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सोमवार, 12 जुलाई 2010

दाम्पत्य जीवन में दरार, ईश्वर ने कराया ये कैसा करार

(१)
हे श्रृष्टि के रचयिता 
जगत के आधार 
सगुण रूप साकार हो 
  या निर्गुण रूप निराकार
कहते हैं, आपके द्वारा ही 
बना दी गई होती है 
पति पत्नी की जोडी
ताज्जुब होता है 
आपकी अदालत में कराये 
गए इस करार में फिर क्यों 
पड़ जाती है दरार 
(२)
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के 
एक पत्नीव्रत धारी होने का सुबूत 
 छद्म सुंदरी मायावी शूर्पणखा  
का प्रणय निवेदन सहजता से ठुकराया जाना 
किन्तु माता सीता की अग्नि परीक्षा 
आज की नारी के लिए मुश्किल हो गया है पचा पाना 
प्रश्न चिन्ह बन गया है गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा 
श्री राम चरित मानस में इस प्रसंग का लिख़ा जाना.
(३) 
दोस्त जिसे कहते हैं मित्र
यह रिश्ता होता है विचित्र 
एक दूसरे के सामने अपने 
अंतर्मन की व्यथा का उकेर देते हैं चित्र.
दोस्ती की परख होती है सुख दुःख में
एक दूसरे का काम आना 
किन्तु
पति पत्नी के बीच हो यदि उलझन  
कभी न पड़ें इनके बीच यह हमने अच्छे से है जाना
(४)
'शक' का कोई इलाज नहीं 
यह कैंसर से घातक बीमारी है 
तकनालोजी  व विज्ञान की कृपा से
कंप्यूटर  में अंतर्जाल की सबको चढ़ी खुमारी है.
 (५)
अंतरजाल की माया अद्भुत कहीं वरदान है तो कहीं अभिशाप 
कहीं ऑरकुट, तो कहीं फेस बुक, जहँ क्या क्या  नहीं होता!! बाप रे बाप 
कंवारे कंवारी की नादानी  की हरकत फिर भी समझ है आती 
शादी शुदा लोगों की नासमझी  घर में  कैसी क़यामत लाती 
(६)
एक सच्ची घटना का करना चाहूँगा मैं जिक्र
राह से ज़रा भटक रहे हैं मेरे प्यारे से एक मित्र 
उन्हें खींच रही है  एक विवाहिता, अपनाकर शूर्पणखा का चरित्र  
धन्य हैं महाकवि मैथिलीशरण जी, जिन्होंने  उस छद्म  'कामिनी' के रूप को
अपनी कविता की  पंक्ति में ऐसा सजाया; 
"थी अत्यंत अतृप्त वासना दीर्घ दृगों से झलक रही"
उस विवाहिता के इस रूप ने शायद मेरे मित्र का पथ भटकाया 
देख रहा हूँ  उम्र के इस  पड़ाव में स्वतः के घर 
पति पत्नी के प्रेम की मजबूत दीवार में पड़ने लगी है दरार 
हे ईश्वर! अपनी अदालत में इन दोनों के बीच कैसा कराया था तूने करार?
जय जोहार..........

12 टिप्‍पणियां:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बहुत बढ़िया .........बड़ी सहजता से आपने जीवन की जटिलता को है समझाया !
जय जोहार !

Udan Tashtari ने कहा…

ईश्वर करार करा देता है..सहेजना और तोड़ना तो इंसान करता है.

बहुत अच्छी सोचने योग्य रचना.

आचार्य उदय ने कहा…

भावपूर्ण लेखन।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत गहराई से सोचे हुए विचार...सभी बहुत पसंद आये...दूसरा वाला विशेष पसंद आया

निर्मला कपिला ने कहा…

शायद इस जटिलता के बारे मे ईश्वर ने सोचा ही नही था। उसने तो दोनो को सात जन निभाने के लिये कुछ परिधियां बां ध दी मगर नदी जल से बाहर जब छलांग लगाती है तो पानी बिखरना तय है। दोनो ही संतुलन नही रख पाये। बहुइत अच्छी लगी कविता। धन्यवाद।

राजकुमार सोनी ने कहा…

गुप्ता जी
आज तो आपने काफी महत्वपूर्ण लिख डाला है
एक-एक लाइन काम की है.
आपको बधाई

ललित शर्मा ने कहा…

"थी अत्यंत अतृप्त वासना दीर्घ दृगों से झलक रही"

ज्योतिष बाबा कहते हैं जब कुंडली में बुध ग्रह प्रभावशाली हो जाता है। वह आदमी के मन को भटकाता है।
बुध से काम ले,भटकें नहीं,जीवन सार है।
लईका डौकी हलकान हे त जीवन बेकार है।

मोर जय जोहार हे जय जोहार हे

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मंगलवार 13 जुलाई को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

P A R D E E P ने कहा…

सूर्यकान्त जी आपके सरलता मै लिखे भाव किसी की भी आंखे खोलने मै सक्ष्म होते हैं क्योंकि आप जो भी लिखते हैं सत्य हृदय से लिखते हैं ! बहुत ही अच्छे से लिखा हे आपने ....मुबारकबाद !

पति-पत्नी का इकरार ,
देवता बनते हैं साक्षी ,
दोनों बनते हैं
इकरार के पालनहार ,
दोनों देते हैं वचन
अपनी वफादारी की ,
भगवान ना करे ...
आ जाये कोंई बीमारी ..
शक की महामारी
तब होता हे
बर्बादी का आगाज
किस्मत की तबाही
कोंई नहीं कर पाता तब
इस इकरार की भरपाई ,
ये ही करती हे ....
सीता की जुदाई !!!!!!!

दीपक 'मशाल' ने कहा…

कल-कल करके बहती रही ये कविता सरिता.. बेहतरीन..

निर्झर'नीर ने कहा…

ताज्जुब होता है
आपकी अदालत में कराये
गए इस करार में फिर क्यों
पड़ जाती है दरार

wah ji wah har haqiqattariin or talkh baat ko bhi khoob vyang roop diya hai aapne yakinan kabil-e-daad ...kubool karen

aabhar aap blog tak aaye or shabdo ko saraha

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत खूबसूरती से समझाया है ये जीवन दर्शन