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शनिवार, 3 मार्च 2012

होली का त्यौहार, पौराणिक कथा, धार्मिक, पारंपरिक व वैज्ञानिक कारण


             होलिका दहन पर्व के कई मत, मतांतर हैं। इसे मुख्य रूप से हिरण्य कश्यप की बहन होलिका के दहन का दिन माना जाता है, वहीं शास्त्रों में कई तरह के मत दिए गए हैं। फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक आठ दिन होलाष्टक के बाद होलिका दहन की परंपरा है।  पारंपरिक दृष्टिकोण  कहता  है कि खेत से उपजी नई फसल या कहें नव अन्न का  यज्ञ/ हवन किया जाता है. यह परंपरा गांवों में अभी भी प्रचलित है।
            सामान्यत: रंगों के  इस त्यौहार के संबंध में भगवान विष्णु के भक्त प्रहलाद  को गोद में लेकर  हिरण्यकश्यप की बहन होलिका, जिन्हें वरदान प्राप्त था कि अग्नि उन्हें जला नहीं सकती,   के अग्निकुंड में बैठने जाने  की कथा प्रचलित है। वस्तुतः हिरण्यकश्यप अमरत्व का वरदान पा लेने के आवेश में (यद्यपि यह उसका  भ्रम ही था)  अपने को ईश्वर समझ बैठता है व चाहता है कि सभी उसकी ही भक्ति करे. वह आततायी हो जाता है. अपने पुत्र प्रहलाद को परम पिता परमेश्वर की भक्ति करने से रोकता है किन्तु प्रहलाद अडिग रहता है. उसे ज्ञात है कि  ईश्वर एक है. प्रहलाद की  भक्ति में इतनी शक्ति थी कि होलिका का दहन हो जाता है वहीं  भक्त प्रहलाद बच जाते  हैं.    इसके साथ ही होली से  सम्बंधित कई मान्यताएं प्रचलित हैं-
                शास्त्रों के अनुसार होलाष्टक के दौरान मानव मन-मस्तिष्क में काम भाव रहता है। भगवान शंकर द्वारा क्रोधाग्नि से काम दहन किया गया था, तभी से होलिका दहन की शुरुआत होना भी माना गया है।
                   होली इस पर्व के पीछे वैज्ञानिक कारण भी मौजूद हैं। ऐसा माना जाता है कि दो ऋतुओं का यह समय संधि काल होता है अर्थात  सर्दी के  जाने और गर्मी के  आगमन की  के दिन हैं। ऐसे में सर्द गर्म (शीत ज्वर) से अधिकाधिक लोगों के स्वास्थ्य खराब होते हैं। इसी के निवारणार्थ वातावरण में गर्मी लाने के लिए होलिका दहन किए जाते हैं।
                   शास्त्रों के अनुसार इस दिन आम्र मंजरी, चंदन का लेप लगाने व उसका पान करने, गोविंद पुरुषोत्तम के हिंडोलने में दर्शन करने से वैकुंठ में स्थान मिलना माना गया है। भविष्य पुराण में बताया गया कि नारद ने युधिष्ठिर से कहा कि इस दिन अभय दान देने व होलिका दहन करने से अनिष्ट  दूर होते हैं।

                           सारांश में यह कहा जा सकता है  कि  अपने मन के विकारों को जला प्रेम के रंगों में एक दूसरे को रंगने का पर्व है.  आयें हम सब मिलकर आत्मीयता के साथ इस पर्व का आनंद लें....... मेरे सभी मित्रों को "होली" की सप्रेम बहुत बहुत बधाई..........
जय जोहार.......

रविवार, 1 जनवरी 2012

नवा साल के गाड़ा गाड़ा बधाई

नवा साल के गाड़ा गाड़ा बधाई

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

नव  वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं
(१) 
नए साल की सुबह को बाकी रह गए कितने दिन.
प्रहर,  घड़ी, कला, विकला, क्षण क्षण क्षण को गिन.
 (२)
जश्न- जोश मदहोश करे, आओ झूमें नाचें गायें  
तजि बैर-भाव अरु दुर्गुण अपने, खुशियाँ बांटते जायें
 (३)
करनी ऐसी कर चलें होवे सारा जग खुशहाल 
सौगातों की पोटली, लिए द्वार खड़ा नया साल
(४) 
भ्रष्टाचार भय भूख से जन को मिलेगा कब छुटकारा
"केंसर" से घातक बन चुका जानत यह जग सारा
(५)
हो देर मगर अंधेर नहीं, जुट जाए सारी जनता 
"कोउ नृप होय हमै का हानि"  से काम नहीं है बनता 
(६)
नव-वर्ष की उषा-किरण,  कर दे सबको उर्जावान 
खुशियाँ हो घर- घर इस जग में,   बिनती है भगवान
आप सभी को चंद घंटों में आने वाले  नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं  
जय जोहार........

