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रविवार, 14 फ़रवरी 2010

ब्लॉग जगत में डी लिट की उपाधि पायें

इस ब्लॉग जगत में हमने देखा कि "आनंद" देने वाले बहुत हैं, मसलन टिप्पण्यानन्द,  लिखन्न्यानंद वैगरह वैगरह. पर एक बात और समझ में आयी कि भाई डी लिट की उपाधि भी यहाँ मिल सकती है. यदि आप किसी ब्लॉग  के अनुसरण करता हैं और बात जमी नहीं, अपने आप को वहां से डीलिट कर दीजिये. हो गए न डी लिट.  मैं लम्बी यात्रा  से लौटने के  बाद  देखा कि मेरे ब्लॉग के तो १६ अनुसरण करता थे,  १५ हो गए. लगता है शायद किसी  को डी लिट की उपाधि यहीं से मिल गयी हो.

वेलेनटाइन/वेलअईठाइन डे सभी को मुबारक हो.

आज इस दिन को सभी जोड़े जो बन चुके हैं और जो बनने वाले हैं इस प्रतिज्ञा के साथ पर्व के रूप में मनाएं कि हम प्रेम की डोर को टूटने न देंगे. परिवार की इज्जत पर आंच न आने देंगे. इस दिन को  केवल मौज मस्ती का दिन नहीं मानेंगे.  और एक विशेष आग्रह है कि छः तारीख को मेरे द्वारा लिखा गया लेख न पढ़ा जावे.  
जय जोहार

मूक होई बचाल, पंगु चढ़इ गिरिबर गहन

आज मानव सभी क्षेत्रों में बाजी मार रहा है बजाय मृत्यु पर विजय पाने के. और मृत्यु पर विजय न पाने के कारण ही  प्रत्येक व्यक्ति स्वीकारता है कि अपने ऊपर कोई परम सत्ता है. वाकई श्री राम चरित मानस की एक एक चौपाई, दोहा, सोरठा कितना सारगर्भित है यदि उसकी व्याख्या सही अर्थों में की जाय. यहाँ पर ईश्वर की कृपा बताते हुए कहा गया है कि उनकी कृपा से गूंगा बोल सकता है लंगड़ा पहाड़ पर चढ़ सकता है. यह अतिशयोक्ति नहीं है. केवल शाब्दिक अर्थ पर न जाएँ.  ईश्वर कृपा कब होती है जब मनुष्य कुछ करने को मन में ठान लेता है. याने जहाँ चाह वहाँ राह. हम लोगों ने देखा है दूर-दर्शन में अपंग व्यक्ति भी क्या क्या करतब नहीं दिखलाते. चलिए करतब दिखने की बात तो हरेक पर लागू नहीं कर सकते पर यह तो हो ही सकता है कि आज ऐसे व्यक्ति भीख मांगने के बजाय जीवन यापन के लिए कुछ कर तो जरूर सकते हैं. हम अभी अभी यात्रा पर गए थे दक्षिण भारत की.  रेल यात्रा थी. देखा जितने भी खिलौने, फल, इत्यादि बेचने आ रहे थे वे किसी न किसी प्रकार से विकलांग थे. कोई अँधा था तो कोई लंगड़ा. अपने क्षेत्र में देखते हैं कि ऐसे व्यक्ति केवल भीख मांगते नजर आते हैं. याने इधर हर व्यक्ति चाहता है कि बिना परिश्रम के सब कुछ हासिल हो जाय. अरे विकलांग व्यक्ति की बात तो छोडिये. यहाँ तो मेहनत कर सकने वाला व्यक्ति भी भीख मांगता  नजर आता है .  खैर हमने यात्रा के दौरान यह दृश्य देखा तो सीधे हमारा ध्यान श्री राम चरित मानस के बालकाण्ड के सोरठे की इस पंक्ति "मूक होई बाचाल....." पर चला गया और अपने आप को इस बात को यहाँ लिखने से नहीं रोक पाए.

