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मंगलवार, 15 जून 2010

जोश में होश नहीं रहता

जोश में होश नहीं रहता 
होश में जोश नहीं रहता
मानुस तन है, बुद्धि है, विवेक है,
गूंगा भी खामोश नहीं रहता
कहा गया है,
"जल्दी में लद्दी (कीचड)
औ धीर में खीर
अपने ही लोग, और अपनों के
कारण, पहुँचती है/पहुंचाते हैं,
मन को पीर
मित्रों, मेरा कतई यह उद्देश्य नहीं था कि किसी को दुःख पहुंचाऊं. आप सभी से माफी चाहता हूँ. स्वाभाविक है, जैसा कि कभी कभी मन में प्रतिस्पर्धा के भाव आ जाते हैं, यह दृश्य उपस्थित हुआ. जिन लोगों के कारण इस मुकाम तक पंहुचा उन्ही को ठेस पहुंचाऊं, "पोंसे डिंगरा खरही मा आगी लगाय" ऐसा हो नहीं सकता. मन अच्छा नहीं लग रहा है. आशा है माफ़ी मिल ही जायेगी. 
जय जोहार.......  

9 टिप्‍पणियां:

'उदय' ने कहा…

.... बम फ़टाका बम फ़टाका बम फ़टाका बम ... स्वागतम ...स्वागतम ...स्वागतम ... नई पोस्ट का स्वागतम ...!!!

'उदय' ने कहा…

... इस पोस्ट को भी चढा दें क्या !!!!

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

उदय भाई ब्रेक लगा गा। बेकार के चढाये उतारे के उदिम झन कर घुरुवा मा यदि एकाध चढाये के लाईक मिल जाय त ओही ल चढाबे। "घुरुवा के दिन घलो बहुरथे"।

दिलीप ने कहा…

hamein to kuch pata hi nahi bas aapko wapas dekhachcha laga...jay johaar

Udan Tashtari ने कहा…

सही है!! जय जोहार!

arvind ने कहा…

aapko vaapas dekhkar kafi acchhaa lagaa. जय जोहार!

ललित शर्मा ने कहा…

बने बने गा गौंटिया
रिस ला छोड़ अऊ बुलागिंग ला करव
गोठ क्लियर होगे हे
संसो के कोई बात नई हे

जोहार ले

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

जय जोहार,
टंकी से वापस लौटने पर पुन: स्‍वागत.

मेरे कारण आपके मन को पीर पहुची इसके लिए क्षमा भईया.

इस ब्‍लॉग पर स्वामी बाबा ललितानंद तीर्थ जी का आर्शिवाद बना रहे, उमड़त घुमड़त विचारों का प्रवाह बहता रहे.

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

भाई सन्जीव, आप तो मेरे लिये सन्जीवनी बूटी हैं। यहां पर मुझे प्रतिस्थापित करने का श्रेय भी आपको जाता है। अतः मै शुरु मे ही माफ़ी माँग चुका हूँ। शर्मिन्दा झन कर गा। असल मे गलतफ़हमी के शिकार हो गये थे हम। सब चीज ल अपन ऊपर ले लेथौ।