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बुधवार, 7 जुलाई 2010

मंहगाई बढ़ाओ, गरीब व गरीबी दोनो बचाओ

मंहगाई बढ़ाओ, गरीब व गरीबी दोनो बचाओ
मंहगाई की धार बढ़ाओ, गरीबों को हटाओ, क्योंकि हम लोगों को मौज उड़ाना है।
पर नही!!!!!  हट जायेंगे बेबस गरीब, कौन आयेगा हमरे करीब, हमको तो अपना वोट बचाना है।
इनके सहारे ही सत्ता मे आना है।  गरीब औ गरीबी दोनो को हमें बचाना है। 
अभी अभी ब्लॉग में नए पोस्ट की तलाश में थे.  आदरणीय उदय श्याम जी कोरी की मंहगाई पर लिखी  कविता पर नजर पड़ी. तुरंत ऊपर लिखी चार पंक्तियाँ घुटने (दिमाग) में बाहर निकलने के लिए  दस्तक देने लगी. सोचा चिपका दिया जाय. भैया जी चिपकाई दिए हिंयां.. .
जय जोहार......

9 टिप्‍पणियां:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बहुत सही काम किये आप ............यह अगर दिमाग में रह जाती तो बहुत मुश्किल हो सकती थी !!

जय जोहार......

Jandunia ने कहा…

खूबसूरत पोस्ट

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

... जबरदस्त ठोके हो भाई जी ... जय जोहार!!!

आचार्य उदय ने कहा…

भावपूर्ण लेखन।

arvind ने कहा…

bahut badhiya post....joradaar chot vyavastha par.

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

जय हो स्‍वामी जी की. अजब गजब विचार के लिए धन्‍यवाद भईया. जय जोहार.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

Saarthak vyangya.

Tarkeshwar Giri ने कहा…

अब गरीबी खत्म होने वाली है, क्योंकि गरीब तो गरीबी के चक्कर मैं मर जायेगा. तो गरीबी कंहा सारे अमीर रहेंगे.

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

आदमी किसी को कुछ देता है तो वह बदले में अपने लिए कुछ ज़रूर चाहता है। कभी तो वह समाज में अपनी ‘छवि निर्माण‘ के लिए लोगों की मदद करता है और कभी अपने मन की संतुष्टि के लिए ऐसा करता है। लोग उसकी वाहवाही करते हैं और ज़रूरतमंद उनके शुक्रगुज़ार होते हैं तो वे भी अपनी मदद में आगे और आगे बढ़ते चले जाते हैं और अगर उन्हें अपनी मदद के बदले में लोगों से ये चीज़ें नहीं मिलतीं तो उनका दिल मुरझा जाता है। उन्हें लगता है कि शायद उन्होंने मदद के लिए ‘सही आदमी‘ चुनने में ग़लती की है। जिस ऐलान के साथ वे पहले किसी की मदद करते हैं, फिर वैसा ही ऐलान करके वे बताते हैं कि अमुक आदमी ‘ग़लत‘ निकला। ऐसा करते हुए वे यह भी नहीं सोचते कि उनके लेख से किसी खुददार के मान को ठेस लग सकती है और जो आदमी पहले ही ‘आत्महत्या के विरूद्ध‘ जंग लड़ रहा हो, वह अपना हौसला हार भी सकता है।
ये लोग अपनी बड़ाई में जीते हैं। शायद इन्हें बुरा लगता है कि ‘मदद‘ के लिए गुहार लगाने वाला उनके साथ खुददारी और बराबरी के साथ बात करने की जुर्रत कैसे कर सकता है ?
दान देने वाला दयालु होता है और जहां दया होती है वहां क्षमा भी ज़रूर होती है। मदद पाने वाले से अगर कोई नामुनासिब बात सरज़द भी हो जाए तब भी उसे क्षमा किया जाना चाहिए। कड़वे हालात में उसके वचन भी कड़वे हो जाएं तो क्या ताज्जुब ?

इसके विपरीत जो लोग अपने रब के सच्चे बन्दे हैं वे अपना बदला भी अपने मालिक से ही चाहते हैं। बदले के दिन पर उनका यक़ीन उन्हें लोगों की तरफ़ से बेनियाज़ कर देता है। वे लोगों की मदद सिर्फ़ इसलिए करते हैं कि मालिक का हुक्म कि ज़रूरतमंदों की मदद की जाए। मालिक ने उनके माल में ज़रूरतमंदों का हक़ मुक़र्रर किया है और वे लोगों को उनका हक़ पहुंचाते हैं। इसके बदले में लोगों से शुक्रगुज़ारी तक नहीं चाहते। वास्तव में अपने रब के नज़्दीक यही लोग नेक और मददगार हैं। यही लोग सच्चे दानी हैं। http://vedquran.blogspot.com/2010/07/charity-anwer-jamal.html