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बुधवार, 28 जुलाई 2010

तीन दिनों की बारिश

तीन  दिनों की बारिश

प्रांत को जलमग्न किया 
किसान हुए कहीं खुश
झुग्गी  झोपडी के वासिंदों को  
क्यों तुने अर्धनग्न किया
(२) 
मांग बहुत है पानी की 
है यह किसी से छुपा नही
पर यह क्या!  तीन दिनों से 
हो रही बारिश 
जन जीवन हुआ अस्त व्यस्त
बीच बीच में क्यों रुका नहीं
(३)
आया सावन झूम के 
बिदा हुआ आषाढ़ 
जल स्तर थोड़ा बढ़ो गयो
नदी नालों में आयो बाढ़ 
नदी में आयो बाढ़,  उतर जइयो---
प्राकृतिक आपदाओं, भूखमरी,
बेरोजगारी, घोटालों,  भ्रष्टाचारों
इनकी बनी रहे जो बाढ़,
क्या करियो भइयो?????
जय जोहार .......

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

गुरु गोबिन्द दोउ खड़े काके लागू पाय। बलिहारी आपनी गोबिन्द दियो बताय॥

                              हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ़ पूर्णिमा का दिन गुरु की आराधना का है। यह अवसर गुरु-शिष्य परंपरा की महत्व को बताता है। इस वर्ष यह पुण्य अवसर २५ जुलाई को आया । शास्त्र कहते हैं गुरु से मंत्र लेकर वेदाध्ययन करने वाला शिष्य ही साधना की योग्यता पाता है। गुरु हमेशा वंदनीय और पूजनीय होते हैं।  व्यावहारिक जीवन में भी पाते हैं कि बिना गुरु के मार्गदर्शन या सहायता के किसी कार्य या परीक्षा में सफलता कठिन हो जाती है। किंतु गुरु मिलते ही लक्ष्य आसान हो जाता है। सफलता कदम चूमती है। इस प्रकार गुरु शक्ति का ही रुप है। वह किसी भी व्यक्ति के लिए एक अवधारणा और राह बन जाते हैं, जिस पर चलकर व्यक्ति मनोवांछित परिणाम पा लेता है। इस प्रकार बगैर गुरु बनाए कोई साधना सफल नहीं होती। कहते हैं ईश्वर के कोप से गुरु रक्षा कर सकते हैं। पर जब गुरु रुष्ट हो जाए तो असफलता और कष्टों से ईश्वर भी रक्षा नहीं कर पाता। यही कारण है कि गुरु का महत्व भगवान से ऊपर बताया गया है। गुरु ही हमें जीवन में अच्छे-बुरे, सही-गलत, उचित-अनुचित का फर्क बताता है। जो सफल जीवन के लिए बहुत आवश्यक है। गुरु ही हमें गोविन्द यानि भगवान से मिला सकता है। सद्गुरु कबीरदासजी ने इसीलिए कहा है-
गुरु गोबिन्द दोउ खड़े काके लागू पाय।  बलिहारी आपनी गोबिन्द दियो बताय 
                          यह पवित्र तिथि व्यास पूर्णिमा के नाम से भी प्रसिद्ध है। अनेक धर्मावलंबियों की यह जिज्ञासा होती है कि क्यों गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। इसका जवाब भी पौराणिक मान्यताओं में मिलता है।
                               पहला कारण इस दिन हिंदू धर्म के प्रमुख ऋषि वेद व्यास का जन्मोत्सव मनाया जाता है। साधारणत: धर्म से जुड़े लोग ऋषि वेद व्यास को मात्र महाभारत का रचनाकार मानते हैं। किंतु यह अनेक लोग नहीं जानते कि हिन्दू धर्म के पवित्र धर्म ग्रंथ, जिनमें सभी वेद, पुराण शामिल है, का संकलन और संपादन ऋषि वेद व्यास ने ही किया। इनमें प्रमुख रुप से चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद के साथ, १८ पुराण, महाभारत और उसका एक भाग भगवद्गीता शामिल है। उन्होंने पुराण कथाओं के द्वारा वेद सार और धर्म उपदेशों को आम जन तक पहुंचाया।
                          व्यास पूर्णिमा का यह शुभ दिन मात्र वेदव्यास के जन्मोत्सव दिवस ही नहीं है, बल्कि मान्यता है कि इसी पावन दिन वेद व्यास ने चारों वेदों का लेखन और संपादन पूरा किया। इस कारण भी यह व्यास पूर्णिमा के नाम से जानी जाती है।
                          ऋषि वेद व्यास ने श्रीगणेश की सहायता से धर्मग्रंथों को पहली बार भोजपत्र पर लिखा। इसके लिए उन्होंने एकांत स्थान चुना। इस दौरान उन्होंने अपने शिष्यों को भी मिलने और किसी भी तरह से बाधा डालने से मना किया। इसके बाद उन्होंने अपने दिव्य ज्ञान और ध्यान से भगवान श्री गणेश के साथ धर्म और जीवन से जुड़ी महान शिक्षाओं और उपदेशों को धर्मग्रंथों में लिखित रुप में उतार दिया। जो पूर्व में मात्र सुने जाते थे। ऋषि वेद व्यास, वेद और धर्म के रहस्यों को पहली बार लिखित रुप में जगत के सामने लाए। जिससे जगत ने धर्म और ब्रह्म दर्शन को गहराई से समझा। उनके द्वारा बताया गया धर्म दर्शन अमर और अनन्त है। जो पुरातन काल से ही जगत को जीवन में धर्म का महत्व बता रहा है।