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

सह-शिक्षा याने को एजुकेशन

इस समय शायद एक महीने के अंतराल के बाद फिर विवाह का सीजन शुरू हो गया है.  निमंत्रण पत्र खूब आये.  देखने में आया कि आज समाज खंडित हो रहा है. हो सकता है अब हम  वसुधैव कुटुम्बकम की धारणा के साथ आगे बढ़ रहे हों. लेकिन यह सब उस समय अच्छा लगता है जब अभिभावक/मातापिता (दोनों पक्ष के) की सहमति व उनकी ख़ुशी को ध्यान में रखते हो. वर्तमान परिदृश्य के लिए ऐसा लगता है कि सह शिक्षा जिसे अंग्रेजी में को एजुकेशन कहते हैं, उसी का असर है. 
सह शिक्षा याने को एजुकेशन 
किशोर किशोरियों में परवान 
चढ़ता यह फैशन 
शिक्षा पूरी हो न हो 
बना लेते हैं अपनी अपनी जोड़ी
संतान का  भविष्य के सजाने  संवारने
की चिंता में करते रहते अभिभावक/माता पिता 
अपनी माथा फोड़ी 
हो गए हैं आज इतने अडवांस 
अर्थोपार्जन में लग जाते हैं 
परिणय सूत्र में बंधने 
दृढ निश्चय कर जाते हैं
माता पिता की साध रह  जाती है अधूरी
कहते हैं, पापा कर दो सर्टिफाई हमें 
आपके लिए कुछ करने का बचा नहीं कोई चांस

शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

वेलएंटाइन/वेल अंइठाइन डे 14 फरवरी

 "वेलेंटाइन डे" इहीच दिन हा आय प्रेम करे के, तहां ले मन भर गे त झट ले खसक ले? खसक ले के मतलब, तैं नहीं त दूसर के भाव रखत   एक आखर उर्दू के तीन पइत  कहिके  जिनगी भर बर कोंटिया दे.  घर के जोगी जोगड़ा आन गाँव के सिद्ध आज जादा दिन नई होए हे, ए वेल अइठाइन डे ल  परसिद्ध होए . अरे हमर देश मा "परेम" हा का मिट गे हे? पहिली नई रहिसे का? पहिली तो परेम हा  श्रद्धा अउ समर्पण ये दूनो  भाव के संग चलय. हमर बड़े बड़े संत मन ल त परेम के भाखा आबे नई करत रहिसे लागथे.  मैं संछेप मा एखर इतिहास के जाने के कोसिस करेंव.  लिखे हे के 496 इसवी मा एक झन संत होए रहिसे तेखरे नाव वेलेंटाइन रहिसे ओ हा एक मंदिर के पुजारी रहिसे, कोंजनी कोन जेलर के बेटी संग ओला परेम हो गे रहिसे. 14 फरवरी के ओहा मारत खानी वो जेलर के बेटी के नाव मा एक ठन चिट्ठी लिख के अपन दस्तखत करके मरिस. त कोनो कथे ए तारीख के जनम ले रहिसे.  आनी बानी के कहानी. ठीक हे जी परेम के इजहार करौ, अउ परेम करौ त बने ढंग ले करौ.  हमर देश मा अइसन मौका के उपयोग मौज मस्ती करौ के रूप मा जादा रथे. अइसे लागथे के  फरवरी के  14  तारीख हा  टाकीज मा देश भक्ति के  फिलिम बर एकाध दिन  बिन टिकिट के जाय बर छूट रहिथे नहीं ओइसने अपन प्यार के इजहार करे बर छूट मिले के तारीख आय. एखर आड़ मा  लोगन अपन सीमा ल लांघे ल धर लेथें. खासकर किशोर अवस्था के लईका मन. आघू पाछू ल नई देखें (भूत- भविष्य ल नई सोचें ).  सेंट वेलेंटाइन एकदम हरेक के सुरता म रहैया  संत महात्मा होगे हमर संत महात्मा मन बैरागी रहैं उंखर कोनो महत्व नई ये. अरे परेम मा अउ मन के तियाग के कहानी इहों बताये गे हे. इही ल कथें घर के जोगी जोगड़ा आन गाँव के सिद्ध.  ठीक हे भाई एक दूसर के परेम मा बने अंइठावव इही ह आय वेल अंइठाइन डे.
 अभी बैठे बैठे इही बात ह मन मा गुंगुआवत रहिसे. लिखा गे.
जय राम जी की. जय जोहार.

