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गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

गए रहंव मैं छुट्टी मा लउटे हौं अभीच्चे

छब्बीस ले लेके अभी तक 
रेलगाड़ी के धक्का खाएन 
खोलेन घर के दुआरी, लागिस 
लउट के बुद्धू घर आयेन
कहाँ गे हमर चैत के अंजोरी के परवां

एला कैसे हमन भुलाएन 
अब्बड नाचत कूदत भैया 
१ जनवरी के नवा साल मनायेन
खैर, जनता के मांग 
फेर जम्मो झन ल दू हज़ार दस के 
गाडा भर बधाई अउ जय जोहार

शनिवार, 26 दिसंबर 2009

आप सभी को नव वर्ष की अग्रिम बधाई

नव वर्ष सबके लिए सुखमय, समृद्धि व वैभव शाली हो, आओ करें प्रार्थना 
उन श्लोकों को, दुहरायें सबके लिए दुआ मांगे समूचे विश्व के लिए 

(१) सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया
     सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माकश्चिद् दुःखभाग्भवेत..


(२) सर्वेषाम स्वतिरभवतु
      सर्वेषाम  शान्तिर्भवतु       
      सर्वेषाम पूर्णं भवतु 
      सर्वेषाम मंगलम भवतु 
      लोकासमस्ता सुखिनो भवन्तु 

और आजकल सर्वमान्य "HAPPY NEW YEAR" 2010


 

समाचार पत्र वाचन (पठन)


