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रविवार, 21 फ़रवरी 2010

"राधे बिन होली न होय बिरज में"

आ रही है होली                                                                          
कोई इसकी हो ली कोई उसकी हो ली
पायी है प्रसिद्धि बरसाने की होली
हमारा छत्तीसगढ़ यह गाता
राधे  बिन होली न होय बिरज में
दे दे बुलौवा राधे को, क्योंकि
राधाजी तो  हैं श्याम की हो ली

पर हमरी बिनती है कान्हा से
रंग दे ख़ुशी  के रंग से ये वतन
कोई खेले न यहाँ खून की होली
ऋतु है बसंत, तरूणाई की उमंग
कोई पी रहा है भंग देखो कैसा जमा है रंग
हम   त्याग  राग द्वेष ईर्ष्या,  लगालें गले अपनों को,
भर दें अपने प्रेम रंग से सबके दिलों की खोली 
आओ खेलें हम सब होली

आप सभी को होली की शुभ कामनाओं सहित...... 

5 टिप्‍पणियां:

जी.के. अवधिया ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति!

राधे तू बड़भागिनी कठिन तपस्या कीन।
तीन लोक तारन तरन सो तेरो आधीन॥

अमिताभ मीत ने कहा…

सुन्दर !

ललित शर्मा ने कहा…

बहुत बढिया पोस्ट।
होली है हो्ली है गुप्ता जी।
बधाई हो भाई
तंहु होलिया गेस

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन..बस आ ही रही है!!

RaniVishal ने कहा…

Waah! bahut sundar..dhanywaad!!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/