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मंगलवार, 13 नवंबर 2012

महा लक्ष्मी नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुवरेश्वरी।
हरी प्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे।।
माँ लक्ष्मी ! दुःख दारिद्र्य दूर करे   
पाप ताप संताप हरे 
दीप ज्योति नमोस्तुते 
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं 
जय जोहार ....
 

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं


 प्रकाश-पर्व दीपावली, जग, जीवन तिमिरारि।
माँ लक्ष्मी तेरे सामने, मागें हाथ पसारि।।
धन धान्य परि पूर्ण करे, होय सत्कर्म की जीत।
बैर-भाव का नाश हो, उमड़े जन जन प्रीत।।

 
लक्ष्मी चंचल होत है रुकत न रोके जाय। 
तनि ठहर ठौर गरीब के, कुटिया दियो सजाय।।
 कुटी महल बिच भेद तजि, रंक की रखियो लाज।
दोउ कर जोरे बिनवौं, मात पधारो आज।।
माता लक्ष्मी सदा सहाय करें।। 
हमारे पूरे परिवार की ओर से आप सभी मित्रों को दीपावली की  अनंत शुभकामनाएं .......
आगे आज देवारी तिहार 
जम्मो साथी संगी संगवारी मन 
सुमिर के लक्ष्मी दाई ल चिटिकुन
तिहार मनावौ बड़ जोरदार 
जय जोहार ..........

सोमवार, 12 नवंबर 2012

नरक चतुर्दशी की हार्दिक शुभकामनाएं

धन-दौलत देवी लक्ष्मी, धन्वंतरि रोग भगाय।

कल है नरक चतुर्दशी, उबटन लगा नहाय।।

आप सभी की चिर-सुखी दीर्घायु जीवन की

प्रार्थना पभु से करते हुए

नरक चतुर्दशी की हार्दिक शुभकामनाएं
जय जोहार ...............

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

लिख मारते थे केवल "नाइस"

ब्लॉग्गिंग के शुरू शुरू के वो दिन 
दिन रात कुछ भी पोस्ट चटका 
और केवल टिप्पणियों की संख्या गिन 
चालू थी ब्लॉग वाणी 
जैसे भी हो कुछ न कुछ लिखा करते थे 
कृपा करती थीं माँ  वीणा पाणी (सरस्वती)
लिख नहीं पाते थे कोई रचना 
दिखानी होती थी  सक्रियता 
ज्यादा से ज्यादा ब्लॉग में 
जा टिपियाते थे 
भले रचनाएं पढ़ें या ना पढ़ें 
नहीं मिलती थीं टिप्पणियों के लिए  च्वाइस 
लिख मारते थे केवल "नाइस"
आज ब्लॉग्गिंग के साथ साथ 
है फेस बुक,  ट्विटर ..
हैं मस्त सब उन्ही में 
बच्चों से लेकर मिसेज एंड मिस्टर 
क्यों ! सही है न ब्रदर & सिस्टर?
........जय जोहार 

 

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

तगड़ा सुरक्षा कवच

 तगड़ा सुरक्षा कवच 
          अभी अभी हम पढ़ रहे थे ब्लॉगर मित्रों के वे पोस्ट जिन्हें ब्लॉग फॉर वार्ता में शामिल किया गया है। रचना पढ़ने के बाद मेरी आदत है जहां तक मेरे मन में कुछ भाव उमड़ते हैं उन्हें टिपण्णी के रूप में प्रकट करने से नहीं रोक पाता। आज आदरणीया संगीता पुरी जी द्वारा भारत वर्ष के विभिन्न प्रान्तों में महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला पर्व  "करवा चौथ" के बारे में ब्लॉगर मित्र/मित्राणियों द्वारा  लिखे  विचारों को ब्लॉग फॉर वार्ता में रखा गया है। हमने भी एक पोस्ट पढ़ा। जब टिपण्णी लिखने की बारी आई तो हम टिपण्णी प्रकाशन के लिए लगे सुरक्षा कवच को बेध नहीं पाए। कहीं रोबोट तो नहीं हैं यह जांचने के लिए कुछ शब्दों को मुद्रित करने कहा जाता है। तीन-चार बार प्रयत्न किये। सफल नहीं हो पाए। चलिए कोई बात नहीं, सुरक्षा कवच तगड़ा होना ही चाहिए।  वैसे कई रचनाओं में टिपण्णी देते वक्त यह लिखा मिलता है "आपकी टिपण्णी सहेज दी गई है, रचनाकार द्वारा अनुमति दिए जाने पर प्रकाशित कर दी जायेगी" यह हमें ठीक लगा।
           जोर जबरदस्ती के कारण नहीं, आस्था और श्रद्धा के साथ वास्तविक पति-प्रेम का प्रतीक पर्व "करवा-चौथ" मनाने वाली समस्त सुहागिनों को हार्दिक बधाई। हमारे छत्तीसगढ़ में इस पर्व के बजाय "हरतालिका व्रत" को ज्यादा प्रधानता देते हैं।
जय जोहार .....