                              उपरोक्त दो कारण गुरु पूर्णिमा पर्व के मनाने के बारे में बताया गया है. पुराणों में विद्योपार्जन के लिए सही स्थान गुरुकुल को माना गया है जहाँ गुरु और शिष्य की क्या भूमिका होती थी सर्व विदित है. पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण करना. गुरु की सेवा और सबसे बड़ी बात माँ बाप से कोई सहायता भी प्राप्त न करना यहाँ तक कि भोजन भी भिक्षा के द्वारा प्राप्त किये अन्न से स्वतः पकाकर ईश्वर और गुरु को भोग लगा ग्रहण करना. पुराणों मे  उल्लेख है कि यह शिक्षा अथवा कहें विद्या ग्रहण करने का समय अत्यंत कठिन होता था. 
                               गुरु शिष्य का वर्तमान स्वरूप क्या है? लाखों रुपये शायद करोड़ों कहें तो ज्यादा अच्छा होगा भव्य पंडाल सज्जा, गीत संगीत के साथ बड़े बड़े संतों का प्रवचन. कोई संदेह नहीं अध्यात्म का वृहत अध्ययन किये होते हैं. जिव्हा  पर  माँ सरस्वती बैठी होती हैं. लाखों की संख्या में भक्त गण कहें या श्रोता, भेद नही किया जा सकता,  बैठकर प्रवचन का आनंद ले रहे हैं. माँ लक्ष्मी कृपा पात्र सहज में, माध्यम वर्गीय कुछ और परिश्रम कर दीक्षा प्राप्त करते हैं, मिल जाते हैं उन्हें गुरु और गुरु को मिल जाता है शिष्य.  गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित पुस्तक "क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं"? (स्वामी रामसुखदास जी द्वारा लिखित) मैंने पढ़ी. बहुत ही सुन्दर ढंग से 'गुरु'' की व्याख्या की गई है. उनमे से कुछ अंश यहाँ उद्धृत करना चाहूँगा.  
भगवत्प्राप्ति गुरु के अधीन नही
                                जिसको हम प्राप्त करना चाहते हैं, वह परमात्मतत्व एक जगह सीमित नहीं है, किसी के कब्जे में नहीं है, अगर है तो वह हमें क्या निहाल करेगा? परमात्मतत्व तो प्राणिमात्र को नित्य प्राप्त है. जो उस परमात्मतत्व को जाननेवाले महात्मा हैं, वे न गुरु बनते हैं, न कोई फीस (भेंट) लेते हैं, प्रत्युत सबको चौड़े बताते हैं.  जो गुरु नही बनते, वे जैसी तत्व की बात बता सकते हैं, वैसी तत्व की बात गुरु बनने वाले नहीं बता सकते. 
                                 सौदा करने वाले व्यक्ति गुरु नहीं होते. जो कहते हैं कि पहले हमारा शिष्य बनो, फिर हम भगवत्प्राप्ति का रास्ता बताएँगे, वे मानो भगवान् की बिक्री करते हैं. यह सिद्धांत है कि कोई वस्तु जितने मूल्य में मिलती है, वह वास्तव में उससे कम मूल्य की होती है.  जैसे कोई घड़ी सौ रुपयों में मिलती है तो उसको लेने में दूकानदार के सौ रूपये नहीं लगे हैं. अगर गुरु बनाने से ही कोई चीज मिलेगी तो वह गुरु से कम दामवाली अर्थात गुरु से कमजोर ही होगी. फिर उसमे हमें भगवान् कैसे मिल जायेंगे? भगवान् अमूल्य हैं. अमूल्य वस्तु बिना मूल्य के मिलती है और जो वस्तु मूल्य से मिलती है, वह मूल्य से कमजोर होती है. इसलिए कोई कहे कि मेरा चेला बनो तो मैं  बात बताउँगा, वहां हाथ जोड़ देना चाहिए. समझ लेना चाहिए कि कोई कालनेमि है.! नकली गुरु बने हुए कालनेमि राक्षस ने हनुमान जी से कहा था----
   सर मज्जन करि आतुर आवहु!दिच्छा देऊँ ज्ञान जेहिं पावहु !!
यह प्रसंग है राक्षस कालनेमि द्वारा हनुमान जी को मोहित करने के इरादे से कपट रूप से मुनि का वेश धारण करना (लंका काण्ड दोहा क्रमांक ५७ चौपाई ४ जिसमे हनुमान जी उस मुनि से जल मांगते हैं तो अपना कमंडल देता है और तब हनुमान जी कहते हैं इतने क्या उनकी प्यास बुझेगी तब वह बड़ी ही कुटिलता से हनुमान जी से कहता है "तालाब में स्नान करके तुरंत लौट आओ तो मैं तुम्हे दीक्षा दूं., जिससे तुम ज्ञान प्राप्त करो!! 
                                 उसकी पोल खुलने पर हनुमान जी ने कहा कि पहले गुरु दक्षिणा ले लो, पीछे मन्त्र देना और पूंछ में सिर लपेटकर उसको पछाड़ दिया. 
                                   कहने का अभिप्राय गुरु के बिना मुक्ति नही है यह गलत है. 
जय जोहार........

