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सोमवार, 21 जून 2010

घुरुवा के दिन घलो बहुरथे

घुरुवा के दिन घलो बहुरथे 
 
ऊपर दिखत हे तउन फ़ोटू माँ दू ठन हा "घुरुवा" के आय अउ एक ठन हा अइसे  बस्ती के, जेन ला  "घुरुवा" च केहे जा सकथे. हमन देखे होबो अउ अनुभव घलो करे होबो के गाँव मा "घुरुवा" के का महत्त्व रहै.  पहिली अतेक आधुनिकता के ज़माना नइ रहिसे.  माटी के घर माँ रहन अउ माटी च के खपरा (भट्ठी मा पका के बनाये) के रहै छान्ही. घर माँ खूब गाय भैंसी पालें. घर ला बने गाय अउ भइन्स के गोबर मा लीपें.  उही गोबर ले छेना थोपें. अउ छेना(कंडा)  के  आगी मा चुल्हा माँ भोजन रान्धें.  पहिली आज कस कचरा फेंके के पलास्टिक के डब्बा उब्बा(जेन ला आज डस्ट बिन कथें) के उपयोग नइ होवत रहिस. घर ले थोर किन दुरिहा मा कचरा ला फ़ेंक देत रहिन हे.  ओमा चाहे गोबर होय चाहे अउ कांही कुछु. कुल मिला के गंदगी रहै. वैसे गोबरे च ला कुढ़ोवें. अउ एखरे ढेर ला कहैं "घुरुवा". गोबर के ये ढेर हा खेती बर अब्बड़ फायदा के चीज रहै. एला कथें गोबर खातू.  एखरो किम्मत रखें जी जेखर "घुरुवा" रहै ओ मन. खेती किसानी के दिन मा इन घुरुवन के बहुत डिमांड रहै. इन्खरो दिन हा फिर जाय अउ घुरुवा के मालिक के ओखर लेवैया के घलो. जम्मो  बर फायदेमंद रहै.  एक बात अउ ये घुरवा के लेवैया ला कचरा के ढेर माँ कांही कीमती चीज मिल गे त झन पूछ. मिले के संभावना बिलकुल रथे च. त ये तो होईस घुरुवा के गोठ.
                                   हमर देश माँ ओइसने एक तबका अइसे हे के  झुग्गी झोपड़ी मा कइसनो करके अपन गुजर बसर करत हे. एक लाँघन दू फरहार करके रहत हे. इहों कभू कभू होनहार लइका निकल जाथे जउन हा कंडिल (लालटेन) अउ चिमनी के अंजोर मा, अउ नही त सड़क मा लगे खम्भा के लाईट के अंजोर माँ पढ़ लिख के अतेक बड़े आदमी बन जाथे के ओखर पूरा घर परिवार तर जाथे. अउ दूसर मन तहां ले केहे ल धर लेथें "घुरुवा के दिन बहुरगे" कहिके.  मैं अपन एक संगवारी ल देखे हंव. ओखर सियान (ददा) हा ठेला चला के ओला पढ़ाइस. आज ओ हा टेलीफोन विभाग मा बने नौकरी करत हे. अपन परिवार ला चलावत हे. बहुत हुसियार रहै. गणित मा ८०-९० प्रतिशत नंबर लावे. ओखर इंजीनियरिंग कालेज मा घलो होगे रहिसे सिलेक्शन. फेर इही रुपिया पैसा के परबन्ध अउ पहिली कालेज मा रेकिंग के नाव मा होअइया मार पीट के डर माँ बिचारा पढ़ नई पईस. सार चीज जउन केहे चाहत हौं वो आय "कमल हा कीचड़ माँ ही खिलथे.  घुरुवा घलो उपयोगी होथे कभू कभू.  आप सबो के समझ आवै कहिके अलकरहा भाखा के मायने घलो लिख देथौं:-
                                                       लालटेन/लेम्प के अंजोर  मा पढ़त

