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सोमवार, 8 मार्च 2010

बिगड़ते बिगड़ते रह गयी हमारी सूरत

शासकीय सेवा का एक आवश्यक अंग
स्थानांतरण में जगह - जगह की तैनाती
यदि गृह नगर- कर्त्तव्य स्थल की हो दूरी न्यूनतम
रेल- सवारी ही भाती
है कर्तव्य स्थल  हमारा शहर राजनांदगांव
देर हो चुकी थी घर से निकलने में,
पहुँच पाए हम   दुर्ग स्टेशन दौड़ के उलटे पाँव
पता नहीं आज कैसे हो गए थे हम मदहोश
कौन सी गाड़ी कहाँ रूकती है,
यह पता करने का हमें नहीं रहा होश
प्लेट फॉर्म आ पहुंची झट से गाड़ी "पुरी - सूरत"
पासधारी होने के नाते बैठ गए गाड़ी में बनके बिलकुल मूरत
पार हुई गाड़ी शहर से, अगला स्टेशन भी पार किया
आगे क्या होगा सोच के बंधू धड़कने लगा था हमारा जिया (ज्यादा नहीं थोड़ा थोड़ा)
इस घटना के हम ही केवल भागीदार थे न  अकेले
साथ बैठे न्यायाधीश (श्रम न्यायालय) संग हँसते हँसते झेले
शहर दुर्ग से गोंदिया नगरी तक आया न कोई टी टी आई
पहुँच के गोंदिया बुकिंग काउंटर पर ही हमारी जान में जान आ पाई
ले टिकट गृह नगर का, चालु हुआ हमारा फिर से सफ़र
बॉस ने खटखटाया मोबाइल, बोले उतरना है कर्त्तव्य स्थल
एक जरूरी काम है, जल्दी घर  पहुँचने का हमारा  प्रोग्राम हुआ ऐसा  सिफर
खैर सफ़र कटा बिन बाधा के, हमने गुनगुनाया,  वाह रे गाड़ी "पुरी - सूरत"
प्रभु कृपा असीम है हम पर, बिगड़ते बिगड़ते रह गयी हमारी सूरत.

                            खैर जिन्दगी में ऐसी घटना अचानक घट जाती है. सबसे बड़ा संयोग यह रहा कि इस घटना की वजह से मित्रों की सूची में  एक नए मित्र का नाम जुड़ गया, वह भी  ओहदे में  बड़े, व्यक्ति का.  बात यहीं ख़तम नहीं हुई. "जनशताब्दी" में जब बैठे तो हमारे सामने ही एक 22 वर्षीय युवक, नैवेद्य शर्मा,  जिसने अपने आप को  सनदी लेखा पाल (चार्टर्ड एकाउंटेंट )की योग्यता हासिल करने के  प्रयास में लगा होना बताया, से परिचय हुआ. उनके पिताश्री के बारे पूछने पर ज्ञात हुआ क़ि बालाघाट निवासी  श्री सुधाकर शर्मा उनके पिता हैं. हमें उनके बारे में कुछ भी ज्ञात न था. किन्तु इस घटना के दूसरे साक्षी माननीय न्यायाधीश महोदय श्री अरुण चौकसे जी  के वे मित्र निकले. नेवैद्य ने हमें अपने पिता के कविताओं की एक किताब भेंट की. किताब का नाम है "गौरव - गान" कविता संग्रह. पढेंगे फुर्सत से. श्री शर्मा जी के बारे में इस किताब में लिखा गया है कि वे भी एक अच्छे माने हुए साहित्यकार, कवि हैं.  उनकी एक और किताब "गंगा का उद्गम" का भी जिक्र है.  उन्हें डॉ० शिवमंगल सिंह "सुमन" एवं  प्रसिद्ध कवियत्री श्रीमती सुभद्रा कुमारी  चौहान का भी सानिध्य प्राप्त रहा है. नवभारत टाइम्स, ब्लिट्ज, करंट व नूतन सवेरा जैसे पत्र पत्रिकाओं से कवि-लेखक और प्रखर पत्रकार के रूप में सुधाकर शर्मा की सम्बद्धता लम्बे समय तक रही.  
                           ऐसा बीता आज का दिन.
सभी को मेरा जय जोहार.....  

3 टिप्‍पणियां:

ललित शर्मा ने कहा…

bahut badhiya rahi yatra
thoda thoda hi rakho bhai
jayada mat badho matra.
ab gadi pe padhkar hi
kiya karo yatra.............

johar le
ha ha ha ha:)

शरद कोकास ने कहा…

भई यह तो "लोहे का घर" है जहाँ अपनो से मुलाकात होती है ..या जिनसे मुलाकात होती है वे अपने बन जाते हैं ।

निर्मला कपिला ने कहा…

वाह ये गाडी भी अद्भुत चीज़ है ।यहाँ जिन्दगी के विभिन्न रंग देखने को मिलते हैं अच्छा लगा ये प्रसंग धन्यवाद।