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गुरुवार, 11 मार्च 2010

वाह रे मोर छत्तीसगढ़ के भुइंया

 वाह रे मोर छत्तीसगढ़ के भुइंया का का नई हवे तोर गरभ मा
खनिज सम्पदा ले लेके साग भाजी के अनेको परकार;
ओमा एक परकार  के नाव हे घुइंया

रत्न गर्भा इस धरती ने वाकई क्या क्या बहुमूल्य चीजें प्रदान नहीं किया है.  खनिज पदार्थों से लेकर शाक सब्जी, अनाज आदि आदि. इसे कुदरत का करिश्मा कहें या उस परम सत्ता की रचना. मानव भी इस रत्न गर्भा वसुंधरा की गोद में खेलने, अपने विवेक व बुद्धि से नए नए आविष्कार करने, यदि दुर्बुद्धि का शिकार हुआ तो अपनी हरकतों से "भले जन मानस " द्वारा  धरती का बोझ समझा जाने वाला प्राणी है. जिसकी जैसी सोच, वैसी ही उसकी हरकतें चलती हैं भले ही वह कितना ग्यानी हो कहने को स्वयं को सरल कहता हो "अभिमान" का अंश उसमे समा ही जाता है. और जहां यह अभिमान रुपी दुर्गुण का आगमन हुआ फिर दूसरे उसके सामने तुच्छ लगने लगते हैं.   आलोचना करने लग जाते हैं, समीक्षा नहीं.  आलोचना इस वजह से नहीं कि सामने वाला अपनी गलतियों को सुधार ले वरन आलोचना का मुख्य उद्देश्य अपने से नीचा दिखाना होता है. वस्तुतः हमारे इस ब्लॉग जगत में कुछ  ऐसा ही दृश्य दिखाई पड़ता है.

                       शाक सब्जी का  जिक्र इसलिए यहाँ किया गया है कि हमारी क्षेत्रीय बोली में एक सब्जी "कोचई" जिसे अरबी, घुइंया भी कहते हैं का उल्लेख टिपण्णी के माध्यम से हुआ है. यह सब्जी  कम से कम हमारे  इस छत्तीसगढ़ प्रांत मे मठे  व भिन्डी जिसे हम यहाँ क्षेत्रीय बोली में रमकेरिया/ रमकलिया   कहते हैं. के साथ काफी चाव से खाई जाती है.  इसी तारतम्य में हमारे नानाजी के सखा याने सखा नानाजी की एक बात जरूर याद आती है कि;
यदि किसी से हो गयी हो आपकी दुश्मनी, रखें न अपनी इच्छा अधूरी
खिला दें उन्हें  भिन्डी अरबी की मठे वाली सब्जी और गरम गरम पूरी
देखें जनाब के पेट में कैसे मचती है हलचल, होता है उदार व्याधि का शिकार
क्यों?  अच्छा है न दुश्मनों से बदला लेने का अच्छा नुस्खा यार
और अंत में  हम कहना नहीं भूलेंगे:........" जय जोहार" ..........








4 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

यदि किसी से हो गयी हो आपकी दुश्मनी, रखें न अपनी इच्छा अधूरी
खिला दें उन्हें भिन्डी अरबी की मठे वाली सब्जी और गरम गरम पूरी
बहुत अच्छा लगा।

ललित शर्मा ने कहा…

बने रंधवा कोचाई-
अउ कौन दुस्मन खोजे हस तेला खवा।
रमकेलिया के संग मा।
ओखर उद्धार हो जाही।
अउ नई होही ता संग मे
डार दे इच्छा भेदी।
ओखर सरी भेद खुल जाही।
हा हा हा बोकरा कस नरियाही।
जय हो

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

जय जोहार हे भईया, रंधवा के रमकेरिया कोंचई अउ झारा झारा नेवता नेउतबोन बिलागर मन ला. हा हा हा.

जी.के. अवधिया ने कहा…

वाह गुप्ता जी, अमटहा रमकेरिया के सुरता देवा के मुहु में पानी ला दिये तैं हा तो!