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गुरुवार, 15 जुलाई 2010

समाज और समिति आज के परिवेश में

आज हमारा समाज विभिन्न जातियों में, वर्गों में बंटा हुआ है.  समाज बना कैसे? जाति बनी कैसे? सभी जानते हैं. वर्ण व्यवस्था अभी की नहीं है, सदियों पुरानी है.  चार आश्रम, चार वर्ण कौन नहीं जानता. वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर की गयी थी. जन्म से लेकर मरण के बीच चार आश्रम से व्यक्ति को गुजरना पड़ता है ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और फिर संन्यास. प्रत्येक वर्ण का एक समाज होता  भले ही एक ही वर्ण में कई उपजातियां हो. पूरे समाज के कल्याण के लिए एक समिति/संगठन बनता था. बन तो अभी भी रहा है किन्तु आज के परिवेश में इनकी प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह लग रहा है.  आज कल सह शिक्षा,  शासकीय अथवा गैर शासकीय विभागों/संस्थाओं में विभिन्न पदों पर पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा  मिलाकर  कार्य करना समाज नाम की चीज को धीरे धीरे ख़तम करते जा रहा है. समिति याने अब समाज की इति. ऐसा क्यों लिखा जा रहा है? हमने अभी अभी अपने समाज में यह देखा है कि शादी ब्याह के मामले में अब बच्चे अपने माँ बाप के समक्ष ऐसी स्थिति पैदा कर देते हैं कि माँ बाप कुछ बोल ही नहीं सकते .  समाज जाय चूल्हे में. क्या मतलब है समिति का. ऐसा नही है कि समाज में भी पढ़ी लिखी लड़कियां या लडके नहीं हैं. मगर एक ही कार्यालय में लडके लड़की दोनों कार्यरत होने से प्रेम प्रसंग शुरू हो जाता है और जिस प्रकार  बिल प्रस्ताव या अधिसूचना पारित करवाने में सम्मानीय  राष्ट्रपति का  मुहर लगाना जरूरी होता है, और उन्हें मुहर लगाना ही पड़ता है, उसी प्रकार चले आते हैं माँ बाप के पास मुहर लगवाने. और ज्यादा हुआ तो उसकी भी जरूरत नहीं समझते. दरकिनार कर दिए जाते हैं माँ बाप.  मानता हूँ "वसुधैव कुटुम्बकम" याने सारा संसार ही परिवार है ऐसा समझना चाहिए. एक दूसरे का सहयोग करने के मामले में गलत नहीं है. पर जहाँ तक एक दूसरे में तालमेल बिठाने का, अपने समुदाय के संस्कारों को समझने समझाने  का प्रश्न  है,  ऐसा हो पाना जरा मुश्किल ही लगता है .  अब  जब  यह  प्रचलन में आ ही चुका है तो  वाकई वह दिन दूर नहीं जब समाज का अस्तित्व ही ख़तम हो जावेगा.
जय जोहार........

6 टिप्‍पणियां:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बढ़िया आलेख ............१५/०७/२०१० की सुबह ४:४५ की ब्लॉग वार्ता के लिए आपकी इस पोस्ट को भी लिया गया है ............देखना ना भूलें !
जय जोहार !

दीपक 'मशाल' ने कहा…

समाज में ही अब अच्छाइयां कम और बुराइयां ज्यादा दिखाई पड़ती हैं.. नई पीढी करे तो क्या? जब तक पैर जूते में नहीं होगा उसके काटने के दर्द को कोई नहीं समझ सकता..

Divya ने कहा…

Bahut achha lekh !

"we can take the horse to the pond but we cannot make it drink."

Fir bhi koshish to jari rahegi samjhane ki, apne samudaar ko.

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निर्मला कपिला ने कहा…

अपकी बात से बिलकुल सहमत हूँ। लेकिन बदलाव समय की रीत है मुझे नही लगता कि इसे रोका जा सकेगा। बच्चे का जब तक हाथ न जले उसे आग की तपिश महसूस नही होती और वो अनायास ही अपना हाथ दिये की तरफ बढा देता है। अज की युवा पढी को भी तभी होश आयेगी जब वो खुद इस परिस्थिती से गुअजरेंगे। धन्यवाद।

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

...बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति, बधाई !!!

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।