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

यायावर की वापसी

 
                                                                 




                                                              गाड़ी थी पोरबंदर हावड़ा

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

नहीं कहेंगे, "चाचू पसीने क्यों आ रहे हैं"


हुए  ब्लॉग लेखन से दूर,
पखवाड़ा क्या,  बीत गया महीना
जारी है शीत लहर, 
लिखने में क्यों आ रहा है पसीना
नहीं कहेंगे, "चाचू पसीने क्यों आ रहे हैं"
न ही सुनेंगे "ये अन्दर की बात है"
फिर से यहाँ आने का बना  जरिया 
नागपुर रेलवे स्टेशन  में
ब्लॉग-जगत के यायावर से
हुई मुलाक़ात है
 मौजूद थीं आदरणीया श्रीमती संध्या शर्मा 
संग संग थे आदरणीय शर्मा श्रीमान
खासियत यही  तेरे  ब्लॉग की दुनिया
"शख्सियतों" से कराता जान पहचान
......जय जोहार!!!!

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

लछमी दाई ए दारी कम से कम खच्चित आबे

लछमी दाई ए दारी कम से कम खच्चित  आबे
 हे  लछमी दाई, तोर महिमा ला सबो झन जानथे. आदमी  अपन अपन कूबत के अनुसार तोर पूजा अर्चना ला करथें. बस इही बिनती हे माँ के काखरो बर रिसाबे झन. ओइसे त पूरा भरोसा हे, चाहे गरीब के कुंदरा होय चाहे रईस के बँगला; जम्मो जघा गे होबे. दाई!  भूले भटके काखरो घर छूटिच गे होही त ए दारी कम से कम खच्चित  आबे. पूरा संसार मा जउन आज दिखत हे, खासकर तोर भक्तन  के देस भारत मा, जैसे - मार- काट, कोन पराया ये कोन अपन, तेखर चिन्हारी नई ये, कब टोंटा ल रेत के रेंग दिही भरोसा नई ये, मंहगाई अलग ये सब कराये बर उकसाथे, भ्रष्टाचार हा त आदमी के रग रग मा समा गे हे, तउन  ल दाई तंही भगा सकत हस. काली भाई दूज आय. जम्मो संगवारी ला,  अपन अपन बहिनी के हाथ ले टीका लगवा के ओ मन ला, अपन  परेम के रूप मा,  उंखर सुख दुःख मा काम आये के  वचन देवत  बने उपहार दे के तिहार, 
भाई दूज के अब्बड़ अकन बधाई....
जय जोहार......
 खच्चित आबे = जरूर आना, कुंदरा = झोपड़ी, काखरो घर छूट  गे होही = किसी का घर छूट गया हो तो, ए दारी = अबकी बार, चिन्हारी = पहचान, टोंटा ल रेत के रेंग दिही = गला काट कर भग जाएगा

