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मंगलवार, 9 मार्च 2010

"जीवन नहीं समझना व्यर्थ"

 "जीवन नहीं समझना व्यर्थ"
कल मैंने अपने यात्रा वृत्तांत में श्री सुधाकर शर्मा जी के बारे में जिक्र किया है. उनकी पुस्तक "गौरव गान" से "कविता" के बारे में लिखी कविता को यहाँ प्रस्तुत करना चाहूँगा. भले ही  यह बच्चों के लिए है; शीर्षक है "जीवन नहीं समझना व्यर्थ"
बच्चों; लिखना सीखो कविता
कविता का तुकांत है "सविता"
तुक से तुक जब मिल जाती है 
तब क्या कविता बन जाती है 
अरे; मात्र तुक नहीं मिलाओ 
उसमे भाव--अर्थ कुछ लाओ 
अपने यहाँ  एक हैं चौबे 
चौबे की तुक हो यदि "क्यों बे" 
अब इसमें क्या भव अर्थ है?
भाव-अर्थ बिन लिखा व्यर्थ है" 
कविता में सविता का तेजस
रचो; तुम्हारा  फैलेगा जस 
शब्द सरल हों ऊंचे भाव 
कविता का है यही रचाव 
पंक्ति पंक्ति जब रचो बराबर 
फिर देखो तुम उनको गाकर 
अगर तुक नहीं मिल पाए तो
बात नहीं कुछ बन पाए तो
बच्चों होना नहीं निराश 
रंग लता है सदा प्रयास
तुकों बिना भी  होती कविता 
पर; न बेतुकी होती कविता 
कविता है जीवन का अर्थ 
जीवन नहीं समझना व्यर्थ 
श्री सुधाकर शर्मा जी की पुस्तक "गौरव गान से साभार .......

सोमवार, 8 मार्च 2010

बिगड़ते बिगड़ते रह गयी हमारी सूरत

शासकीय सेवा का एक आवश्यक अंग
स्थानांतरण में जगह - जगह की तैनाती
यदि गृह नगर- कर्त्तव्य स्थल की हो दूरी न्यूनतम
रेल- सवारी ही भाती
है कर्तव्य स्थल  हमारा शहर राजनांदगांव
देर हो चुकी थी घर से निकलने में,
पहुँच पाए हम   दुर्ग स्टेशन दौड़ के उलटे पाँव
पता नहीं आज कैसे हो गए थे हम मदहोश
कौन सी गाड़ी कहाँ रूकती है,
यह पता करने का हमें नहीं रहा होश
प्लेट फॉर्म आ पहुंची झट से गाड़ी "पुरी - सूरत"
पासधारी होने के नाते बैठ गए गाड़ी में बनके बिलकुल मूरत
पार हुई गाड़ी शहर से, अगला स्टेशन भी पार किया
आगे क्या होगा सोच के बंधू धड़कने लगा था हमारा जिया (ज्यादा नहीं थोड़ा थोड़ा)
इस घटना के हम ही केवल भागीदार थे न  अकेले
साथ बैठे न्यायाधीश (श्रम न्यायालय) संग हँसते हँसते झेले
शहर दुर्ग से गोंदिया नगरी तक आया न कोई टी टी आई
पहुँच के गोंदिया बुकिंग काउंटर पर ही हमारी जान में जान आ पाई
ले टिकट गृह नगर का, चालु हुआ हमारा फिर से सफ़र
बॉस ने खटखटाया मोबाइल, बोले उतरना है कर्त्तव्य स्थल
एक जरूरी काम है, जल्दी घर  पहुँचने का हमारा  प्रोग्राम हुआ ऐसा  सिफर
खैर सफ़र कटा बिन बाधा के, हमने गुनगुनाया,  वाह रे गाड़ी "पुरी - सूरत"
प्रभु कृपा असीम है हम पर, बिगड़ते बिगड़ते रह गयी हमारी सूरत.

