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शनिवार, 12 दिसंबर 2009

दूर (जहाँ से अप डाउन किया जा सके ), पदस्थ नौकरी पेशा लोगों की दैनिक यात्रा



सभी ब्लॉगर भाइयों को एक बार फिर जय जोहार.  नौकरी पेशा लोगों की  जिन्दगी से तो सभी वाकिफ हैं. यदि कहीं अप डाउन करने वाले हों तो जिन्दगी मशीन की भांति हो जाती है. पर हाँ उसमे भी दैनिक यात्री अपने अपने समूह के साथ एन्जॉय करने से नहीं चूकते.  मुझे भी, चूंकि पत्नी भी बैंक में सेवारत है, विभाग प्रमुख द्वारा ज्यादा दूर नहीं भेजा जाता. नौकरी के २६ वर्ष पूरे होने वाले हैं. इसमें फिफ्टी परसेंट तो उप डाउन में निकला है. एक से एक घटनाएं हुई. उसी की आज याद आ रही है. खासकर आज मैं राजनंदगांव से रात के ८ बजे की तारसा लोकल से दुर्ग वापस आ रहा था तो खाद्य अधिकारी, ग्रामीण बैंक में पदस्थ अधिकारी, सभी साथ में थे. आप बीती सुना रहे थे. तो आज उनकी आप बीती ही यहाँ प्रस्तुत करना चाहूँगा. खाद्य अधिकारी महोदय का कार्यालय कलेक्ट्रेट में है जहाँ और भी कार्यालय पाए जाते हैं. बात ही बात में कहने लगे के दिन में तो वे दुनिया भर के झमेलों में पड़े रहते हैं. कार्यालयीन कार्य तो शाम पांच बजे शुरू होता है. दिन के झमेलों की शुरुआत उन्होंने विभाग देख "मांगीलाल" बन माँगनेवाले  लोगों के बारे में कहना शुरू किया. "मांगीलाल" की श्रेणी में सर्वप्रथम ब्लैक मेल करने वाले तथाकथित पत्रकारों  का जिक्र हुआ. ये ज्यादातर त्योहारों में कार्यालयों के चक्कर लगाते हैं और बमुश्किल १००-५० कोई समाचार पत्र छपवाते हैं.  दूसरे नंबर पर रहे मांगते समय दीन हीन बनकर कार्यालय में घुस जाने वाले. यदि बात नहीं बनी तो तमाम असंसदीय भाषा का प्रयोग करने लगना इनकी फितरत में है. पर ऐसे लोगों से निजात पाने वालों की भी कमी नहीं है. क्या हुआ एक बार एक व्यक्ति अपने आपको एकदम परेशानी में होने का नाटक करते हुए ट्रेन में ही सभी यात्रियों से सहयोग की गुहार करने लगा. अपने किसी सम्बन्धी की मृत्यु की बात बताकर.  ट्रेन में बैठे सज्जनों में से एक ने उस व्यक्ति से सहानुभूति जताते हुए (भांप तो लिए थे मांगने वाले की मंशा को) कहा कि यदि ऐसी बात है तो उस मृत व्यक्ति के संस्कारों में होने वाले सभी खर्चे वह वहन करेगा. ऐसा सुनते ही वह परेशान व्यक्ति वहां से खिसक गया.  कहने का तात्पर्य यह है कि आज क्या क्या हथकंडे अपनाए जाते हैं मुफ्त का पैसा पाने के चक्कर में. यह तो हुई "मांगीलाल" वाली बात. अब जरा चर्चा करें कि आप ऑफिस से छूटने के बाद स्टेशन में खड़े हैं. पहले गाड़ी के  राईट टाइम चलने की सूचना दी जा रही है और कुछ ही समय पश्चात् १५ मिनट लेट चलने का अन्नौंसमेंट होने लगता है. कारण पहले माल गाड़ी निकालना होता है. यह रेलवे की लक्ष्मी है. कैसा लगता है. खीज होती है ना ?  पर इसमें भी दैनिक यात्रियों का एन्जॉय करना नहीं छूटता.  एक बार की बात है हम उस समय रायपुर से भिलाई पॉवर हाउस   ड्यूटी में आया करते थे. उस समय आज की तरह ट्रेन सुविधा नहीं थी शाम ६ बजे एक ही ट्रेन का इन्तेजार रहता था. वह ट्रेन थी वाल्तेरु.  प्रायः यह ट्रेन विलम्ब से चलती थी. पहले मालगाड़ी क्रोस कराया जाता था.  और पूछने पर भारी भरकम शरीर वाला स्टेशन मास्टर पतली आवाज में कुछ यूँ  कहता "गोडी के इंजिन में ट्रबल है.  पर जब हम राजनंदगांव से आज से दस साल पहले अप डाउन करते थे तब वहां का एक स्टेशन मास्टर जिनका नाम "माताभीख" था ईमानदारी से गाड़ी की सही स्थिति बता दिया करते थे. यहाँ तक कह देते थे की आज बस से चले जाइए. ऐसे कई अनुभव है एक साथ बखान नहीं किया जा सकता. शेष फिर ....... शुभ रात्रि व जय जोहार के साथ (जय जोहार नहीं छूटेगा, "जोहार" शब्द का प्रयोग तो रामायण में भी हुआ है.)

5 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

जय जोहार-सुनाते चलिये अपने अप डाउनीय संस्मरण...वाल्तेरु नाम था क्या ट्रेन का..वहीं न जो वाल्टियर जाती थी..

ललित शर्मा ने कहा…

जय जोहार

suryakant gupta ने कहा…

टिप्पणीकार ब्लॉगर बंधुओं को मेरा नमस्कार.
जी हाँ वही ट्रेन है जो वाल्टियर जाती थी.
उस समय उसके चलने का समय शायद
शाम ६ बजे पॉवर हाउस से था.

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

भईया सचमुच में नियमित रेल यात्रा करने वालों के अनुभव रोचक होते हैं ऐसी ही एक कहानी हमारे दुर्ग के प्रसिद्ध कथाकार कैलाश बनवासी नें अन्‍यथा में लिखा है यहां मेरी भी एक कहानी प्रकाशित हैं.

शरद कोकास ने कहा…

जय जोहार यह मांगीलाल का न्या अर्थ आज ही पता चला । इस "लोहे के घर" यानि रेल के बारे में कुछ मेरी कवितायें भी है इस आने जाने पर ।