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शनिवार, 1 मई 2010

क्या ली अपने मन की तलाशी है

"नीयत आपकी साफ़ हो तो खुशियाँ आपकी दासी है 
कर्म आपका सही है तो घर में ही मथुरा काशी  है" 
उपरोक्त पंक्तियाँ मैंने लिखी नहीं है, कार्यालय जाते  वक्त एक ट्रक के पीछे लिखी  मिली . भले ही "स" और "श" का फर्क है तुकबंदी में. पर बात पते की है. वैसे जानते सभी हैं. कोई नई चीज नहीं है. दो टूक बात इस बारे में मेरे दिमाग में आयी कि इन दो पंक्तियों में दो  पंक्तियां और जोड़ दी जावे  तो वर्तमान में जन मानस के लिए  कैसा रहेगा;
विद्वजनो के उपदेश में कैसे शब्दों की नक्काशी है 
प्रवचन सुन हम गद गद होते, 
क्या ली अपने मन की तलाशी है 
तात्पर्य, सभी जगह उपदेशात्मक पंक्तियाँ लिखी रहेंगी हम पढेंगे भी. जहाँ तक अमल में  लाने की बात है वही ढाक के तीन पांत 
जय जोहार.......... 

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

शिक्षा और भिक्षा

एक समय था विद्यार्थी गुरुकुल में विद्यार्जन करता था साथ ही साथ भिक्षा मांगने की भी शिक्षा दी जाती थी चूंकि माँ बाप से विमुख रह विशुद्ध ब्रह्मचर्य आश्रम का अनुपालन करते हुए गुरु की शरण में रह विद्या प्राप्त की जाती थी. यह विद्या प्राप्ति का स्थल गुरुकुल कहलाता था. अपने कार्य के लिए समर्पण और गुरु के प्रति श्रद्धा दोनों ही बातें होती थीं.  आजकल जैसे माँ बाप को शुल्क तो देना नहीं होता था अतएव भोजन हेतु अन्न जुटाने के लिए भिक्षा भी मांगनी पड़ती थी विद्यार्थियों को.  समय बीतता गया, स्वरुप बदलता  गया.  शासन द्वारा बच्चों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान करने के लिए पाठशालाएं, विद्यालय महाविद्यालय खोले गए.  अब तो निजी शैक्षणिक संस्थाएं भी बहुत हैं.   दरअसल मैं अपने पुत्र को भारतीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान  प्रवेश-परीक्षा की तैयारी के लिए कोटा भेजा हूँ. उसको छोटी माता निकल आने के कारण उसे वापस भिलाई लाने   गया था. रात में ही भिलाई पहुंचा.  कोटा में  अनेकों प्रशिक्षण संस्थाएं हैं और सालाना शुल्क भी बढ़िया है.  बस एक विचार मन में उमड़ा उमड़ा ही नहीं घुमड़ते रहा. अभी अभी कार्यालय जाने के पूर्व ही सोचा लिख बैठूं. 
प्राथमिक शाला
माध्यमिक विद्यालय
उच्चतर माध्यमिक विद्यालय
महाविद्यालय
बड़े बड़े प्रशिक्षण संस्थान
इन सबकी ओर जरा दीजिये बारीकी से ध्यान
इनके स्तरों के मुताबिक
बच्चों का होता है अध्ययन
शिक्षकों का अध्यापन
स्तर छोटा है; यदि जुड़ा होता है इनके
आगे शासकीय
शिक्षण प्राप्त करना होता है नाटकीय
यहाँ पाते हैं ऐसी शिक्षा
के बन जाते हैं काबिल, कम से कम मांगने को भिक्षा
वहीँ दूसरी ओर
उच्च स्तरीय निजी शिक्षण/प्रशिक्षण संस्थानो में
भेजे जाते हैं बच्चे,
रईसों के बच्चों के लिए तो ठीक है,
मध्यम वर्गीय का होता है हाल बेहाल
नौबत आ जाती है पालकों के मांगने की भिक्षा
                            लेकिन अब घबराने की कोई बात नहीं है;
कर्ज रुपी भीख  देने को तैयार रहता है हर  बैंक
मालूम है आजकल के होनहार बच्चे
साधारण नहीं असाधारण हैं, हां जी असाधारण हैं
जिन्हें कह सकते हैं आप थिंक टैंक
इनके लिए दी गयी भीख यूँ ही बेकार न जायेगी
सूद सहित बैंक में वापस आएगी
यही नहीं थिंक टैंक अपने मकसद पर खरे उतरकर
करेगा नाम रौशन अपने माँ बाप सहित उस बैंक का
ऊंचाई को छूने के लिए जो बना  "पायदान"   उस थिंक टैंक का
जय  जोहार  ..........