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011

अन्न-कूट गोवर्धन पूजा की हार्दिक बधाई


            अन्न-कूट गोवर्धन पूजा
 
                    कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन उत्सव मनाया जाता है। इस दिन बलि पूजा, अन्न कूट, मार्गपाली आदि उत्सव भी सम्पन्न होते है। अन्नकूट या गोवर्धन पूजा भगवान कृष्ण के अवतार के बाद द्वापर युग से प्रारम्भ हुई। गाय बैल आदि पशुओं को स्नान कराकर फूल माला, धूप, चन्दन आदि से उनका पूजन किया जाता है।
                     गायों का मिठाई खिलाकर उनकी आरती उतारी जाती है तथा प्रदक्षिणा की जाती है। गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर जल, मौली, रोली, चावल, फूल दही तथा तेल का दीपक जलाकर पूजा करते है तथा परिक्रमा करते हैं। कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को भगवान के निमित्त भोग व नैवेद्य में नित्य के नियमित पदार्थों के अतिरिक्त यथासामर्थ्य अन्न से बने कच्चे-पक्के भोग, फल, फूल; अनेक प्रकार के पदार्थ जिन्हें "छप्पन भोग" कहते हैं,. ‘छप्पन भोग’ बनाकर भगवान को अर्पण करने का विधान भागवत में बताया गया है.  फिर सभी सामग्री अपने परिवार, मित्रों को वितरण कर के प्रसाद ग्रहण किया जाता है ।                                                                                                              
                     इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने इंद्र की पूजा को बंद करा कर इस के स्थान पर गोवर्धन की पूजा को प्रारंभ किया था और दूसरी ओर स्वयं गोवर्धनं रूप धर कर पूजा ग्रहण की इससे कुपित होकर इंददेव ने मूसलाधार जल बरसाया और श्री कुष्ण जी ने गोप और गोपियों को बचाने के लिए अपनी कनिष्ठ उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर इंद्र का मानमर्दन किया था.सब ब्रजवासी सात दिन तक गोवर्धन पर्वत की शरण मे रहें।
                    सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियों पर एक जल की बूँद भी नही पड़ी। ब्रह्या जी ने इन्द्र को बताया कि पृथ्वी पर श्री कृष्ण ने जन्म ले लिया है, उनसे तुम्हारा वैर लेना उचित नही है। श्रीकृष्ण अवतार की बात जानकर इन्द्रदेव अपनी मुर्खता पर बहुत लज्जित हुए तथा भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा याचना की।  श्रीकृष्ण ने सातवें दिन गोवर्धन पर्वत को नीचे रखकर ब्रजवासियो से आज्ञा दी कि अब से प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा कर अन्नकूट का पर्व उल्लास के साथ मनाओ। उनके स्मरण में  गोवर्धन और गौ पूजन का विधान है।
                     यूं तो आज गोवर्धन ब्रज की छोटी पहाड़ी है, किन्तु इसे गिरिराज (अर्थात पर्वतों का राजा) कहा जाता है। इसे यह महत्व या ऐसी संज्ञा इस लिये प्राप्त है क्यूंकि यह भगवान कृष्ण के समय का एक मात्र स्थाई व स्थिर अवशेष है। उस समय की यमुना नदी जहाँ समय-समय पर अपनी धारा बदलती रही है, वहां गोवर्धन अपने मूल स्थान पर ही अविचलित रुप में विद्यमान  है। इसे भगवान कृष्ण का स्वरुप और उनका प्रतीक  भी माना जाता है और इसी रुप में इसकी पूजा भी की जाती है।
                      बल्लभ सम्प्रदाय के उपास्य देव श्रीनाथ जी का प्राकट्य स्थल होने के कारण इसकी महत्ता और बढ़ जाती है। गर्ग संहिता में इसके महत्व का कथन करते हुए कहा गया है - गोवर्धन पर्वतों का राजा और हरि का प्यारा है। इसके समान पृथ्वी और स्वर्ग में कोई दूसरा तीर्थ नहीं है। यद्यपि वर्तमान काल में इसका आकार-प्रकार और प्राकृतिक सौंदर्य पूर्व की अपेक्षा क्षीण हो गया है, फिर भी इसका महत्व कदापि कम नहीं हुआ है।
                    इस दिन स्नान से पूर्व तेलाभ्यंग अवश्य करना चहिये। इससे आयु, आरोग्य की प्राप्ति होती है और दुःख दारिद्र्य का नाश होता है। इस दिन जो शुद्ध भाव से भग्वत चरण में सादर समर्पित, संतुष्ट, प्रसन्न रहता है वह वर्ष पर्यंत सुखी और समृद्ध रहता है।
                        यदि आज के दिन कोई दुखी है तो वर्ष भर दुखी रहेगा इसलिए मनुष्य को इस दिन प्रसन्न होकर इस उत्सव को सम्पूर्ण भाव से मनाना चाहिए।                                                                                                                अन्न-कूट गोवर्धन पूजा की 
सबको देता हूं बहुत  बधाई 
अन्ना-कूट इहाँ (देश में) हो रह्यो,
कर अर्पण छप्पन भोग प्रभू को 
करियो पूजा मन-मोहन (कृष्ण) की भाई 
जय जोहार.......