                            खैर जिन्दगी में ऐसी घटना अचानक घट जाती है. सबसे बड़ा संयोग यह रहा कि इस घटना की वजह से मित्रों की सूची में  एक नए मित्र का नाम जुड़ गया, वह भी  ओहदे में  बड़े, व्यक्ति का.  बात यहीं ख़तम नहीं हुई. "जनशताब्दी" में जब बैठे तो हमारे सामने ही एक 22 वर्षीय युवक, नैवेद्य शर्मा,  जिसने अपने आप को  सनदी लेखा पाल (चार्टर्ड एकाउंटेंट )की योग्यता हासिल करने के  प्रयास में लगा होना बताया, से परिचय हुआ. उनके पिताश्री के बारे पूछने पर ज्ञात हुआ क़ि बालाघाट निवासी  श्री सुधाकर शर्मा उनके पिता हैं. हमें उनके बारे में कुछ भी ज्ञात न था. किन्तु इस घटना के दूसरे साक्षी माननीय न्यायाधीश महोदय श्री अरुण चौकसे जी  के वे मित्र निकले. नेवैद्य ने हमें अपने पिता के कविताओं की एक किताब भेंट की. किताब का नाम है "गौरव - गान" कविता संग्रह. पढेंगे फुर्सत से. श्री शर्मा जी के बारे में इस किताब में लिखा गया है कि वे भी एक अच्छे माने हुए साहित्यकार, कवि हैं.  उनकी एक और किताब "गंगा का उद्गम" का भी जिक्र है.  उन्हें डॉ० शिवमंगल सिंह "सुमन" एवं  प्रसिद्ध कवियत्री श्रीमती सुभद्रा कुमारी  चौहान का भी सानिध्य प्राप्त रहा है. नवभारत टाइम्स, ब्लिट्ज, करंट व नूतन सवेरा जैसे पत्र पत्रिकाओं से कवि-लेखक और प्रखर पत्रकार के रूप में सुधाकर शर्मा की सम्बद्धता लम्बे समय तक रही.  
                           ऐसा बीता आज का दिन.
सभी को मेरा जय जोहार.....  

