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मंगलवार, 27 जुलाई 2010

गुरु गोबिन्द दोउ खड़े काके लागू पाय। बलिहारी आपनी गोबिन्द दियो बताय॥

                              हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ़ पूर्णिमा का दिन गुरु की आराधना का है। यह अवसर गुरु-शिष्य परंपरा की महत्व को बताता है। इस वर्ष यह पुण्य अवसर २५ जुलाई को आया । शास्त्र कहते हैं गुरु से मंत्र लेकर वेदाध्ययन करने वाला शिष्य ही साधना की योग्यता पाता है। गुरु हमेशा वंदनीय और पूजनीय होते हैं।  व्यावहारिक जीवन में भी पाते हैं कि बिना गुरु के मार्गदर्शन या सहायता के किसी कार्य या परीक्षा में सफलता कठिन हो जाती है। किंतु गुरु मिलते ही लक्ष्य आसान हो जाता है। सफलता कदम चूमती है। इस प्रकार गुरु शक्ति का ही रुप है। वह किसी भी व्यक्ति के लिए एक अवधारणा और राह बन जाते हैं, जिस पर चलकर व्यक्ति मनोवांछित परिणाम पा लेता है। इस प्रकार बगैर गुरु बनाए कोई साधना सफल नहीं होती। कहते हैं ईश्वर के कोप से गुरु रक्षा कर सकते हैं। पर जब गुरु रुष्ट हो जाए तो असफलता और कष्टों से ईश्वर भी रक्षा नहीं कर पाता। यही कारण है कि गुरु का महत्व भगवान से ऊपर बताया गया है। गुरु ही हमें जीवन में अच्छे-बुरे, सही-गलत, उचित-अनुचित का फर्क बताता है। जो सफल जीवन के लिए बहुत आवश्यक है। गुरु ही हमें गोविन्द यानि भगवान से मिला सकता है। सद्गुरु कबीरदासजी ने इसीलिए कहा है-
गुरु गोबिन्द दोउ खड़े काके लागू पाय।  बलिहारी आपनी गोबिन्द दियो बताय 
                          यह पवित्र तिथि व्यास पूर्णिमा के नाम से भी प्रसिद्ध है। अनेक धर्मावलंबियों की यह जिज्ञासा होती है कि क्यों गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। इसका जवाब भी पौराणिक मान्यताओं में मिलता है।
                               पहला कारण इस दिन हिंदू धर्म के प्रमुख ऋषि वेद व्यास का जन्मोत्सव मनाया जाता है। साधारणत: धर्म से जुड़े लोग ऋषि वेद व्यास को मात्र महाभारत का रचनाकार मानते हैं। किंतु यह अनेक लोग नहीं जानते कि हिन्दू धर्म के पवित्र धर्म ग्रंथ, जिनमें सभी वेद, पुराण शामिल है, का संकलन और संपादन ऋषि वेद व्यास ने ही किया। इनमें प्रमुख रुप से चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद के साथ, १८ पुराण, महाभारत और उसका एक भाग भगवद्गीता शामिल है। उन्होंने पुराण कथाओं के द्वारा वेद सार और धर्म उपदेशों को आम जन तक पहुंचाया।
                          व्यास पूर्णिमा का यह शुभ दिन मात्र वेदव्यास के जन्मोत्सव दिवस ही नहीं है, बल्कि मान्यता है कि इसी पावन दिन वेद व्यास ने चारों वेदों का लेखन और संपादन पूरा किया। इस कारण भी यह व्यास पूर्णिमा के नाम से जानी जाती है।
                          ऋषि वेद व्यास ने श्रीगणेश की सहायता से धर्मग्रंथों को पहली बार भोजपत्र पर लिखा। इसके लिए उन्होंने एकांत स्थान चुना। इस दौरान उन्होंने अपने शिष्यों को भी मिलने और किसी भी तरह से बाधा डालने से मना किया। इसके बाद उन्होंने अपने दिव्य ज्ञान और ध्यान से भगवान श्री गणेश के साथ धर्म और जीवन से जुड़ी महान शिक्षाओं और उपदेशों को धर्मग्रंथों में लिखित रुप में उतार दिया। जो पूर्व में मात्र सुने जाते थे। ऋषि वेद व्यास, वेद और धर्म के रहस्यों को पहली बार लिखित रुप में जगत के सामने लाए। जिससे जगत ने धर्म और ब्रह्म दर्शन को गहराई से समझा। उनके द्वारा बताया गया धर्म दर्शन अमर और अनन्त है। जो पुरातन काल से ही जगत को जीवन में धर्म का महत्व बता रहा है।