भले ही आज दौड़ भाग की जिन्दगी है. विश्व में,  हमारे देश में, राज्य में,  हमारे आस पास क्या हो रहा है क्या होने वाला है खेल कूद की क्या गतिविधियाँ हैं इन सभी चीजों से अवगत होने को प्रत्येक व्यक्ति आतुर रहता है. जानकारी प्राप्त करने के प्रमुख स्रोत तीन तरह के हैं:- (१) समाचार वाचन(समाचार पत्रों द्वारा)  (२) श्रवण (रेडियो समाचार) व (३) दर्शन व श्रवण दोनों (दूर-दर्शन चेनलों द्वारा).  क्या गाँव क्या शहर जहाँ पढ़े  लिखे लोग हैं उनमे सोकर उठते ही (यदि नित्यकर्म से निवृत्त हो जाएँ तो अच्छी बात है) समाचार पत्र वाचन की आदत बन चुकी है. यदि सात बजे तक यदि घर में समाचार पत्र नहीं आया तो बेचैनी लगने लगती है. मैं भी इसका आदी हो चुका हूँ. मैं काफी लम्बे समय से समाचार पत्र "दैनिक भास्कर" का नियमित पाठक हूँ. मुख्य पृष्ठ पर तो सिर्फ शीर्षक ही पढता हूँ. अन्दर के पृष्ठों पर एक नजर डालता हूँ और जहाँ आँखे टिक जाती है उसे पूरी तरह पढता हूँ. खेल समाचार भी. अधिकाँश समाचार "हत्या, "लूट पाट"  "दुर्घटनाओं" और नेताओं द्वारा एक दूसरे पर छींटा कशी से भरा होता है. मेरी सबसे अधिक पसंद का पृष्ठ होता है; "जीवन दर्शन" और "जीने की राह" वाला पृष्ठ. इस शीर्षक के अंतर्गत लिखी बातें जरूर पढता हूँ.  अभी कुछ दिनों से "मैनेजमेंट फंडा" के अंतर्गत नियमित रूप से आर्टिकल लिखा जा रहा है. आज मैंने इसमें  लिखी बातों को भी नज़रअंदाज नहीं किया. इन दोनों शीर्षकों के अंतर्गत छपे हुए सारांश या कहूं हाई लाईट की हुई कुछ लकीरें यहाँ उद्धृत करने का मन हो गया सबके लिए अनुकरणीय समझ कर लिख रहा हूँ;
पढ़ाई को उबाऊ नहीं दिलचस्प बनाएं :- हमें अपने बच्चों को किताबी कीड़ा बनने से बचाने की जरूरत है. आखिर कोई भी विषय सिर्फ अंक हासिल करने के लिए नहीं पढ़ाया जाता. हर विषय हमारे जीवन से कहीं न कहीं जुडा  है जुडाव के बारे में उन्हें समझाना होगा. ( मैनेजमेंट फंडा के अंतर्गत श्री एन रघुरामन जी का आर्टिकल)
 जीवन दर्शन :- (द्वारा पंडित विजयशंकर मेहता ) (१) जब भगवान् ने प्रसाद लेने से किया इंकार: जंगल से लौटते वक़्त एक गाड़ीवान की गाड़ी का पहिया कीचड में फँस गया. तब उसने भगवान् को याद किया. याद इस प्रकार किया कि आर्तनाद करने लगा कहने लगा हे भगवान् मेरी सहायता करो, बस यह गाडी कीचड से बाहर  निकाल दो मैं तुम्हे प्रसाद चढाऊंगा. देवता ने गाड़ीवान कि पुकार सुन ली. वे तत्काल उसके सामने आकर बोले -- क्या चाहते हो बोलो . गाड़ीवान वही बातें दोहराई कि भगवान् मेरी सहायता करो, बस यह गाडी कीचड से बाहर  निकाल दो मैं तुम्हे प्रसाद चढाऊंगा. देवता हंसकर बोले - बैलों को क्यों मार रहे हो? अरे भाई तुम भी पहिये पर जोर लगाओ और बैलों को भी ललकारो, फिर देखो गाडी कीचड से बाहर निकलती है या नहीं? यह सुनते ही गाड़ीवान ने पहिये पर जोर लगाया और बैलों को भी ललकारा तो गाड़ी बाहर आ गई. गाड़ीवान खुश होकर बोला भगवान् आपने मेरी गाड़ी कीचड से  निकाल दी, बस अभी आपको प्रसाद चढ़ाता हूँ. तब देवता ने कहा- मुझे प्रसाद की आवश्यकता नहीं है भाई, मैंने तुम्हारी गाड़ी नहीं  निकाली    तुमने स्वयं यह कार्य किया है. ऐसे व्यक्ति पर मैं प्रसन्ना रहता हूँ और उसकी सहायता करता हूँ. किन्तु जो व्यक्ति दूसरों का मुंह ताकता है वह अपना काम तो बिगाड़ता ही है मेरी  कृपा भी नहीं पाता. 
 यह पढ़ते ही ध्यान आया "हिम्मते मर्द मदद दे खुदा"
 जीने की राह (पंडित विजयशंकर मेहता द्वारा) :- महापुरुष बाहर से अलग पर भीतर से एक जैसे :- "महापुरुष दरअसल एक उर्जा हैं, जो करुना के कारण किसी के भी भीतर जन्म ले लेती है. इसीलिए ध्यान रखें कि जब हमारे भीतर जब ऐसी उर्जा आये या उसका जन्म हो तो हम सावधान रहें और उसे पकड़ लें" 
ऐसे रोज कई शिक्षाप्रद  बातें लिखी होती हैं. कम से कम पढ़ते समय तो लगता है कि इनका अनुपालन किया जाय. केवल पढ़ते समय ही नहीं यदि किसी समय हम बुरे फंसे होते हैं या कोई गलत कर बैठते हैं तो ये बातें जरूर एक बार कान में सुनाई  पड़ती हैं भले हम उसे माने या न माने. परिणाम भी तदनुसार देखने को मिलता है. 
अरे हाँ इस पृष्ठ पर पत्रकार महोदय श्री प्रीतिश नंदी जी द्वारा "प्रोद्योगिकी के गुलाम" शीर्षक के अंतर्गत लिखी बातें भी पढ़ा. उनके द्वारा लिखा गया है...."मैं शर्मिंदा हूँ कि मुझे अपने पिता की पुण्य तिथि को याद रखने के लिए मोबाइल फ़ोन पर अलार्म लगाना पड़ता है या फिर अपनी शादी की सालगिरह से दो दिन पहले कोई वेबसाइट याद दिलाएगी कि पत्नी को फूल भेजने हैं. खत्म होते इस साल पर स्वयं से एक वादा कर रहा हूँ कि मैं टेक्नोलोजी को अपना गुलाम बनाऊंगा न कि अपने जीवन को टेक्नोलोजी का गुलाम बनने दूंगा".  इस पर टिपण्णी चाहूँगा ........ शुभ रात्रि 

 

 




गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

सर्व धर्म समभाव की धारणा के साथ 
सभी को मैरी क्रिसमस 

ख़तम होईस चुनाव तिहार .... जय गंग


सब सूतथें त मोर बर बिहिनिया होथे. आनी बानी के गोठ हा दुनो दिमाग माँ घुमड़ थे. हमर देश हा तिहार के देश कहाथे. जम्मो धरम के तिहार बार मानथें. वैसे हमर सनातन धर्म माँ तिहार के कमी नई आय. फेर ये सब तिहार ले ऊपर उठके भाई हो सबले बड़े तिहार "चुनाव" के होथे.  अभी झार खंड माँ चुनाव होईस. मध्यप्रदेश  माँ होईस अउ छत्तीसगढ़ माँ स्थानीय निकाय मन के चुनाव आजे ख़तम होईस. लेकिन चुनाव घोषणा होए के बाद के ओ प्रदेश के , ओ शहर के का हालत रथे ओला मोर मुंगेरीलाल के दिमाग माँ एक अलग किसम ले बरनन करे के बिचार उमडीस. मोला सुरता आथे जब मैं पहिली दूसरी माँ पढ़त रेहेंव त बिहिनिया बिहिनिया ले चन्दन चोवा लगाए बसदेव मन हाथ माँ रिंग बरोबर झुनझुना ला हलावत अउ अइसने  गावत "एही रे बेटा सरवन आय...... जय गंग घर दुआरी मा  मांगे बर आवै. सोचथौं के आज चुनाव मा खड़े जन प्रतिनिधि मन दुआरी मा खड़े हे, बसदेव  के जघा मा अउ शुरू होगे हे ....  
आवौं मैं फलाना  पार्टी के उम्मीदवार 
मिलही वोट मोहिच ला तोर 
उम्मीद ले के   
आये हौं तोर द्वार .........जय गंग 
बने जाड परत हे बेटा, कम्बल देहों 
कुकरी देहों सोम रस के भरे भण्डार .... जय गंग 
अतका कही के रेंग दिस 
दूसर दिन हमर एक बाबाजी आइस 
ओहू चालू होगे 
कखरो बात मा तै झन आबे या
गाँव के एक झन मनखे हा

दारू के चक्कर मा अपन मेहरिया के
हाथ पाँव काट के कर दिस ओ बिचारी 
के बेडा पार ........ जय गंग
का जमाना आ गे हे सोचे ला परही
कब तक चलही अइसने











बुधवार, 23 दिसंबर 2009

सुन,, कौआ कान को ले गया, भागे कौए के पीछे हुआ कनपट्टी में दर्द, कहे कान कौन है खीचे