रविवार, 25 जुलाई 2010

                         जय गुरुदेव 
आज गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर मेरे  ब्लॉग - गुरुवों को हार्दिक नमन वंदन. 
  जय जोहार    

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

आंकड़ों का खेल

आंकड़ों का खेल 
यह पोस्ट केवल  आंकड़ों के एक  संयोग के लिए लिखी जा रही है. दरअसल आज दो संयोग एक साथ बना. एक तो लगातार तीन पोस्ट पर अजीज मित्रों के १३-१३ आशीर्वचन प्राप्त हुए. भाई न मेरे पास पुस्तकों का संग्रह है न ही ज्यादा वक्त दे पाता हूँ लेखन आदि में. जो कुछ लिखता हूँ आप लोगों से ही सीख कर. अतः ये आंकड़ों के संयोग पर ये जुमला याद आ गया:- 
तीन तेरा नौ अट्ठारा। अटकर पंचे साढ़े बारा॥   जो मेरे ऊपर अक्षरस: लागू होता है। 
(२)
आज अनुसरणकर्ताओं की संख्या 36 हो गई है। भगवान से प्रार्थना है हमारा किसी से छत्तीस का आंकड़ा न रहे।              
आज मूड मे यह सब लिख बैठे। कृपया सीरियसली न लेवें। 
जय जोहार ............

