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शनिवार, 17 अप्रैल 2010

घर का भेदी लंका ढाये याने "विभीषण"


घर का भेदी लंका ढाये याने "विभीषण" 
विभीषण था बुरा या अच्छा,
 हो सकता है इस विषय पर विश्लेषण 

                                "ॐ श्री गणेशाय नमः " "ॐ हं हनुमते नमः"
                                  सप्ताह भर बाद पुनः हनुमत स्मरण करते हुए यहाँ उमड़ता हुआ  और दो तीन दिनों से मन में घुमड़ता  हुआ  विचार  प्रस्तुत करने का साहस कर बैठा. पंक्तियाँ ज्यादा नहीं हैं.  विभीषण तो अपने भाई रावण को राज्य,  लंका के हित में व स्वतः रावण के हित में उपयोगी प्रभु श्री राम की भक्ति के लिए कहते हैं और उसके अत्त्याचार को सह नहीं पाने के कारण अपने भाई के वध का कारक बनते हैं. चूंकि विभीषण अपने सगे भाई के हत्यारे के रूप में देखे जाते हैं इसलिए आज दैनिक जीवन में इस तरह के पात्र के लिए उपमा बन गए हैं.  
                                     मुझे अपने सह-यात्रियों के बीच चल रही चर्चा का स्मरण हो आया.  चर्चा के दौरान बात निकल पड़ी कि हम हर वर्ष  राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र  दिवस के अवसर पर राजधानी दिल्ली में जो सुरक्षा मिसाइलों का प्रदर्शन करते हैं और उसकी मारक क्षमता का जो जिक्र करते हैं, जैसा कि पूरे चैनल में इसका प्रसारण करते हैं, क्या इसका परिणाम यह नहीं हो सकता कि कोई विरोधी देश या विरोधी भले न हो  कोई भी देश अपनी ताक़त मजबूत करने के लिए इससे भी अधिक मारक क्षमता का शस्त्र बनाने में लग जाएगा?  संक्षिप्त में क्या   देश की  रक्षा से सम्बंधित अपनी कोई भी योजना हो उसे गुप्त नहीं रखा जा सकता?  बातें लीक होने लगी हैं.  घोटाले उजागर भर होते हैं.  सारे मीडिया चेनलों में सप्ताह भर ऐसे समाचार छाये रहते हैं,    धीरे धीरे  फिर सब कुछ सामान्य.  बनिस्बत इसके क्यों न घोटालेबाजों पर यथोचित  कार्रवाई की जाती ?  ऐसे उजागर होते सन्देश विश्व में भारत  की छवि को क्या धक्का नहीं पहुंचाते?  अभी जो भी हों देश के भीतर ही घुसपैठ जमाये हुए राज्यों को तहस नहस करने वाले अनेकों प्रकार के "वादी" (नक्सलवादी, माओवादी, आतंकवादी ...) वालों को भी राज्य की सुरक्षा व्यवस्था के बारे में जानकारी देने वाले कम नहीं होंगे. अतः ऐसे लोग भी "विभीषण" कहलाने योग्य माने जायेंगे.  पर ये नाम के ही विभीषण होंगे ...... विभीषण से तुलना करना व्यर्थ है .  ये तो अपने देश को ही विनाश के गर्त में धकेलने वाले हैं.  
चलिए जनता तो बोलते रहेगी और अंत में "कोऊ नृप होय हमै का हानी" कहते हुए जिन्दगी चलने देगी. 
सभी मित्रों को जय जोहार .........
                   

3 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

अच्छी पोस्ट लिखी है।
लेकिन इन घर के भेदीयॊ को शय भी तो हमारे कर्ण धारो की डुल्मुल नीति के कारण मिलती है......यदि वे वोट की राजनीति छोड़ कर देश हित की राजनीति करे तो कितना अच्छा हो.....

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

मिसाइलों के प्रदर्शन से तो कोई डरने वाली बात नहीं...पर हाँ घर में बैठे विभीषणों से जरूर खतरा है,इन्हें पहचानने की जरूरत है...

ललित शर्मा ने कहा…

घर के भेदी,लंका छेदी
गिरीस तहां हवे लद्दी लद्दी