बड अगोरवायेवं तेखर खातिर माफ़ी चाहत हौं. तौ टेशन ले पहुचेवं सम्मलेन के जघा माँ. सम्मलेन हा युवक युवती परिचय सम्मलेन रहिसे. अइसन सम्मलेन माँ अपन अपन जोड़ा जोड़ी खोजे माँ सहूलियत रथे. अरे बिहाव नई करैं त का होगे दाई ददा मन ला पता तो चल जाथे के काखर टूरी अउ काखर टूरा बिहाव के लाइक हो गे हे. देखत हौं लाव लश्कर के संग अइसन गाड़ी(चमचमावत कार) ले जेखर मुड़ी माँ लाल लाईट लगे हे ओमा ले बढ़िया जग जग ले उज्जर सफेद कपडा (पजामा अउ आधा बाँही के कुरता) पहिने एक झन मनखे उतरिस. ओखर संग माँ लंगुरवा घलो रहिसे. अब बताये के जरूरत नई ये. तभो ले बता देथवं. ओ मनखे रहिसे बेलासपुर के रहैया अउ आज जउन अपन राज के खजाना मंत्री हे भाई अमर अग्रवाल. संग माँ ओखर बेलासपुर शहर के देख रेख करैया वैसे ओला शहर के प्रथम नागरिक माने जाथे महापौर जी भी रहिन अउ फेर मंत्री महोदय के चेला चपाटी. अब सम्मलेन के स्वागत दुआरी ले ओला परघावत हमर समाज के नगर अध्यक्ष अउ बड़े बड़े कार्यकर्ता मन मंच तक लेजिन. ये दारी बने बेवस्था करे रहिन हमर समाज के करता धरता मन. ओतकेच जुअर महू दुआरी माँ पहुँच गेवं. ऐसे लागिस महू तर गेंव. मोरो ऊपर फूल गिरिस तिलक घलो लगाइन दुआरी माँ खड़े नोनी मन. मंत्री जी मेरन समय के कमी रहिसे. कइसनो कर के मंच माँ बैठारे गइस. हमर समाज के राष्ट्रीय स्तर के अउ प्रदेश स्तर के बड़े बड़े पदाधिकारी मन घलो मंच माँ मंत्री मन के संग माँ बइठिन. मैं अपन एक जघा माँ कोंटिया गे रेहेंव. अब शुरू होईस मंच माँ बैठे मंत्रीजी समेत जम्मो झन ला पुष्पहार से स्वागत करेके पारी. झन पूछौ भैया हो. मंत्री के स्वागत करैया कोरी खैरखा के मात्रा माँ जी. करीब पौन घंटा ओही माँ बीत गे. फेर समाज के करता धरता के स्वागत करे माँ अलग. हड़बड़ी माँ अपन गोत्र ऋषि कश्यप जी के पूजा ला घलो भुला गे रहिन. सुरता आये के बाद ओखर फोटो माँ दिया ला जलाइन. कोनो समाज होए अपन समाज के एक ठन बने भवन के बेवस्था करथे. ओखर बर एडी चोटी एक करे ला परथे. एक तो अतेक दानवीर नई रहैं जउन अकेल्लेच बनवा दै. फेर आज के तारीख माँ जमीन खोजे नई मिलत हे. अउ मिलतो हे त भाव आगी लगे बरोबर हे. तौ अइसने बेरा माँ थोकिन कंत्री बन के नजूल उजूल के भुइंया मिल जाय कहिके मंत्री जी के सुरता करथन. वैसे तो जाने बात ए के कंत्री कोन आय. अतके माँ काम नई चलै. बने भीड़ जोरे ल परथे त मंत्री जी पतियाथे के हाँ भविष्य माँ मोर बोट (वोट) के एक बहुत बड़े हिस्सा इंखर मेरन हवै.
तौ सबो झन (महिला सभा अउ तरुण सभा दुनो के बड़े बड़े पदाधिकारी मन ) अपन अपन गोठ बात रखिन. फेर मंत्री जी भी हां शुभ कामना के अपन दू शब्द कहिके ये परिचय सम्मलेन के महत्व बताइन अउ भरोसा दइन के हमर समाज के भवन जउन अभी भूतल भर माँ बने हे ओला दुमंजला बनाये बर सहयोग मिलही सरकार ले.
मंत्री जी के बिदा होए के बाद समाज के सब बिहाव के लाइक नोनी बाबु के परिचय के सिलसिला शुरू होईस. संगे संग उनखर पंजीयन घलो. चाय नास्ता भोजन सबो के बेवस्था रहिसे. अरे हाँ एक ठन जउन बने बात अउ होईस ओ आये हमर समाज के हिंदी साहित्य के नामी शख्सियत स्वर्गीय प्यारेलाल जी गुप्त (जन्म १७ अगस्त १८९१ अउ निर्वाण १४ मार्च १९७६) जेखर द्वारा किताब लिखे गे हे; "प्राचीन छत्तीसगढ़(इतिहास ग्रन्थ) सुखी कुटुंब (उपन्यास) सरस्वती (मराठी से अनुदित) लबंगलता (उपन्यास) फ्रांस की राजक्रान्ति का इतिहास, ग्रीस का इतिहास, बिलासपुर वैभव (हिंदी गजेटियर) पुष्पहार (कहानी संग्रह) एक दिन (नाटक)" के स्मरण माँ जारी त्रैमासिक पत्रिका "पाठ" के विमोचन माननीय मंत्री जी द्वारा करे गइस. मैं खुद नई जानत रहेंव. ओ दिन जानेंव. बने लागिस. महू करीब सांझ के साढ़े पांच छै बजे तक रहेंव फेर अपन भेलाई बर ओही रेलगाड़ी माँ (आये के बेरा पसिंजर) माँ आयेवं अउ करीब ११ बजे रात के घर पहुचेंव. लिखे बर तो अब्बड अकन ले चीज हे जी फेर जादा माँ आदमी बोरिया जाथे कहिके इहें समापन करत हौं.