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

घाटे की अर्थ व्यवस्था

घाटे की अर्थ व्यवस्था 
          जहां देखिये घाटे की अर्थ-व्यवस्था। प्रत्येक समाज की अपनी सामाजिक पत्रिका छपती होगी। हमारे समाज में इसका बीड़ा एक ही व्यक्ति द्वारा मुख्य संपादक/प्रकाशक/मुद्रक सभी की  भूमिका निभाते हुए उठाया गया है जैसा कि "केसर ज्योति" नाम की त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन नियमित रूप से 11 वर्षों से किया जा रहा है। पत्रिका किसी प्रांत तक सीमित नहीं है। हर प्रांत में बसे स्वजातीय बंधुओं के पास पत्रिका पहुंचाने का प्रयास किया जाता रहा है। वैसे पत्रिका को छत्तीसगढ़ प्रांत से अच्छा प्रतिसाद मिला है। मगर बड़े दुःख की बात है कि प्रधान सम्पादक महोदय सदैव यही रोना रोते रहते हैं कि कभी 4.5 लाख  रुपये के घाटे पर चल रहा है पत्रिका के सम्पादन का कार्य तो कभी 6.5 लाख रूपये के घाटे पर। यह बात समझ में नहीं आई  कि वास्तव में यदि इतना घाटा  हुआ है तो 11 वें वर्ष का सफ़र कैसे जारी रख पाई है यह पत्रिका। इसमें कोई संदेह नहीं है कि किसी कार्य को अकेले सम्पादित करने पर कठिनाई तो आएगी ही। अब समाज में हर कोई चाहता है कि पत्रिका में उसका नाम अवश्य दिखे। केवल उसका ही नहीं पूरे परिवार का नाम दिखे। उसकी रचनाओं को प्रकाशित किया जाय। जब सहयोग के लिए निवेदन किया जाता है तब आना कानी। सदस्यता शुल्क दे देने मात्र से यह समझा जाता है कि सम्पादक उसकी हर बात माने।
           अभी अभी प्रधान सम्पादक महोदय से हुई मुलाक़ात ने मुझे कुछ बातें लिखने पर मजबूर कर दिया है। कोई व्यक्ति क्या सचमुच इतना घाटा सहकर अपना कारोबार जारी रख सकता है विशेष रूप से आय का और कोई जरिया न हो तब।  दूसरी बात पिछले साल तक इस क्षेत्र की जनता भरपूर सहयोग करती थी वह इस समय प्रधान सम्पादक महोदय से कटी कटी सी क्यों है? क्या उनके दवारा अपनाया गया सिद्धांत "घाटे की अर्थ-व्यवस्था" इसका कारण है या और कुछ। संपादक महोदय से पूछने पर कहा जाता है कि वे स्वतः हत्प्रभ हैं। "दीपावली विशेषांक" के नाम पर विज्ञापन संकलन (याने विज्ञापन के लिए राशि संकलन) हेतु सम्पादक महोदय जी विगत डेढ़ महीनों से यात्रा पर हैं। दुर्ग उनका आखरी पड़ाव था। आज ही अपनी इंदौर नगरी के लिए रवाना हुए हैं। हमने भी उनसे कह दिया कि जब पूरा देश "घाटे की अर्थ-व्यवस्था" पर चलाया जा सकता है तो आपकी पत्रिका क्यों नहीं चल सकती।
जय जोहार .......

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

शरद पूर्णिमा की बहुत बहुत बधाई

             शरद पूर्णिमा की बहुत   
                बहुत बधाई
जय जोहार .....