यह सहज मानवीय प्रवृत्ति है कि हम यदि अपने परम विश्वसनीय मित्र से, उस व्यक्ति के बारे में जिसे हम जानते तो हैं पर वह हमारा घनिष्ठ नहीं है, कहीं उसकी बुराइयां या कहें निंदा सुन लें तो हम बिना किसी सबूत  के, बिना परखे सहज ही उसे त्याज्य मान लेते हैं. उसे देखना भी पसंद नहीं करते. दूसरे शब्दों में कहें उसके प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित हो जाते हैं. यह तो मित्र की बात हुई. घर में भी हम किसी के प्रति उसके रहन सहन से,  उसके व्यवहार से  खिन्न हैं अथवा वह घर में बोझ लग रहा हो तो हम अपनी मित्र मंडली में उसके बारे में जितने भी नकारात्मक टिप्पणियां करनी होती है कर देते हैं. हमारी मित्र मंडली भी बिना उसके संग रहे उसके व्यवहार को परखे पूर्वाग्रह से ग्रसित हो उसे हेय  दृष्टि से देख उससे दूर ही रहना चाहती है. किन्तु प्रभु की लीला भी कम नहीं, कभी कभी ऐसी परिस्थिति पैदा कर देता है कि आज जिस व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखा जा रहा था वही व्यक्ति हेय दृष्टि से देखने वाले के लिए भगवान् बन जाता है.  बुरे समय से उबार लेता है और ऐसे ही समय में उसे लगता है कि उसके कान को कोई खीच रहा है  और कह रहा है कि बेवजह उस व्यक्ति के प्रति गन्दी सोच क्यों रख रहा था, मात्र अपने घनिष्ठ मित्र से उसकी बुराई सुन. कभी कभी व्यक्ति पूर्वाग्रह से ग्रसित होने की बीमारी का शिकार स्वामी भक्ति अथवा कहें किसी से प्रगाढ़ प्रेम हो जाने के कारण हो जाता है. हम तो साधारण मनुष्य हैं. भगवान् भी इससे अछूते नहीं रहे. श्री  राम चरित मानस का यह प्रसंग इस बात को साबित करता है --- भगवान श्री राम चन्द्र जी के वनगमन का समाचार सुन भैया भरत और शत्रुघ्न का रानियों सहित,  भगवान् श्री राम चन्द्र जी को   वापस अयोध्या ले जाने के लिए चित्रकूट जाना . श्रिंग्वेरपुर के समीप पहुंचना. निषादराज के मन में विचार उत्पन्न होना कि भरत जी सेना सहित इसलिए आये हैं कि श्री राम चन्द्र जी को मारकर निष्कंटक राज करना चाहते हैं. इतना ही नहीं निषाद राज के द्वारा अपनी जाती के लोगों से भरत जी से यद्ध के लिए तैयार हो जाने के लिए कहना. ढोल बजाकर केवल ललकारने की देरी थी तभी किसी का छींक देना और एक बूढ़े के द्वारा शकुन विचार कर भरत जी से मिलने की सलाह देना और यह विश्वास दिलाना कि भरत जी से लड़ाई नहीं होगी.  इतना होते तक निषाद राज का जोश ठंडा पड़ना और यह सलाह देना कि "जल्दी में काम करके मूर्ख लोग पछताते हैं"  हमारी छत्तीसगढ़ी में भी कहावत है "जल्दी म लद्दी, धीर म खीर" . परिणाम भरत निषाद राज का मिलन और निषाद राज का पछतावा. (अयोध्या कांड  दोहा क्रमांक १८६ से लेकर १९६ तक वैसे तो और आगे तक भी). बात यहीं समाप्त नहीं होती.  लक्ष्मण जी भी इस विचार से अछूते नहीं रहते. उन्हें भी भाई भरत का इस प्रकार रथारूढ़ होकर सैन्य  शक्ति के साथ आना नागवार गुजरता है.  यही धारणा मन में बनती है कि भैया भरत के आने का कारण प्रभु श्रीरामचंद्र जी को मारकर निष्कंटक अयोध्या का राज करना है जैसा कि भरतजी ने प्रभु जी को असहाय समझ इसी  अवसर को उपयुक्त चुना.  कहने का तात्पर्य है कि इस तरह कि चीजें स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति के कारण उत्पन्न होती हैं. ऐसी अवस्था में हमे "जोश में होश"  न त्याग कर गंभीरता से विचार कर लेना चाहिए. कौए कि ओर देखने के बजाय भैया अपने कान ही पकड़ कर देखें कि है कि नहीं..........    सियावर रामचंद्र की जय.. अरे हाँ एक चौपाई को उद्धृत करना चाहूँगा... "चले निषाद जोहारि जोहारी. सूर सकल रन रुचइ रारी.. सुमिरि राम पद पंकज पनही.  भाथीं बांधि चढ़ाइन्हि धनहीं..  इस चौपाई में "जोहारि" और "पनही" का उल्लेख हुआ है. इन्हें हम अपनी छत्तीसगढ़ी बोली में भी प्रयोग क्रमशः अभिवादन(जोहारि) व जूते(पनही)  के लिए करते हैं.
जय जोहार .......

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

ब्लॉग जोर अजमाइए रहके अपने ठौर

आज ब्लॉग जगत ने लोगों में छिपी प्रतिभाओं को उभारने का एक अच्छा  सुनहरा अवसर प्रदान किया है . अतएव कहने की बात नहीं है,हम इसके माध्यम से अपने विचार सहज व सुन्दर ढंग से प्रस्तुत कर सकते हैं. हलकी  फुलकी  मनोरंजक सामग्रियां भी इसमें रखी जा सकती हैं जिसमे हास्य का पुट हो. हमें यदि अपने ब्लॉग जगत में अपना परचम लहराना है तो हमें अपने ठौर को  (तात्पर्य अपने ब्लॉग को ही) अच्छे विचारों वाली सर्व मान्य रचनाओं  से, हंसी के फव्वारों से, और भी जैसा बन पड़े,  (ध्यान रहे कि किसी व्यक्ति विशेष  की भावनाओं को ठेस न पहुंचे) अपनी लेखनी द्वारा और भी सुसज्जित कर लहरा सकते हैं. साथ ही साथ अपने ब्लॉग मित्रों का टिपण्णी के माध्यम से हौसला आफजाई करते हुए. किसी की रचना पढ़कर रचनाकार को ठेस पहुचे ऐसी चीजें टिपण्णी में न लिखी  जाय.  आज  भाई ललित की  रचना "इस बीमारी की कोई दवा हो तो बताएं" के सम्बन्ध में एक टिपण्णी पढने को मिली "आपने  अपना इलाज कहाँ करवाया है" अब इसके बारे में जनता की राय अपेक्षित है.  मैंने तो अपनी राय ऊपर लिख ही दिया है.