सुत बध सुरति कीन्ह पुनि उपजा हृदय बिषाद

"ॐ श्री गणेशाय नमः"  
"ॐ हं हनुमते नमः"
"कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद 
सुत बध सुरति कीन्ह पुनि उपजा हृदय बिषाद" सियावर रामचंद्र भज जय शरणम"
लंका में हनुमान जी अशोक वाटिका उजाड़ दिए. जिन्होंने  रखवाली करते राक्षसों ने) हनुमान जी को फल खाने से रोका 
उन्हें हनुमान जी ने मार गिराया. श्री राम चन्द्र जी के प्रताप से यह सब लीला हो रही है.  यह संकेत है श्री लंका के महाराजाधिराज रावण के लिए के वह अभी भी अपने अहम् का त्याग कर दे. अनेकों योद्धाओं को रावण ने हनुमान से युद्ध कर  उनका वध करने भेजा, यहाँ तक कि अपने पुत्रों को भी. अक्षय कुमार मारा जाता है.  तत्पश्चात मेघनाद को भेजा जाता है,  जिसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर हनुमान जी को नागपाश से बाँध कर अपने पिता रावण के समक्ष खड़ा किया.  हनुमान जी को देखते ही दुर्वचन कहते हुए रावण हँसता है किन्तु तत्काल पुत्र वध का स्मरण होते ही विषाद में डूब जाता है. उपरोक्त प्रसंग उद्धृत करने के पीछे उद्देश्य यह है कि कोई भी व्यक्ति यदि किसी का नुकसान पहुंचाया हो, भले ही वह बाद में उस नुकसान  के लिए माफी मांग लेता हो, नुकसान को झेले व्यक्ति के लिए वह कभी भी सज्जन नहीं हो सकता. क्षण भर के लिए नुकसान झेले व्यक्ति के मन में उस घटना को याद कर विषाद उत्पन्न होगा ही. 
सियावर रामचंद्र कि जय 
जय जोहार........   

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

फर्स्ट आने का सुख


सोचता हूँ यदि जीवन में यदि प्रतिस्पर्धा न हो तो मज़ा ही क्या?  हम सभी सोचते हैं कि हरेक प्रतिस्पर्धा में अपना स्थान पहला हो. चाहे इसे हंसी के रूप में लें या गंभीरता से. एक वाकया लिख रहा हूँ. कल हमारी,  धर्म-पत्नी जो बैंक में वरिष्ठ सहायक के पद पर कार्यरत हैं, बैंक से आयीं और बताने लगीं कतार में खड़े दो व्यक्ति आपस में झगड़ रहे थे कह रहे थे मेरा नंबर पहला है...... ज्यादा बात बढ़ने लगी थी,  माहौल बिगड़े न यह सोच जो वास्तव में पहले खड़ा था, बोला "यार कभी तो फर्स्ट आया हूँ" अब मुझे ही पहले पैसे लेने दो न. बैंक में खड़े सभी ग्राहक और स्टाफ भी हंस पड़े.  जैसा भी हो लगता है उस बेचारे के मन में कहीं न कहीं इस बात का दुःख है........ जय जोहार ........

"जल ही जीवन है"

पड़ रही है कैसी गर्मी 
मर रहे हैं सभी; 
क्या सरकारी, गैर सरकारी
चाहे बंधुआ हो, या हो  
दैनिक वेतन भोगी कर्मी 
पिछले हफ्ते हमने देखा:-
ज्योतिषी हमेशा अपने "भाग्य" का नहीं सोचते 
"ज्योतिष विद्या" के विरोधी इन्हें रहते हैं कोसते 
अखबार के रविवारीय अंक में छपा था 
सभी बारह राशियों पर जल तत्व का प्रभाव 
लिख़ा था "जल व्यर्थ न गंवाएं", फिक्र न करें 
आपके जीवन में नहीं रहेगा सुख सुविधा का अभाव 
सो सीख लें, जल संग्रह करना, 
नहीं तो मर जायेंगे इस भीषण गर्मी में, 
ज्योतिषियों ने बताया नहीं,  ऐसा कभी न कहना
"जल ही जीवन है" आयें इस भीषण गर्मी में
जलने के बजाय, जल बचाएं, राहगीरों को,
प्यासों को जल अवश्य पिलायें  
जय जोहार.............

