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मंगलवार, 25 मई 2010

गिरना

गिरना 
गिर कर सम्हलना, सम्हल के उठना 
नामुमकिन नहीं है 
मगर गिर गए कहीं दुनिया की नजरों से 
ऐसे गिरे हुए को उठाना मुमकिन नहीं है 
यदि सोचते हैं, दुनिया से उठ जाना बेहतर होगा 
तो उठ तो जाओगे, मिलेगी जन्नत या फिर दोज़ख 
ठिकाना बताना मुमकिन नहीं है.
                              
                              वास्तव में जन्नत भी यहीं है और दोज़ख भी. यदि आपका कृत्य अच्छा है,  स्वाभाविक है यश मिलेगा. दूसरों के काम आकर आप अपने आपको भाग्यशाली समझेंगे. आपके लिए भी तैयार रहेंगे लोग मर मिटने को. इस सुखानुभूति को ही जन्नत (स्वर्ग) समझें. इससे बड़ा दोज़ख और क्या हो सकता है जब हमारी इज्ज़त पे आंच आये. लोग थूंके हम पर. मेरे सहकर्मी श्री अरुण गजबे वे भी निरीक्षक हैं और कुछ लिखने पढने की तमन्ना उनमे भी है, बोले इस "गिरना" पर कुछ लिखिए. सो किया थोड़ा  सा प्रयास..........
जय जोहार...........   

9 टिप्‍पणियां:

दिलीप ने कहा…

waah Suryakaant ji bahut khoob....prayas me poori tarah safal hue...

Udan Tashtari ने कहा…

सदविचार!!

'उदय' ने कहा…

...डम-डम ... डम-डम ...!!!

'उदय' ने कहा…

...अदभुत !!!

honesty project democracy ने कहा…

बहुत ही उम्दा विचार ,हर इन्सान से गलतियाँ होती है लेकिन असल इन्सान वही है जो अपनी गलती से सिख लेकर सदमार्ग पर चलते हुए दूसरों को गलती करने से बचाता है /

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

श्री अरुण गजबे को नमस्‍कार, उन्‍हें भी ले आईये ब्‍लॉग की दूनिया में.

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

हमारे मित्र गजबे जी इस समय राजनादगाव छोड़ रायपुर जा रहे हैं। उन्हे मै प्रेरित करता हूं। सन्जीव भाई की सलाह पर अमल होना ही चाहिये।

arvind ने कहा…

जन्नत भी यहीं है और दोज़ख भी. यदि आपका कृत्य अच्छा है, स्वाभाविक है यश मिलेगा. दूसरों के काम आकर आप अपने आपको भाग्यशाली समझेंगे. .......सदविचार.

मीनाक्षी ने कहा…

थोड़े में बहुत कुछ कह दिया...