आ गया है क्या जमाना.

विकासशील(विनाशशील*) देश करने लगते हैं                        
नक़ल विकसित देशों की संस्कृति की
मसलन नाईट पार्टी, डेटिंग, जश्न का जोश
सुरा सुंदरी के संग
हर रोज होता है कुछ न कुछ 'डे'
मदर्स डे, फादर्स डे वैगरह वैगरह
कुछ इस तरह है इनके रहन सहन का ढंग.

वतन छोड़ जाते हैं
बस जाते हैं पाश्चात्य देशों में
अंग्रेजी का शब्द 'फॉरेन' बन गया है  पर्याय
अमेरिका, कनाडा, जर्मनी
ऑस्ट्रेलिया आदि देशों का
रहने लगे हैं जहाँ इस देश के
हर कोने के बासिन्दे

लौटते हैं ये अप्रवासी नागरिक
अपने वतन को, बजाते हैं डफली
'फॉरेन' की सड़कों का, यातायात
के नियमों के पालन में कड़ाई का

क्यों नहीं कर पाते
हम इन चीजों का अनुसरण
नियमों की लापरवाही
रेलम पेल आवाजाही
हर दिन दुर्घटना,
किसी न किसी का मरण

कोसते हैं सरकार को
फिफ्टी फिफ्टी.........
अरे अरे ज्यादा हो गया
चलो फोर्टी सिक्सटी  के
सौदे पर काम कर रहे ठेकेदार को
अभी अभी नयी सड़क बनाई गयी है
सड़क तो तब्दील हो गयी है
देहातों में चलने वाले बैलगाड़ी के "मार्ग" में
क्या करें फिर भी चलना पड़ता है
नही रहता मालूम कब किसकी शामत आ जाय

कुछ अपनी खामियों की ओर नजर डालें
यातायात के नियमों के मुताबिक
निर्धारित है अलग अलग माल वाहक गाड़ियों की
भार वहन करने की क्षमता
यात्री गाड़ी में यात्रियों की संख्या का  पैमाना
स्वतन्त्र हैं..... ना..ना ...... स्वछंद हैं
कितनो ने इसे अपनाया कितनो ने माना?
आ गया है क्या जमाना.

(इस देश को क्या कहेंगे? विनाशशील या बिनास शील ?  अभी तो रोज की घटनाओं दुर्घटनाओं को देखकर लगता है क्या ज़िन्दगी है. आतंकवाद. उग्रवाद नक्सलवाद आदि आदि से निपटते निपटते कई निपट गए. जहाँ देखो तबाही मंची हुई है
ऐसा कौन सा दिन है इन चीजों की खबरों से समाचार पत्र नहीं सना रहता. कह सकते हैं ना बिनासशील देश???
जय  जोहार .....

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

कौन नहीं करेगा निछावर इस पर अपना प्यार

                 (१)                                                                         
निष्कपट निश्छल  चेहरा 
हिलते हैं, ओष्ठ अधर दोनों 
न बोल पाते हुए भी 
अपनी प्यारी सूरत औ आँखों के भावों से
कह जाता है सब कुछ
हंसता है हंसाता है, रोता है रुलाता है  
खींच लेता है सारी दुनिया अपनी ओर 



कौन नहीं करेगा 


निछावर
इस पर अपना प्यार 
नही रहता कोई  भेद भाव; 
उंच- नीच,  अमीर- गरीब का 
क्षण भर के लिए ही सही. 
(2)
गुजरता है पल पल परिवर्तन के दौर से 
करवटें बदलना, पेट के बल सोना (पलटी मारना} 
घुटने के बल चलना,  धीरे धीरे रेंगना 
बोलना भी सीख गया है, 
तोतली बोली हंसाती है सबको  
रट्टू तोता होता है   
समझ नहीं है कौन क्या बोल रहा है
दुहराता है सुने गए शब्द 
क्या मालूम उसे यह गन्दी  गाली है 
शुरू होती  है माँ- बाप  की परीक्षा
उसे अच्छे संस्कार देने की.
(3)
कदम रखता है स्कूल की दहलीज पर
छिन जाती है आजादी 
दिन भर घूम घूम कर 
खेलने की, धमाचौकड़ी मचाने  की.
लद जाता है बस्ते की बोझ से
(४)