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

कंप्यूटरवा का मदर बोर्ड बदला

sका बताएं भैया ई कम्प्युटरवा बहुतै परेशान कर रखा है. ऊपर से ऑफिसवा का काम
तनि आज ही ठीक करवाए हैं कंप्यूटर
आप सभी मित्रों को मेरा
जय जय सियाराम
अब इसमें भी माता पिता के वास्ते बोर्ड होता है
ई हमका पता चला जब मेकेनिकवा कहने लगा
ईका मदर बोर्ड खराब हो गया है.  हम कहे
जावो बदल दो, सो बदला है आज ही.
अब करेंगे फिर से लिखना शब्द दुई चार
पहले कर लें आप सभी मित्रों को जय जोहार...............

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

घर का भेदी लंका ढाये याने "विभीषण"


घर का भेदी लंका ढाये याने "विभीषण" 
विभीषण था बुरा या अच्छा,
 हो सकता है इस विषय पर विश्लेषण 

                                "ॐ श्री गणेशाय नमः " "ॐ हं हनुमते नमः"
                                  सप्ताह भर बाद पुनः हनुमत स्मरण करते हुए यहाँ उमड़ता हुआ  और दो तीन दिनों से मन में घुमड़ता  हुआ  विचार  प्रस्तुत करने का साहस कर बैठा. पंक्तियाँ ज्यादा नहीं हैं.  विभीषण तो अपने भाई रावण को राज्य,  लंका के हित में व स्वतः रावण के हित में उपयोगी प्रभु श्री राम की भक्ति के लिए कहते हैं और उसके अत्त्याचार को सह नहीं पाने के कारण अपने भाई के वध का कारक बनते हैं. चूंकि विभीषण अपने सगे भाई के हत्यारे के रूप में देखे जाते हैं इसलिए आज दैनिक जीवन में इस तरह के पात्र के लिए उपमा बन गए हैं.  
                                     मुझे अपने सह-यात्रियों के बीच चल रही चर्चा का स्मरण हो आया.  चर्चा के दौरान बात निकल पड़ी कि हम हर वर्ष  राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र  दिवस के अवसर पर राजधानी दिल्ली में जो सुरक्षा मिसाइलों का प्रदर्शन करते हैं और उसकी मारक क्षमता का जो जिक्र करते हैं, जैसा कि पूरे चैनल में इसका प्रसारण करते हैं, क्या इसका परिणाम यह नहीं हो सकता कि कोई विरोधी देश या विरोधी भले न हो  कोई भी देश अपनी ताक़त मजबूत करने के लिए इससे भी अधिक मारक क्षमता का शस्त्र बनाने में लग जाएगा?  संक्षिप्त में क्या   देश की  रक्षा से सम्बंधित अपनी कोई भी योजना हो उसे गुप्त नहीं रखा जा सकता?  बातें लीक होने लगी हैं.  घोटाले उजागर भर होते हैं.  सारे मीडिया चेनलों में सप्ताह भर ऐसे समाचार छाये रहते हैं,    धीरे धीरे  फिर सब कुछ सामान्य.  बनिस्बत इसके क्यों न घोटालेबाजों पर यथोचित  कार्रवाई की जाती ?  ऐसे उजागर होते सन्देश विश्व में भारत  की छवि को क्या धक्का नहीं पहुंचाते?  अभी जो भी हों देश के भीतर ही घुसपैठ जमाये हुए राज्यों को तहस नहस करने वाले अनेकों प्रकार के "वादी" (नक्सलवादी, माओवादी, आतंकवादी ...) वालों को भी राज्य की सुरक्षा व्यवस्था के बारे में जानकारी देने वाले कम नहीं होंगे. अतः ऐसे लोग भी "विभीषण" कहलाने योग्य माने जायेंगे.  पर ये नाम के ही विभीषण होंगे ...... विभीषण से तुलना करना व्यर्थ है .  ये तो अपने देश को ही विनाश के गर्त में धकेलने वाले हैं.  
चलिए जनता तो बोलते रहेगी और अंत में "कोऊ नृप होय हमै का हानी" कहते हुए जिन्दगी चलने देगी. 
सभी मित्रों को जय जोहार .........