रविवार, 7 मार्च 2010

कृष्ण को क्या आप अपहरण भूषण नहीं कहेंगे

व्यक्ति का आचरण कैसा है, इस बात पर तत्काल ध्यान जाता है यदि उस व्यक्ति के द्वारा कुछ सारगर्भित बातें कही या लिखी जाती हैं. वह इसलिए कि उस  व्यक्ति विशेष के  बारे में उन  तथ्यों  को बटोरकर, जिसमे प्रथमदृष्टया मर्यादा के विपरीत लगनेवाली,   अश्लील प्रतीत होने वाली, बातें होती हैं,  संचार माध्यम से अथवा समाचार पत्रों के माध्यम से खूब प्रचारित प्रसारित किया जाता है.  उसकी  गहराई या दर्शन में नहीं जाया जाता. मगर यदि इनके विचारों को किताबों में सहेजकर प्रकाशित किया जाता है तब थोडा सोचना पड़ता है कि अरे इनके विचार तो एकदम उचित लगते हैं, अनुकरणीय हैं. यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं किसी सम्प्रदाय, संत महात्मा, प्रवचनकर्ता का न तो एकदम से प्रशंसक हूँ न विरोधी पर उनके द्वारा लिखी बातें मुझे अच्छी लगती हैं और लगता है कि इस ब्लॉग लेखन के जरिये उसे व्यक्त करूं. इसी कड़ी में "ओशो" के संस्थापक आचार्य रजनीश जी की किताब " कृष्ण स्मृति " से यह अंश उद्धृत कर्ता हूँ; 
प्रश्न किया जाता है आचार्यजी से "कृष्ण को क्या आप अपहरण भूषण  नहीं कहेंगे खुद ने तो रुक्मिणी का अपहरण किया ही था अर्जुन को भी बहन सुभद्रा का अपहरण करने को लालायित करते हैं." समाधान मिलता है; 
"असल में समाज की व्यवस्थाएं जब बदल जाती हैं, तो बहुत सी बातें बेतुकी हो जाती हैं. एक युग था जब किसी स्त्री का अपहरण न किया जाय, तो उसका एक ही मतलब था की उस स्त्री को किसी ने भी नहीं चाहा. एक युग था जब किसी स्त्री का अपहरण न किया जाए, तो उसका मतलब था कि उसकी कुरूपता निश्चित है . एक युग था जब सौन्दर्य का सम्मान अपहरण था. और अब वह युग नहीं है.  लेकिन आज भी अगर यूनिवर्सिटी कैम्पस में से किसी लड़की को कोई भी धक्का नहीं मारता तो उसके दुःख का कोई अंत नहीं है. कोई अंत नहीं है उसके दुःख का. और जब कोई लड़की आकर दुःख प्रकट करती है उसे बहुत धक्के मारे जा रहे हैं, तब उसके चेहरे को गौर से देखें, उसके रस का कोई अंत नहीं है. स्त्री चाहती रही है कि कोई अपहरण करने वाला मिले. कोई उसे इतना चाहे कि चुराना मजबूरी, जरूरी हो जाय.  कोई उसे इतना चाहे कि मांगे ही  नहीं चुराने को तैयार हो जाय. ......"  
" हमें ख्याल नहीं है आज भी -- युग तो बदल जाते हैं लेकिन कुछ ढाँचे चलते  चले जाते हैं... आज भी  जिसे हम  बरात कहते हैं किसी दिन वे प्रेमी के साथ गए हुए सैनिक थे. और जैसे आज हम घोड़े पर बिठाते हैं दुल्हे को ... दूल्हे को घोड़े पर बैठना बिलकुल बेमानी हैं, कोई मतलब नहीं है -- और एक छुरी भी लटका देते हैं उसके बगल में वह कभी तलवार थी और कभी वह घोड़ा किसी को चुराने गया था और कुछ साथी थे उसके जो उसके साथ गये थे वह बरात थी. और आज भी आपको पता होगा कि जब बरात आती है तो लड़की के घरवाली स्त्रियाँ  गालियाँ देना शुरू करती हैं.  कभी सोचा कि वे गालियाँ क्यों देती हैं? वह जिसके घर की लड़की चुराई जा रही होगी, उसके घर से गालियाँ दी गई  होंगी. लेकिन अब काहे के लिए गालियाँ दे रही हैं , वे खुद ही इंतजाम किए हैं सब.  आज भी लड़की का पिता झुकता है, आज भी. अब कोई कारण नहीं है लड़की के पिता  के झुकने का. कभी उसे झुकना पड़ा था. कभी जो उसे छीन  कर  ले जाता था, जो विजेता होता था, उसके सामने झुक जाना पड़ा था. वह कभी के नियम थे, जो अब भी सरकते हुए मुर्दा हालत में चलते चले जाते हैं...................."
वर्तमान में इसकी प्रासंगिकता पर विचार चाहूँगा.....
जय जोहार





मंगलवार, 2 मार्च 2010

सबै दिन होत न एक समाना.

एक सन्देश एकदम ब्लैंक मसौदे के रूप सहेजा गया था. क्या करूं कुछ ही समय पहले "हॉकी" देख के यहाँ बैठ गया. आज इस ब्लैंक को आज मिली "हार" से भरा जाना था. मन कहने लगा दो दिन पहले ही, मैच देख के खूब हांकी.आज कैसे रह गया  फांकी.  
भाई सबै दिन होत न एक समाना.  
और अब काफी बदल गया है ज़माना
वैसे तो होते सभी एक दूसरे से सवा सेर  हैं (यहाँ वैसे विरोधी ही सवा सेर लग रहे थे)
किसी दिन ज्यादा भूख नहीं होती, तड़पन में हो जाती है कमी
आलस में भी हो जाते ढेर हैं
लेकिन अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है
लेके सबक इस परिणाम से
हो जाओ चुस्त दुरुस्त
आने वाले मैच में कर दो विरोधी को सुस्त
दर्शक मीडिया दोउ से कहें, इनकी करें न टांग खिचाई
मांगे दुआ इनके लिए,
विश्व कप का  हकदार बने अपना देश ही भाई 

   





 

"नानी याद आ गई"

