आईए मन की गति से उमड़त-घुमड़ते विचारों के दांव-पेंचों की इस नई दुनिया मे आपका स्वागत है-कृपया टिप्पणी करना ना भुलें-आपकी टिप्पणी से हमारा उत्साह बढता है

शनिवार, 27 मार्च 2010

इर्ष्या से विनाश नहीं विकास

 किसी भी वस्तु के जलने से उर्जा प्राप्त होती है, यह विज्ञान कहता है. चाहे कोई उपस्कर जले चाहे किसी का दिल जले चाहे किसी का ............... जले. लेकिन उर्जा अवश्य ही प्राप्त होती है. जलने का सम्बन्ध आग से है जहाँ आग जलेगी वहां धुआं जरूर होगा और जहाँ धुआं होगा वहां उबलना भी होगा. अब कौन से वस्तु कितने डिग्री सेंटीग्रेड पर उबलेगी यह उस वस्तु की तासीर पर निर्भर रहती है. भैंस जब गोबर करती है वहां पर भी यह नियम लागू होता है. अब कितनी ऊष्मा उस गोबर में पैदा हो रही है. अब गोबर में कीड़े पड़ते हैं कीड़ों का जन्म इस उष्मा  के कारण होता है. इस तरह जलना एक नई श्रृष्टि को जन्म देता है. फिर उस गोबर में कुछ और कीड़े पैदा होते हैं लेकिन गोबर में पहले से  मौजूद कीड़े स्थापित हो चुके होते हैं इसलिए वे नए कीड़ों को स्थान  नहीं देते. नए कीड़े असुरक्षा की भावना से ग्रसित हो जाते हैं आपस में तालमेल बिठा कर घेटो का निर्माण करते हैं. ये कीड़े बड़े कीड़ों के घेटो में   फंस जाते हैं. न उगलते बनता न निगलते बनता है. गोबर में मौजूद अत्यधिक उष्मा  से  स्थापित कीड़ों का क्षरण होता है और नव पदार्पित कीड़ों का विकास होता है. इस तरह एक का विनाश   होना और एक का विकास होना प्रकृति का नियम है. इस तरह एक मोहल्ले के कुकुर  संगठित होते हैं यदि उस मोहल्ले में कोई नया कुकुर आता है तो उसे भौंक कर भगाने की कोशिश करते हैं. पर नए कुकुर की भी कोई इज्जत और अस्तित्व है. उसमे अतिरिक्त उर्जा है इसलिए वह उस मोहल्ले में आया है. लेकिन पहले से स्थापित कुकुर उसका महत्त्व कम करके आंकते हैं. जब तक ऊँट पहाड़ नई चढ़े तब तक भरवा नई टूटे. इसी तरह नए कुकुर का राज स्थापित हो जाता है.  
                   जलन के कारण ईर्ष्या पैदा होती है और यह ईर्ष्या स्थायी हो जाय तो बैर में परिणित हो जाती है है और यही परिणति विनाश का कारण होती है.  बैर जो है क्रोध से उपजता है और इसी क्रोध से कुरुक्षेत्र का मैदान सजता है.  कृष्ण जो है धर्म का साथ देते हैं इसलिए कि उनके दिल में अधर्म के प्रति अग्नि सुलगती है. अग्नि की ज्वालायें क्रोध का अंतिम रूप है लेकिन क्रोध हमेशा विनाशकारी होता है.  कृष्ण का क्रोध कुरुक्षेत्र के मैदान में विनाशकारी नहीं है यह क्रोध विकास करना चाहता है इसलिए इसे शास्त्रों में मन्यु कहा गया है जहाँ क्रोध विनाश  करता है वहीँ मन्यु विकास करता है इसलिए जलन से पैदा हुई ईर्ष्या को हम क्रोध बनाकर न रखें इसे मन्यु में परिवर्तित करें जिससे धर्म ध्वज और धरा कि रक्षा हो. सबको एक साइज  समझा जाय. कल सुबह ट्रेन पकड़ने मै जा रहा था स्टेशन पहुँचने पर मै देखा २०-२५ कुकुर  सामने में खड़े  २ कुकुर को गरिया रहे थे एक घेटो दुसरे घेटो का निर्माण सहन नहीं कर पा रहा था लेकिन वो कुकुर भी डट कर तैयार खड़े थे. अपने आप को स्थापित करने की चाह लिए निर्भय होकर अकबर के साम्राज्य में...............
जय जोहार  जय छत्तीसगढ़    

4 टिप्‍पणियां:

Suman ने कहा…

nice

Suman ने कहा…

nice

वाणी गीत ने कहा…

ईर्ष्या विनाश नहीं विकास भी करती है ...गूढ़ ज्ञान प्राप्त हुआ ...!!

जी.के. अवधिया ने कहा…

वाह गुप्ता जी, जै हो आपकी! आपको पढ़ कर पहली बार ज्ञात हुआ कि ईर्ष्या का सकारात्मक पहलू भी है।