आईए मन की गति से उमड़त-घुमड़ते विचारों के दांव-पेंचों की इस नई दुनिया मे आपका स्वागत है-कृपया टिप्पणी करना ना भुलें-आपकी टिप्पणी से हमारा उत्साह बढता है

रविवार, 27 जून 2010

'ब्लॉगवाणी' विलुप्त हुई, लग नही रहा, हरा भरा सा

(1)
'ब्लॉगवाणी' विलुप्त हुई, लग नही रहा, हरा भरा सा
  आज कलम(मेरी कलम) कुंठित हुई , 
 लिख न पा रहा,  जरा सा.
(2 )
ड्राइंग रूम में बैठ कर देखने लगा दूर दर्शन 
कार्यक्रम चल रहा था जिसमे बच्चों का नृत्य प्रदर्शन 
नृत्य कर रहे थे झूम के, ये छोटे छोटे बच्चे 
विषय 'विषय' था लग रहा, वयस्क भी खा जाएँ गच्चे. 
(3 ) 
युग प्रभाव जो दिख रहा, कम होगा कुछ भी कहना 
चलेगी जिन्दगी यूँ ही, दें इसे चलते रहना 
(4)
चेनल बदले, एन० डी० टी० वी० दिखा, चल रही थी  जनता की अदालत
मुवक्किल थे बाबा रामदेव, दृढ प्रतिज्ञ दिखे  परिवर्तन लाने को,  
 योग-निरोग, अध्यात्म, सत्कर्म समझा रहे थे सवालों के बदौलत 
दोनों कार्यक्रम देखकर, कौंधने लगा  मन में विचार 
क्या सचमुच सच कर पायेंगे, प्रतिज्ञा इनकी साकार 
अर्ध रात्रि जो बीत चुकी, जायेंगे निद्रा देवी की शरण में 
कहते हुए आप सभी को .......जय जोहार.

18 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

हम भी सो ही जाते हैं..दोपहर वाला..जय जोहार!

'उदय' ने कहा…

...bahut khoob !!!

निर्मला कपिला ने कहा…

अपना भी ब्लागवाणी के बिना यही हाल है। मगर ब्लागवाणी ऐसी कि वनवास खत्म ही नही हो रहा। अच्छी लगी रचना, आभार।

aaryan ने कहा…

बेहतरीन

शिवम् मिश्रा ने कहा…

जय जोहार!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सटीक लिखा है...

रौशन जसवाल विक्षिप्त ने कहा…

सुन्‍दर विचार है।

वन्दना ने कहा…

बिल्कुल सही कहा।

हमारीवाणी.कॉम ने कहा…

परेशान होना बंद कीजिये, जल्द ही आ रही है हमारीवाणी.

http://hamarivani.com - हिंदी ब्लॉग लेखों का अपना एग्रिगेटर

मनोज कुमार ने कहा…

'ब्लॉगवाणी' विलुप्त हुई, लग नही रहा, हरा भरा सा
आज कलम(मेरी कलम) कुंठित हुई ,
लिख न पा रहा, जरा सा.
आपसे सहमत!

Akhtar Khan Akela ने कहा…

yeh blogvaani kyaa he kyaa iskaa sbke liyen smaan vyvhaar he. akhtar khan akela kota rajsthan

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

ब्लॉगवाणी' विलुप्त हुई, लग नही रहा, हरा भरा सा
आज कलम(मेरी कलम) कुंठित हुई ,
लिख न पा रहा, जरा सा.

hamein to aaj hi pta chla ....behad afsos janak ....kisi ka bhi jana bura to lagta hi hai .....!!

अजय कुमार झा ने कहा…

सच कहा आपने ............जय जोहार

सत्य गौतम ने कहा…

मेरा नाम शम्बूक है।"
शम्बूक की बात सुनकर रामचन्द्र ने म्यान से तलवार निकालकर उसका सिर काट डाला। जब इन्द्र आदि देवताओं ने महाँ आकर उनकी प्रशंसा की तो श्रीराम बोले, "यदि आप मेरे कार्य को उचित समझते हैं तो उस ब्राह्मण के मृतक पुत्र को जीवित कर दीजिये।" राम के अनुरोध को स्वीकार कर इन्द्र ने विप्र पुत्र को तत्काल जीवित कर दिया। http://hindugranth.blogspot.com/

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

वाह्! क्या खूब कविता रची है.....
सचमुच ब्लागवाणी के बिना तो ब्लागिंग एकदम से नीरस हो चुकी है.

ललित शर्मा ने कहा…

नाईस

माधव ने कहा…

nice

शरद कोकास ने कहा…

अच्छा है ।