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बुधवार, 13 जनवरी 2010

"मन का क्या है इसमें कुसूर"

साहित्य हो पुराण हो                                     
बाइबल हो कुरान हो
संतों का व्याख्यान हो
वाचन श्रवण में ध्यान हो
कुछ बातें इनकी कर जाती हैं असर जरूर
लेकिन क्या करें, चहुँ ओर जगत का हाल देख
फैला घर गृहस्थी का जंजाल देख
हो नहीं पाता अमल, मन का  क्या  है इसमें  कुसूर
अभी हाल ही में अहमदाबाद कोटा की यात्रा संपन्न करके लौटे.  पूरी यात्रा के दौरान अहमदाबाद वाले मित्र द्वारा भेंट की गयी किताब "ओशो कृष्ण स्मृति" पढ़ते रहे.  जो बातें हमें अच्छी लगी नोट करने लग गए. आज मन हुआ इन्हें यहाँ भी चिपका दिया जाय:-
 (१)

  "अर्जुन" भला आदमी है. अर्जुन शब्द का मतलब होता है, सीधा सादा. तिरछा-इर्छा जरा भी नहीं. अ-रिजु. बहुत सीधा सादा आदमी है. सरल चित्त है. देखता है की फिजूल की झंझट कौन करे, हट जाओ. अर्जुन सदा ही हटता ही रहा है. वह जो अ-रिजु आदमी है, जो सीधा सादा आदमी है, वह हट जाता है. वह कहता है झगडा मत करो, जगह छोड़ दो".
(२)
समस्त त्यागवादी सिर्फ दुःख पर जोर देते हैं इसलिए वह असत्य हो जाता है. समस्त भोगवादी सुख पर जोर देते हैं इसलिए वह असत्य हो जाता है. सार यह है की केवल एक पहलू को जीवन का सार नहीं मानना चाहिए. सुख है तो दुःख है, भोग है तो वैराग्य है, जन्म है तो मृत्यु है. केवल सुख की कल्पना अथवा केवल संसार में केवल दुःख ही दुःख है यह मानना बेमानी है.
(३) द्रौपदी
यह बहुत ही अद्भुत स्त्री होनी चाहिए. अन्यथा साधारण स्त्री इर्ष्या में जीती है. अगर हम पुरुष और स्त्रियों का एक खास चिन्ह खोजना चाहें तो पुरुष अहंकार में जीते हैं, स्त्रियाँ इर्ष्या में जीती हैं. इर्ष्या अहंकार का पेसिव रूप है और अहंकार इर्ष्या का एक्टिव रूप. अहंकार सक्रिय इर्ष्या और इर्ष्या निष्क्रिय अहंकार..........

3 टिप्‍पणियां:

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत बढिया लगा पढकर ।

ललित शर्मा ने कहा…

जाउन नहीं रखे कखरो से राग, तेला धर लेथे बैराग. अर्जुन हा कोनो ना नई मारिस, वो तो बाण हां मारिस. तेखर सेती अर्जुन होगे. दुरपति हां कौनो ला कांही नहीं किहिस, बस एक घांव दुरजोधन ला अंधरा के औलाद किहिस, बपरी हां फोकटे बदनाम होगे के महाभारत ला रचवा डारिस. बने लिखे हस भैया, गाडा -गाडा बधाई

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

सकरायेत तिहार के गाडा गाडा बधई.