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रविवार, 7 मार्च 2010

कृष्ण को क्या आप अपहरण भूषण नहीं कहेंगे

व्यक्ति का आचरण कैसा है, इस बात पर तत्काल ध्यान जाता है यदि उस व्यक्ति के द्वारा कुछ सारगर्भित बातें कही या लिखी जाती हैं. वह इसलिए कि उस  व्यक्ति विशेष के  बारे में उन  तथ्यों  को बटोरकर, जिसमे प्रथमदृष्टया मर्यादा के विपरीत लगनेवाली,   अश्लील प्रतीत होने वाली, बातें होती हैं,  संचार माध्यम से अथवा समाचार पत्रों के माध्यम से खूब प्रचारित प्रसारित किया जाता है.  उसकी  गहराई या दर्शन में नहीं जाया जाता. मगर यदि इनके विचारों को किताबों में सहेजकर प्रकाशित किया जाता है तब थोडा सोचना पड़ता है कि अरे इनके विचार तो एकदम उचित लगते हैं, अनुकरणीय हैं. यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं किसी सम्प्रदाय, संत महात्मा, प्रवचनकर्ता का न तो एकदम से प्रशंसक हूँ न विरोधी पर उनके द्वारा लिखी बातें मुझे अच्छी लगती हैं और लगता है कि इस ब्लॉग लेखन के जरिये उसे व्यक्त करूं. इसी कड़ी में "ओशो" के संस्थापक आचार्य रजनीश जी की किताब " कृष्ण स्मृति " से यह अंश उद्धृत कर्ता हूँ; 
प्रश्न किया जाता है आचार्यजी से "कृष्ण को क्या आप अपहरण भूषण  नहीं कहेंगे खुद ने तो रुक्मिणी का अपहरण किया ही था अर्जुन को भी बहन सुभद्रा का अपहरण करने को लालायित करते हैं." समाधान मिलता है; 
"असल में समाज की व्यवस्थाएं जब बदल जाती हैं, तो बहुत सी बातें बेतुकी हो जाती हैं. एक युग था जब किसी स्त्री का अपहरण न किया जाय, तो उसका एक ही मतलब था की उस स्त्री को किसी ने भी नहीं चाहा. एक युग था जब किसी स्त्री का अपहरण न किया जाए, तो उसका मतलब था कि उसकी कुरूपता निश्चित है . एक युग था जब सौन्दर्य का सम्मान अपहरण था. और अब वह युग नहीं है.  लेकिन आज भी अगर यूनिवर्सिटी कैम्पस में से किसी लड़की को कोई भी धक्का नहीं मारता तो उसके दुःख का कोई अंत नहीं है. कोई अंत नहीं है उसके दुःख का. और जब कोई लड़की आकर दुःख प्रकट करती है उसे बहुत धक्के मारे जा रहे हैं, तब उसके चेहरे को गौर से देखें, उसके रस का कोई अंत नहीं है. स्त्री चाहती रही है कि कोई अपहरण करने वाला मिले. कोई उसे इतना चाहे कि चुराना मजबूरी, जरूरी हो जाय.  कोई उसे इतना चाहे कि मांगे ही  नहीं चुराने को तैयार हो जाय. ......"  
" हमें ख्याल नहीं है आज भी -- युग तो बदल जाते हैं लेकिन कुछ ढाँचे चलते  चले जाते हैं... आज भी  जिसे हम  बरात कहते हैं किसी दिन वे प्रेमी के साथ गए हुए सैनिक थे. और जैसे आज हम घोड़े पर बिठाते हैं दुल्हे को ... दूल्हे को घोड़े पर बैठना बिलकुल बेमानी हैं, कोई मतलब नहीं है -- और एक छुरी भी लटका देते हैं उसके बगल में वह कभी तलवार थी और कभी वह घोड़ा किसी को चुराने गया था और कुछ साथी थे उसके जो उसके साथ गये थे वह बरात थी. और आज भी आपको पता होगा कि जब बरात आती है तो लड़की के घरवाली स्त्रियाँ  गालियाँ देना शुरू करती हैं.  कभी सोचा कि वे गालियाँ क्यों देती हैं? वह जिसके घर की लड़की चुराई जा रही होगी, उसके घर से गालियाँ दी गई  होंगी. लेकिन अब काहे के लिए गालियाँ दे रही हैं , वे खुद ही इंतजाम किए हैं सब.  आज भी लड़की का पिता झुकता है, आज भी. अब कोई कारण नहीं है लड़की के पिता  के झुकने का. कभी उसे झुकना पड़ा था. कभी जो उसे छीन  कर  ले जाता था, जो विजेता होता था, उसके सामने झुक जाना पड़ा था. वह कभी के नियम थे, जो अब भी सरकते हुए मुर्दा हालत में चलते चले जाते हैं...................."
वर्तमान में इसकी प्रासंगिकता पर विचार चाहूँगा.....
जय जोहार





6 टिप्‍पणियां:

Suman ने कहा…

nice

L.R.Gandhi ने कहा…

अपहरण' 'हरण' और वरन में अंतर है -कृषण और अर्जुन ने वरन किया था न की हरण ।

शरद कोकास ने कहा…

"पद्म 'भूषण से आगे की पदवी है क्या ?

Udan Tashtari ने कहा…

ये नई पदवी...

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

nice

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

श्री गांधी जी को धन्यवाद
"हरण नहीं वरण" के लिए
यही तो ... इसी प्रकार विचार कहें या
सटीक उत्तर प्राप्त हो जाता है.