घुरुवा = कचरा/गोबर के ढेर                                                              
अनुभव घलो करे होबो = अनुभव किये होंगे.
अतेक = इतना  
खपरा = खपरैल 
भोजन रान्धें = खाना बनाते थे. (कूकिंग) 
खम्भा के लाईट के अंजोर माँ = सड़क में लगे खम्बे के  लाईट के उजाले में.
इन्खरो दिन हा फिर जाय = इनकी भी तकदीर चमक जाती थी या इनमे भी बदलाव आ जाता था. 
एक लाँघन दू फरहार करके रहत हे = दो जून की रोटी भी नसीब न हो पाना. एक जून खा रहे हैं तो दो दिन उपवास .
"घुरुवा के दिन बहुरगे"  = कूड़े के ढेर के दिन भी बदल गए याने इनकी भी  तकदीर चमक गयी. 
वैसे ज्यादा कठिन नही है. समझ में आ ही जावेगी. 
जय जोहार........

12 टिप्‍पणियां:

युवराज गजपाल ने कहा…

Suryakant ji,

aaap agar mor ye tippani la dekhahu to jarur reply karahu mor gmail gajpaly@gmail.com me ..
ek jhan aisan gareeb laika la me ha sahyog karat haabon .. vo ha abhi Engineering ke padhayee kar dare he ..
me ha gareeb auv honhaar laika man la aaghu badhat dekhana chahat hon ..
je laika ka aap ullekh kare haabon vola agar abhi kuchhu kisam ke jarurat hohi ta mola jarur batahu.. ya fir aise koi auv laika hohi je ha gareebi ke vajah se padhayee nai kar paavat he te mor taraf se pura sahayog duhun ..

शिवम् मिश्रा ने कहा…

लीजिये जनाब हम आ गए .............अब तो आप की शिकायत दूर हो गयी होगी !
रहा सवाल पोस्ट का तो साहब ............अब आपके संग यारी करनी है तो यह बोली सीखनी तो होगी ही सो धीरे धीरे कोशिश जारी है | अगर यह कहू कि सब समझ में आ गया तो झूट होगा पर हाँ....... भाव समझ गया पूरी पोस्ट का ! आपने सच कहा अगर ऐसे लोग जीवन में कुछ कर जाते है तो अक्सर यही कहावत कही जाती है ...........'घूरे के दिन फिर गए!'
जय जोहार........

शिवम् मिश्रा ने कहा…

कभी मेरे ब्लॉग पर भी दर्शन दें , प्रभु ! असीम अनुकम्पा होगी आपकी !

Udan Tashtari ने कहा…

इस भाषा में पढने का आनन्द ही अलग है..आभार.

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

मोर मयारू घुरूवा. बइसाख मा अधरतिया उठ के गाडा म खातू भर के खेत म पलई के दिन सुरता आगे.

'उदय' ने कहा…

...जबरदस्त पोस्ट !!!!

'उदय' ने कहा…

...ऎ ले भुला गे रहेंव .... जय जोहार!!!

कौशल तिवारी 'मयूख' ने कहा…

yahi aas m hamu chalat han

आचार्य जी ने कहा…

छत्तीसगढ की भाषा बहुत सुन्दर।

राजकुमार सोनी ने कहा…

भाई अपनी बोली का आनन्द ही कुछ और है। ऊपर युवराज गजपाल की टिप्पणी है... क्या युवराज ऋषि गजपाल के परिवार से है क्या जरा पूछकर बताइएगा। ऋषि प्रसिद्घ कथाकार है और मेरा मित्र है भाई।

ललित शर्मा ने कहा…

बहुरथे ददा घुरवा के दिन हां

अगोरत हन कब बहुरही त?

पचासा नाहकत हे घुरवा हां घुरवाच हे

जोहार ले

शरद कोकास ने कहा…

बने कहीस भैया