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मंगलवार, 26 जनवरी 2010

"तुलसी संत सुअम्ब तरु फूलि फरहि पर हेत जितते ये पाहन हने उतते वे फल देत"

"तुलसी संत सुअम्ब तरु फूलि  फरहि पर हेत 
जितते ये पाहन हने उतते वे फल देत"
यह है संत की परिभाषा गोस्वामी तुलसीदास जी की इन पंक्तियों के अनुसार.  यदि हम आत्मावलोकन करें तो क्या हम इसका अनुसरण कर रहे हैं?  अच्छा चलिए इस सम्बन्ध में यह कहा जावेगा की हम संत नहीं हैं. ठीक है. पर यदि आज के कथाकारों (प्रवचनकर्ताओं, जिन्हें हम ही संत कहने लगे हैं) को एशो आराम वाले कहा जावे तो सबसे पहले उन्हें  एशो आराम की सुविधा उपलब्ध करवाने वाले कौन हैं?? हम लोगों में से ही कोई न कोई हैं, हैं कि नहीं.   फिर आलोचना समालोचना  विवेचना क्यों ?  कहीं प्रवचन चल रहा हो, कहीं भजन संकीर्तन का आयोजन हो रहा हो, जनता उमड़ पड़ती है, खासी भीड़ जमा हो जाती  है.  भीड़ क्यों उमड़ पड़ती है? क्यों खीचे चले जाते हैं लोग उनकी ओर. दूसरी बात क्या उनकी सभी बातें जरा भी अनुकरणीय नहीं होतीं ?  यह सोचने की बात है.  एक ओर प्रवचन चल रहा है, पांडाल श्रोताओं से भरा है. दूसरी ओर  पांडाल से बाहर तात्कालिक आवश्यकताओं की चीजें बेचने वालों की कतारें  जैसे ठेले में खाने की वस्तुएं बेचने वाले, बच्चों को आकर्षित करने वाले खिलौने बेचने वाले, आदि आदि दिखाई पड़ती हैं. मेला का दृश्य लगता है. ये  ऐसे  विक्रेता हैं जिनकी रोजी रोटी इसी से चलती हैं. कहने का तात्पर्य इन्हें भी फायदा हो जाता है. इतना ही नहीं बाहर भिखारी भी इससे कुछ न कुछ लाभान्वित होते हैं. यद्यपि भिक्षावृत्ति को बढ़ावा देने के पक्ष में नहीं हूँ मैं. मैंने अभी अभी दैनिक अखबार "दैनिक भास्कर"  में प्रकाशित तरुण सागर जी के प्रवचनों के कुछ अंश  जो मुझे अनुकरणीय प्रतीत हुआ, खासकर पारिवारिक जीवन को सहज व सरल ढंग से व्यतीत करने के लिए  आपने ब्लॉग में  लिखा है  . .  इन बातों की अच्छाई तो एक तरफ. प्रवचनकर्ता  की खिचाई टिपण्णी के माध्यम से शुरू. किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं आज जो संतों (फिर मैं संत लिख बैठा प्रवचनकर्ताओं) की बाढ़ आयी है उनके लिए टिप्पणीकर्ता के विचार कुछ हद तक लागू हो सकते हैं. कलियुग में इस तरह की परिस्थिति निर्मित होने के अंदेशे के बारे में रामचरित मानस में पहले से ही उल्लेख है;
"बहु दाम संवारहिं धाम जती. बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती.
तपसी धनवंत दरिद्र गृही. कलि कौतुक तात न जात कही."
सन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं. उनमे वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयों ने हर लिया. तपस्वी धनवान हो गए और गृहस्थ दरिद्र.  हे तात कलियुग की लीला कुछ कही  नहीं जाती.  (काक भुसुंडि गरुड़ संवाद उत्तर काण्ड) 
अतएव अच्छा हो यदि अनुकरणीय बातें ग्रहण करें केवल समाज ही नहीं एक अच्छा राष्ट्र साबित हो अपना इसमें सहायक हों. 
..........जय जोहार

 





4 टिप्‍पणियां:

vinay ने कहा…

में भी यही समझता हूँ,अनुकरणिय बातों को ग्रहण करना चाहिये ।

HARI SHARMA ने कहा…

वेहद सुलझा हुआ आलेख. बधाई

मनोज कुमार ने कहा…

अच्छी पोस्ट!

ललित शर्मा ने कहा…

पथरा खाके जम्मो हा फ़ल देथे।
हमु ला पथरा मा हनहि कोनो हा त हमु फ़ल देबो।:)
जोरदार केहे हस भाई