"नकटा के नाक कटे सवा हाँथ बाढ़े"

अभीच्चे एक ठन हाना मोर दिमाग मा आइस "नकटा के नाक कटे सवा हाँथ बाढ़े" त लिख दे थौं. का हे एक तो कभू जादा बैठों नहीं ए मेरन याने ब्लॉग मा. अउ मन उचट घलो गे रहिसे "टिपण्णी" पुराण पढ़ पढ़ के.  आज फेर एक ठन  लेख/कविता  देख परेंव  टिपण्णी ऊपर. मोर मन नई माढिस जी. सोचेंव मोर नाक बहुत छोटे हे इहाँ मैं काहीं च नई लागँव. ओतका न हिंदी के विशेषज्ञ आंव न लिखे उखे बर आवै. टिपण्णी कैसे पाहूं अपन पोस्ट मा? सोचेंव भैया अतेक लोगन मन उखेन पानी पियावत हें ये टिपण्णी पुराण लिख लिख के ओखर कुछ कारण होही त समझ मा आइस के एक दूसर के नाक काटे म जादा फायदा हे, नाक कटही नहीं त बढ़ही कैसे. कैसे ए हाना हा फिट बैठही " "नकटा के नाक कटे सवा हाँथ बाढ़े". मन मा अपन बर सोचेंव  अगर तोला अपन नाक ऊंचा करना हें या बढ़ाना हे त लिख कुछु कांही.  नकटा बनबे . तभेच तोरो नाक हा बाढ़ही.  
जय जोहार भैया मन ल. ये सब उदिम अपन खातिर लिखे हंव आँय!  

मनुष्य की तुलना जीव जंतुओं/पशु पक्षियों से करना कहाँ तक उचित??

राम चरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है, "बड़े भाग मानुष तन पावा". सही है जैसा की शास्त्रों में लिखा है यह मानुष तन चौरासी लाख योनियों से गुजरने के पश्चात प्राप्त होता है.  इस योनि का लाभ वेद पुराण शाश्त्रों के हिसाब से सदाचरण से कर्म करते हुए ईश्वर में आस्था रख मोक्ष प्राप्ति ही है. अर्थात जन्म-मृत्यु की पुनरावृत्ति से छुटकारा. यह मनुष्य योनि ही ऐसी योनि है जिसमे हम और आप बुद्धि के साथ साथ विवेक के भी मालिक हैं,  तर्क-वितर्क करने की क्षमता है हममे. देश काल परिस्थिति के अनुसार आपने आप को समायोजित कर सकते हैं.  किन्तु हम किसी व्यक्ति के आचरण या व्यवहार की तुलना जीव जंतुओं से, पशु पक्षियों से भी कर बैठते हैं. पशु पक्षियों, जीव जंतुओं की प्रकृति अथवा स्वभाव तो ईश्वर द्वारा निर्धारित और निश्चित है पर मनुष्य स्वभाव को ईश्वर ने परिवर्तनशील बनाया है ताकि वह देश काल  परिस्थिति के मुताबिक अपने आप को ढाल  सके और सन्मार्ग पर चलते हुए अपनी जीवन नैया पार कर सके. हम अक्सर देखते हैं कि मनुष्य के अवगुणों की तुलना जीव जंतुओं, पशु पक्षियों से की जाती है. क्या यह मनुष्य का नहीं उन जीव जंतुओं का पशु पक्षियों का अपमान नहीं है जो कम से कम अपनी  प्रकृति,  स्वभाव को लांघते तो नहीं.  उदाहरण के लिए "कुत्ते कि पूंछ टेढ़ी है तो टेढ़ी ही रहेगी" याने मनुष्य अपना स्वभाव नहीं बदल सकता, अरे भाई कुत्ते  कि पूंछ  तो उसकी शारीरिक संरचना के अनुसार है,  टेढ़ी ही रहनी है. मनुष्य क्यों नहीं बदल सकता अपना स्वभाव, अपनी सोच???..........
जय जोहार