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शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

शिक्षा और भिक्षा

एक समय था विद्यार्थी गुरुकुल में विद्यार्जन करता था साथ ही साथ भिक्षा मांगने की भी शिक्षा दी जाती थी चूंकि माँ बाप से विमुख रह विशुद्ध ब्रह्मचर्य आश्रम का अनुपालन करते हुए गुरु की शरण में रह विद्या प्राप्त की जाती थी. यह विद्या प्राप्ति का स्थल गुरुकुल कहलाता था. अपने कार्य के लिए समर्पण और गुरु के प्रति श्रद्धा दोनों ही बातें होती थीं.  आजकल जैसे माँ बाप को शुल्क तो देना नहीं होता था अतएव भोजन हेतु अन्न जुटाने के लिए भिक्षा भी मांगनी पड़ती थी विद्यार्थियों को.  समय बीतता गया, स्वरुप बदलता  गया.  शासन द्वारा बच्चों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान करने के लिए पाठशालाएं, विद्यालय महाविद्यालय खोले गए.  अब तो निजी शैक्षणिक संस्थाएं भी बहुत हैं.   दरअसल मैं अपने पुत्र को भारतीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान  प्रवेश-परीक्षा की तैयारी के लिए कोटा भेजा हूँ. उसको छोटी माता निकल आने के कारण उसे वापस भिलाई लाने   गया था. रात में ही भिलाई पहुंचा.  कोटा में  अनेकों प्रशिक्षण संस्थाएं हैं और सालाना शुल्क भी बढ़िया है.  बस एक विचार मन में उमड़ा उमड़ा ही नहीं घुमड़ते रहा. अभी अभी कार्यालय जाने के पूर्व ही सोचा लिख बैठूं. 
प्राथमिक शाला
माध्यमिक विद्यालय
उच्चतर माध्यमिक विद्यालय
महाविद्यालय
बड़े बड़े प्रशिक्षण संस्थान
इन सबकी ओर जरा दीजिये बारीकी से ध्यान
इनके स्तरों के मुताबिक
बच्चों का होता है अध्ययन
शिक्षकों का अध्यापन
स्तर छोटा है; यदि जुड़ा होता है इनके
आगे शासकीय
शिक्षण प्राप्त करना होता है नाटकीय
यहाँ पाते हैं ऐसी शिक्षा
के बन जाते हैं काबिल, कम से कम मांगने को भिक्षा
वहीँ दूसरी ओर
उच्च स्तरीय निजी शिक्षण/प्रशिक्षण संस्थानो में
भेजे जाते हैं बच्चे,
रईसों के बच्चों के लिए तो ठीक है,
मध्यम वर्गीय का होता है हाल बेहाल
नौबत आ जाती है पालकों के मांगने की भिक्षा
                            लेकिन अब घबराने की कोई बात नहीं है;
कर्ज रुपी भीख  देने को तैयार रहता है हर  बैंक
मालूम है आजकल के होनहार बच्चे
साधारण नहीं असाधारण हैं, हां जी असाधारण हैं
जिन्हें कह सकते हैं आप थिंक टैंक
इनके लिए दी गयी भीख यूँ ही बेकार न जायेगी
सूद सहित बैंक में वापस आएगी
यही नहीं थिंक टैंक अपने मकसद पर खरे उतरकर
करेगा नाम रौशन अपने माँ बाप सहित उस बैंक का
ऊंचाई को छूने के लिए जो बना  "पायदान"   उस थिंक टैंक का
जय  जोहार  ..........

3 टिप्‍पणियां:

SANJEEV RANA ने कहा…

इस रचना के लिये धन्यवाद
ऐसे लेखन कि ब्लोग जगत को आवयश्कता है

ललित शर्मा ने कहा…

तैं हां लिखत हस मैं टिपियावत जात हंव्।

बने हे सुद सुद्धा पैसा हां लहुट जाए
कर्जा ददा के हे मोर नई हे कही दिस त.......!

जय जोहार जय जोहार जय जोहार

'उदय' ने कहा…

...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति,प्रभावशाली!!!