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बुधवार, 31 मार्च 2010

चिंतन देहाती नहीं है

लिव इन रिलेशन शिप - एक देहाती चिंतन
चिंतन देहाती नहीं है, 
कटु  सत्य  है यह,
पाश्चात्य की यह संस्कृति  
उपजी  है  इस   मंशा   के   साथ 
कि   वासना   की  पूर्ती हेत              
समीप   सहज    देह   आती   नहीं   है  
मर्यादा  के  आहाते  के भीतर  रह 
बिताने  को  जिन्दगी  की  विधा 
सहज  ही  किसी  को  भाती  नहीं है
और  सत्य  कहता  हूँ 
मेरी यह सोच किसी के लिए ठकुरसुहाती  नहीं है.

4 टिप्‍पणियां:

कृष्ण मुरारी प्रसाद ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति......
http://laddoospeaks.blogspot.com/

मनोज कुमार ने कहा…

रचना अच्छी लगी ।

Jandunia ने कहा…

लिव-इन रिलेशन पर अच्छी कविता है।

ललित शर्मा ने कहा…

जय हो
बहुत अच्छी कविता है
ठकुरसुहाती नही है
कवि कह जाता है पर
सबको समझ आती नही है