आईए मन की गति से उमड़त-घुमड़ते विचारों के दांव-पेंचों की इस नई दुनिया मे आपका स्वागत है-कृपया टिप्पणी करना ना भुलें-आपकी टिप्पणी से हमारा उत्साह बढता है

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

"नवरात्रि " की आप सभी मित्रों को बहुत बहुत बधाई."

jay maa durge
"देवी प्रपन्नार्ति हरे प्रसीद प्रसीद मातर्रजगतोखिलस्य 
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमेश्वरी देवि चराचरस्य "
"विश्व शान्ति  की कामना  सहित "नवरात्रि " की आप सभी मित्रों को बहुत बहुत बधाई." 
              जय जोहार....................
 

इत उत चित दौड़ाइ बिनु


"साहित्य का "सा" नहीं जानू 
अपने को कवि कैसे मानू"
      इस बात का आभास अंतरजाल की इस आभासी दुनिया में प्रशंसकों की प्रशंसा के बीच खोये रहने के कारण नहीं हो पाया था। कितनी भी उम्र हम पार कर लें किसी न किसी रूप में "गुरु"/मार्ग दर्शक की आवश्यकता पड़ती है। धन्य हैं अरुण निगम भैया। कुछ ऐसे टिप्स दिए कि अपने आप को निम्नलिखित पंक्तियाँ लिखने से नहीं रोक पा रहा हूँ। साथ ही माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने के दौरान हिंदी व्याकरण में बताये गए सूत्र की भी पुनरावृत्ति हो गई।
शबद संयोजन मात्रा कविता का आधार।
याद न आवे सूत्र यदि, रचना सब बेकार।।
सूत्र संग यह होय, सही भाव प्रकटीकरन।
समझ सके हर कोय, इत उत चित दौड़ाइ बिनु।।
जय जोहार.............

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

घुट घुट जन जो जी रहा

देखते पढ़ते हर पोस्ट चेहरा-ए-किताब में
उमड़ते घुमड़ते भावों को, उकेरते हैं ख़्वाब में
राजनीति से नीति हटी, बच गया केवल राज 
घुट घुट जन जो जी रहा रास न आया काज 
मंहगाई, कितनी बढ़ रही, कौन हरे गरीब की पीड़ा
पिशाच "भ्रष्टाचार" हनन का का कौन उठावेगा बीड़ा
"शक्ति"-साधना दिवस "नवरात्रि" होगी सोलह (अक्टोबर) से प्रारम्भ
सोचूं,  हत होगा "भ्रष्टाचार" भी, संग संग शुम्भ-निशुम्भ
नौ दिन का त्यौहार "नवरात्रि" रख संयम सभी मनावें 
विश्व शान्ति की करें कामना, माँ को श्रद्धा सुमन चढ़ावें 
नवरात्रि की अग्रिम बधाई सहित
.............जय जोहार।।।।

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

साबुन अउ शेम्पू लगा के नहाये

साबुन अउ शेम्पू लगा के नहाये 
घूमे एती ओती टुरी चूंदी ला छरियाये
तभो ले चूंदी अरझैच नहीं
गोठियावै काखरो मेरन, कोनो ओरझेच नहीं
काबर के मुह कान जम्मो रथे गमछा भीतर
गोठियाने वाला सोचथे, मारत हौं तीतर  
करलई हे इही बात के ददा अउ दाई ला
कउन आय बहिनी नइ चिन्हावै भाई ला
संगे संग काम करथें टुरी-टूरा तहां हो जथे पियार
दाई ददा ल कथें अपन मन ल मार डार
बदल गे हे अब के सब रीति रिवाज
झुका देथे माँ बाप ल इंखर मिजाज
दुनो के परिवार माँ यदि माड़ जथे जोंगा
बाजे लगथे गुदुम बाजा(आज के डीजे), लमा के चोंगा
अउ बिगड़ गे बात, तभो इन ल नई ये कौनो बात के फिकर 
जुग बदल गे हे कायच कर लेबे, अउ कतेक करबे,
अइसन बात के जिकर.......
जय जोहार............... 
एती-ओती = इधर-उधर। चुंदी = बाल, केश। छारियाये=बिखेरे। अरझैच नहीं= बाल उलझता नहीं।
गोठियावै काखरो मेरन = किसी के साथ भी बात कर रहे हों। कोनो ओरझेच नही = इन से कोई नही लगता(उलझता). काबर के = क्योंकि। मुह कान जम्मो = मुह कान सभी (पूरा चेहरा). गमझा = साफा या स्कार्फ। मारत हौं तीतर = याने तीतर मार रहा हूँ। करलई हे = अफ़सोस है। ददा दाई = माँ बाप। नई चिन्हावै = पहचान नहीं आते। टुरी-टुरा = लड़का लड़की। माड़ जथे जोंगा = बात बन जाती है। कायच कर लेबे = क्या कर सकते हैं। कतेक कर लेबे = कितना कर सकते हैं। 
अइसन बात के = इस प्रकार की बातों का।

शनिवार, 15 सितंबर 2012

इसमें कछु नहीं है हर्जा

धन्य है हमारा देश! 
भिन्न भिन्न बोली 
भिन्न भिन्न भाषा 
हर का  पृथक पृथक परिवेश 
कब तक बनी रहेगी "बेचारी"
पाकर भी  राजभाषा का दर्जा 
सोचती है;  कम से कम याद
तो करते हो, पखवाड़ा ही सही
परिपाटी चलने दो, 
इसमें कछु नहीं है हर्जा  
जय जोहार ........

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

मेरी लेखनी क्यूं कुंठित हुइ जा रही

मेरी लेखनी क्यूं कुंठित हुइ  जा रही 
तुझे कागज़ की कोरी पन्नी क्यूं नही भा  रही 
सोचती क्या दिन-रात तू 
तेरी उकेरी चंद पंक्तियाँ 
क्यूं जन -आशीष नहीं पा रही 
शब्द सागर भंवर जाल में 
व्यर्थ  डूबती क्यूं जा रही 
सीने तक गहराई नाप पैठ क्यूं नहीं पा रही 
मेरी लेखनी क्यूं कुंठित हुइ  जा रही
जय जोहार......... 

बुधवार, 15 अगस्त 2012

स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक बधाई, सभी मित्रों को
 
आजादी की छः सठवी सालगिरह
सोचता हूँ ; आम आदमी से लेकर                                       
देश के कर्णधारों के बीच होती नहीं 
इस बात पर जिरह 
कि  खूब कमायें खूब खाएं 
पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान 
न पहुचाएं  
मानता हूँ  आम आदमी 
होता है तमाम घोटालों का शिकार 
लगा देता है झड़ी  आलोचनाओं की 
भूल जाता है उसके पास क्या है 
समाधान के लिए इलाज 
सोचता नहीं, 
लगी है उसी की रकम 
सार्वजनिक जन-सुविधा के लिए 
उपलब्ध कराये गए संसाधनों में 
फिर भी;  बजाय उसकी हिफाजत के 
लग जाता है ध्वस्त करने में .
क्या यही है स्वतंत्रता ?
 जय जोहार .......