शुरू हो जाती है प्रतिस्पर्धा की भावना
पांचो अंगुलियाँ एक समान नहीं होती
फिर भी बच्चों से ज्यादा रहते हैं 
पालक परेशान, डूबे रहते हैं इस सोच में 
कहीं क्लास में बच्चा पिछड़ तो नहीं रहा  
घट तो नहीं रही है  उनकी शान
बालक की क्षमता है तो कोई बात नहीं
वरना बच्चे के मन में  जड़ जमाता  अवसाद 
बना लेता है   अपना ग्रास 
उसकी  सारी खुशियों को 
दिल दहल जाता है जानकर परिणति इसकी; 
दिमागी संतुलन खो जाना या अपनी जान गँवा बैठना.
(५) 
मिल चुकी है पढ़ाई से मुक्ति 
येन केन प्रकारेण ख़तम हुआ 
अर्थोपार्जन करने के साधन 
जुटाने का दौर, जुगाड़ लेता है 
अपने रहने का ठौर   
गुजरती है  जिन्दगी आलिशान बंगलों में  
कहीं झोपडी में ही सही 
पसीने की गाढ़ी कमाई से कर रहा है
अपना जीवन यापन मिल रहा है खाने
को दो जून की रोटी,  मन ही मन परमपिता 
परमेश्वर से करते रहता है विनती 
कोई छीन न  ले थाली से खाने के लिए 
उठाया हुआ कौर. 
इन तमाम घर गृहस्थी के चक्कर में फंसे 
रहकर  कभी फरमाया है आपने गौर
क्या अच्छा होता फिर से बन जाते हम बच्चे 
विचरते उस दुनिया में जहाँ न कोई बेईमानी है 
न मक्कारी है फरेबी है न  भ्रष्टाचार की बीमारी  है 
जय जोहार......

सोमवार, 19 जुलाई 2010

कमान से निकला तीर जुबान से निकले शब्द वापस नही आते

(१)
मनुष्य जन्म लेता है, 
पग रखता है धरती पर 
रिश्ते- नातों  की श्रृंखला में
जुड़ जाती है एक और कड़ी.
(२)
रिश्तों में खटास पैदा होने में नहीं लगती देर 
लगा दिए जाते हैं सगे सम्बन्धियों पर आरोप
कही सुनी बातों को लेकर बिना दरयाप्ति के
या होके  पूर्वाग्रह से ग्रसित
क्या कहें इसे गलती इंसान के  सोच की 
या समय का फेर
हो जाती है कहा सुनी 
खींच जाती है सबंधों के बीच
दरार की रेखा 
सत्य है,  कमान से निकला तीर
जुबान से निकले शब्द वापस नही आते
यह सभी ने है देखा 
(४)
देखता है मुड़कर पीछे
करता है अपने आप से सवाल
बीता वाकया क्या जायज था 
अंतरात्मा से निकलती है आवाज
नही!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
होने लगती है आत्मग्लानि 
झुलस रहा है पश्चाताप की आग में
(५)
पता चलता है इस बात का आरोपित व्यक्ति  को 
तत्पर हो उठता है बढ़ाने को सामीप्य 
मानके उसका कृत्य क्षम्य 
प्रतीक्षा में है  मिलन के बेला की 
ख़त्म होती है इन्तेजार की घड़ियाँ
दिला जाता है आभास जुड़ने वाली
है फिर से ये रिश्ते नातों की कड़ियाँ 
मिलती है नजरें छलक पड़ता है नयनो से नीर
स्वीकारना अपनी गलती हर लेता मन का पीर 
....ईश्वर से प्रार्थना करते हुए, किसी के प्रति किसी के  मन में खटास  नही आनी चाहिए
जय जोहार.....