                              उपरोक्त दो कारण गुरु पूर्णिमा पर्व के मनाने के बारे में बताया गया है. पुराणों में विद्योपार्जन के लिए सही स्थान गुरुकुल को माना गया है जहाँ गुरु और शिष्य की क्या भूमिका होती थी सर्व विदित है. पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण करना. गुरु की सेवा और सबसे बड़ी बात माँ बाप से कोई सहायता भी प्राप्त न करना यहाँ तक कि भोजन भी भिक्षा के द्वारा प्राप्त किये अन्न से स्वतः पकाकर ईश्वर और गुरु को भोग लगा ग्रहण करना. पुराणों मे  उल्लेख है कि यह शिक्षा अथवा कहें विद्या ग्रहण करने का समय अत्यंत कठिन होता था. 
                               गुरु शिष्य का वर्तमान स्वरूप क्या है? लाखों रुपये शायद करोड़ों कहें तो ज्यादा अच्छा होगा भव्य पंडाल सज्जा, गीत संगीत के साथ बड़े बड़े संतों का प्रवचन. कोई संदेह नहीं अध्यात्म का वृहत अध्ययन किये होते हैं. जिव्हा  पर  माँ सरस्वती बैठी होती हैं. लाखों की संख्या में भक्त गण कहें या श्रोता, भेद नही किया जा सकता,  बैठकर प्रवचन का आनंद ले रहे हैं. माँ लक्ष्मी कृपा पात्र सहज में, माध्यम वर्गीय कुछ और परिश्रम कर दीक्षा प्राप्त करते हैं, मिल जाते हैं उन्हें गुरु और गुरु को मिल जाता है शिष्य.  गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित पुस्तक "क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं"? (स्वामी रामसुखदास जी द्वारा लिखित) मैंने पढ़ी. बहुत ही सुन्दर ढंग से 'गुरु'' की व्याख्या की गई है. उनमे से कुछ अंश यहाँ उद्धृत करना चाहूँगा.  
भगवत्प्राप्ति गुरु के अधीन नही
                                जिसको हम प्राप्त करना चाहते हैं, वह परमात्मतत्व एक जगह सीमित नहीं है, किसी के कब्जे में नहीं है, अगर है तो वह हमें क्या निहाल करेगा? परमात्मतत्व तो प्राणिमात्र को नित्य प्राप्त है. जो उस परमात्मतत्व को जाननेवाले महात्मा हैं, वे न गुरु बनते हैं, न कोई फीस (भेंट) लेते हैं, प्रत्युत सबको चौड़े बताते हैं.  जो गुरु नही बनते, वे जैसी तत्व की बात बता सकते हैं, वैसी तत्व की बात गुरु बनने वाले नहीं बता सकते. 
                                 सौदा करने वाले व्यक्ति गुरु नहीं होते. जो कहते हैं कि पहले हमारा शिष्य बनो, फिर हम भगवत्प्राप्ति का रास्ता बताएँगे, वे मानो भगवान् की बिक्री करते हैं. यह सिद्धांत है कि कोई वस्तु जितने मूल्य में मिलती है, वह वास्तव में उससे कम मूल्य की होती है.  जैसे कोई घड़ी सौ रुपयों में मिलती है तो उसको लेने में दूकानदार के सौ रूपये नहीं लगे हैं. अगर गुरु बनाने से ही कोई चीज मिलेगी तो वह गुरु से कम दामवाली अर्थात गुरु से कमजोर ही होगी. फिर उसमे हमें भगवान् कैसे मिल जायेंगे? भगवान् अमूल्य हैं. अमूल्य वस्तु बिना मूल्य के मिलती है और जो वस्तु मूल्य से मिलती है, वह मूल्य से कमजोर होती है. इसलिए कोई कहे कि मेरा चेला बनो तो मैं  बात बताउँगा, वहां हाथ जोड़ देना चाहिए. समझ लेना चाहिए कि कोई कालनेमि है.! नकली गुरु बने हुए कालनेमि राक्षस ने हनुमान जी से कहा था----
   सर मज्जन करि आतुर आवहु!दिच्छा देऊँ ज्ञान जेहिं पावहु !!
यह प्रसंग है राक्षस कालनेमि द्वारा हनुमान जी को मोहित करने के इरादे से कपट रूप से मुनि का वेश धारण करना (लंका काण्ड दोहा क्रमांक ५७ चौपाई ४ जिसमे हनुमान जी उस मुनि से जल मांगते हैं तो अपना कमंडल देता है और तब हनुमान जी कहते हैं इतने क्या उनकी प्यास बुझेगी तब वह बड़ी ही कुटिलता से हनुमान जी से कहता है "तालाब में स्नान करके तुरंत लौट आओ तो मैं तुम्हे दीक्षा दूं., जिससे तुम ज्ञान प्राप्त करो!! 
                                 उसकी पोल खुलने पर हनुमान जी ने कहा कि पहले गुरु दक्षिणा ले लो, पीछे मन्त्र देना और पूंछ में सिर लपेटकर उसको पछाड़ दिया. 
                                   कहने का अभिप्राय गुरु के बिना मुक्ति नही है यह गलत है. 
जय जोहार........

3 टिप्‍पणियां:

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

ज्ञानवर्धक लेख.
आभार.

ललित शर्मा ने कहा…

जानकारी बर बतावत हंव

वेदव्यास असली नांव कृष्णद्वैपायन रहिसे अउ वो हां एक ठीक स्मृति ग्रंथ वेदांत दर्शन के रचना करे रहिस।

जोहार ले
बने पोस्ट हे

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।