याद आता है बचपन. जाते थे हम अपने नानाजी के साथ वह पवित्र स्थान जहां प्रतीकात्मक होलिका दहन होता था.  मिलता था वहां उपस्थित सीनियरों और जूनियरों से  बड़ा सौहाद्र और अपनापन.  पर्व का प्रथम प्रहर  रंग  गुलाल से सरोबार रहने में बीतता था. मध्यान्ह  स्नान के बाद  बजरंगबली की पूजा प्रसाद स्वरुप रोंठ (एक पकवान का नाम) चढ़ाया जाता था.  शाम का समय साफ़ सुथरे, वैसे नए कपडे पहनकर जाते थे उस जगह पर  जहां फाग गाया जाता था.इससे पहले नानी जी और दादीजी शक्कर की माला पहनाती थीं  और उनसे कुछ मुद्रा भी मिल जाती  थी.  और मुद्रा का उपयोग हम सनीमा देखने में किया करते थे.  और तो और हम पारंपरिक पकवान इस क्षेत्र का, जिसे क्षेत्रीय बोली में "अनरसा" और "देहरौरी" कहते हैं, मजा लेने से नहीं चूकते थे.  आज हो सकता है हम ही "रिजर्व" नेचर के हो गए हों इस वजह से इन सब चीजों का लाभ न ले पा रहे हों. इन सब बातों की याद हमारे मित्र "शिल्पकार" उर्फ़ ललित शर्मा जी द्वारा पोस्टियाई गई रचना "लाल गुलाल अबीर के छाये हुए हैं रंग पढ़कर  आ गई.  लोगों को कड़े परिश्रम करने में, किसी समस्या से निजात पाने में नानी याद आती है.  मुझे मेरी माता स्वरूपा नानी यूँ ही याद आ गई.  उनको मेरा कोटि कोटि  प्रणाम.

सोमवार, 1 मार्च 2010

हॉकी में हुआ चमत्कार

 भले  न पढ़ पाए सुबह का अखबार 
मालूम तो था कि भारत ने कल हॉकी में, 
विरोधी की एक चलने न दिया,
गोल दागे जम के चार
खेलन को निकले थे होली, बातों बातों में 
मिला हमें यह समाचार
हमारे एक खिलाडी का,
पता नहीं, इरादे तो नहीं कह सकते
हो सकता है, जोश में  विरोधी टीम के किसी को
पड़ गई हो स्टिक की मार 
ताव ही ताव में प्रबंधन ने संगीन मान इसे 
जारी कर फरमान निलंबन का (सीधे तीन  मैच का)
कर दिया उसका बंटाधार 
हार की मार न पचा पाय न विरोधी 
कम से कम इस निर्णय से उनका 
दूर हुआ होगा मन का गुबार 

हमारे देश की टीम के लिए 
"जोश भी हो जश्न भी हो जिद्द हो जीतने की जंग"
की भावना के साथ विजयश्री हासिल करें
विश्व कप लाये  ऐसी कामना के साथ
जय जोहार

हर हाल जिया जाता है (जीना पड़ता है)

 देश का आय व्यय का ब्यौरा याने बजट
कैसे पेश हो सदन में, इन्तेजार रहता है
दूर-दर्शन के हर चेनल को, छपने के लिए
तैयार रहता है हर गजट (अखबार)
न्यूज़ चेनल पर बजट की योजनाओं पर,
टेक्स बढ़ने से बढती मंहगाई पर
चार दिन खूब चलता है चर्चाओं का दौर और होती है  समीक्षा 
कुछ दिन, अरे कुछ दिन क्या कुछ घंटों बाद 
सत्यनारायण की कथा  हो जैसे, कथा समाप्त 
कौन  कहाँ से ले लेते हैं दीक्षा
आटोमेटिक सब कुछ बंद हो जाता है 
जनता बेचारी क्या करे, उससे तो परिस्थितियों को
हर हाल जिया जाता है, हर हाल जिया जाता है. 

कहाँ कहाँ त्यौहार के मौके पर 
मुझे ये सब लिखने को सूझा 
जाने दीजिये अभी मनाएं होली 
और प्रभु से कहें वो सबकी भर दे झोली 
होली की शुभ कामनाओं सहित 
जय जोहार