जय जोहार.
मंगलवार, 17 नवंबर 2009
रेल गाड़ी के जनरल डब्बा
भाग - १
१४ तारीख के लिखी दे रहेवं के मोला १५ के अपन बनिया समाज के प्रादेशिक सम्मलेन माँ जाए बर हे. तौ एखरे बर १५ तारीख के बिहनिया बिहनिया करीब ६.४५ बजे मैं बिलासपुर जाए बर घर ले निकलेवं. दक्षिण बिहार एक्सप्रेस हा तकरीबन ७.०५ के दुरुग ले छूट थे. अपन डुगडुगी (हीरो पुक ई जेड) माँ स्टेशन तक गेंव. गाड़ी ल स्टैंड माँ रखेंव. एक्दमेच गाडी छूटे के टाइम हो गे रहिसे. गनीमत हे चार पांच ठन टिकट काउंटर खुल गे हवै. एक टिकट काउंटर माँ कम भीड़ भाड़ रहिसे उंहचे टिकट लेंव अउ दउड़त दउड़त पलेट फारम नंबर ४ माँ पहुचेंव. गाड़ी खड़े रहय. एकेच ठन ताराचंद (टी. सी.,टिकट चेक करैया) खड़े रहय. अउ ओखर मेर स्लीपर क्लास के टिकट बर एक्स्ट्रा पैसा देके टिकट लेवैया के भरमार. का पूछे बर हे . टी. सी. के चेहरा पसीना से तरबतर रहय. महू बिलासपुर बर स्लीपर के टिकट मागेवं त कहिदिस लोकल टी. टी. आही त बनही. गाड़ी छूटे के टेम हो गे रहिसे गार्ड अपन भिसिल ला बजा दे रहिसे. अब एक्सप्रेस गाड़ी माँ जेमा जनरल डब्बा गिने चुने रथे, बिना रिजर्वेशन जनरल बोगी माँ यात्रा करना माने धक्का मुक्की ले हलकान होत जाव. सबो किसम के हलकानी, बैठे के जगा नहीं, चोरी अउ पॉकेट मारी के डर.....अउ कई किसम के खतरा जी. एखरे पाय के मैं रिजर्वेशन बोगी माँ इन्तिजाम करके जाथौं. पर का करौं ओ दिन ताराचंद घलो ला सुने के फुर्सत नहीं. गेंव पीछू के आधा ठन बोगी माँ. असल माँ वो बोगी हा जनाना बोगी रहय फेर इहाँ कहाँ के नियम अउ कानून. औरत मरद सबो घुसरे हें. झन पूछ ले दे के महू घुसरेंव. रेंगिस गाड़ी हा. गाड़ी के रेंगे ले जैसे गहुँ पिसवाय ला जाबे त आटा हा जब डब्बा माँ भराथे त डब्बा ला हलाये के बाद ही आटा एडजस्ट होथे. ओइसने गाड़ी के रेंगे ले हमन एडजस्ट होएन. मैं सिंगल सीट वाले भाई ल अपन आधा डबलरोटी रखे बर निवेदन करके टिक गे रेहेंव. अब पहुंचिस गाड़ी पावर हॉउस स्टेशन. का पूछे बर हे. एक तो आधा बोगी के डब्बा, पहिली च ले खच खच ले भरे रहय तभो ले सवारी घुसरते जाथे बेसुध होके. हमन सब जानथन के अइसन बेरा ल ताकत रथें अपन रोजी रोटी बर निकले बिचारा पाकिट मरैया मन. तभो ले गाड़ी झन छूटे कहिके लकर धकर चढ़ते जाथन. गाड़ी हा छूटे लागिस त ओ दिन तीन झन के बाट लग गे. एक झन के पर्स माँ पांच हजार रूपया अउ ए टी एम् रहय बाकी दू झन के शायद चालीस पचास रुपिया भर. इंखर मन के २-३ के ग्रुप रथे. एक झन ला देख डारिन. पीटीन घलो. फेर चोरी होए समान हा तो पार्सल हो गे रहिसे दूसर ला, कहाँ ले मिलै. आखिर जेखर चोरी होए रहिसे ओ बिचारा हा भिलाई -३ माँ जी आर पी थाना माँ रपट लिखवाए बर उतर गे. अब इहाँ गाड़ी माँ खड़े पसेंजर मन बेंच माँ बैठे लोगन ले आघू के स्टेशन माँ जगा मिलही कहिके दीन हीन बरोबर देखत हे. पूछत घलो हे कहाँ उतरहू कहिके. जम्मो झन ले ओ मन ला "टा टा" मिलिस. ओ मन टाटानगर जवैया रहैं. एती डब्बा भीतर किसम किसम के बात. कहत हें, "पुलिस ल बताये ले का फरक पड़ही, फिफ्टी फिफ्टी के सौदा रथे जी". "चोर चोर मौसेरे भाई"........ बाकी पाकिट मरैया मन एमा झूठ नई बोलय पुलिस मेरन ईमानदारी से बक देथें ...... किसिम किसिम के गोठ. महू गोठ बात के आनंद लेत पहुंचेवं बिलासपुर करीब १०.०० बजे. १०.१५ के सम्मलेन आयोजन स्थल माँ पहुँच गेंव. अब सम्मलेन के बात भाग-२ माँ लिखिहौं.
जय जोहार.
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